<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078</id><updated>2012-02-05T22:54:05.198+09:00</updated><title type='text'>अर्ज़ है...</title><subtitle type='html'>कुछ अर्ज़ करने की आरज़ू में अर्ज़ है...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>83</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-7654703660859360573</id><published>2011-09-24T01:07:00.006+09:00</published><updated>2011-09-24T01:15:53.713+09:00</updated><title type='text'>रिश्ते बड़े अजीब हैं, तेरी गली के साथ...</title><content type='html'>&lt;b&gt;पापा आज आप बहुत याद आ रहे हो, बहुत याद आ रही है। आपके बिना जिंदगी बहुत मुश्किल हो गई है। मेरे पापा की एक बहुत खूबसूरत ग़ज़ल आप लोगों के साथ शेयर कर रहा हूं... और कुछ लिखने की हिम्मत नहीं है।&lt;/b&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;-----------------------------------------------&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;कुछ इस तरह से हमने गुजारी किसी के साथ&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;जैसे के अजनबी हो कोई अजनबी के साथ&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;कैसा मज़ाक था, ये मेरी जिंदगी के साथ&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;जलता गया वजूद मेरा, रौशनी के साथ&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;कुछ दोस्ती के साथ हैं, कुछ दुश्मनी के साथ&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;रिश्ते बड़े अजीब हैं, तेरी गली के साथ&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;उसने भी हमसे प्यार किया था, हजार बार&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;दिल की लगी के साथ नहीं, दिल्लगी के साथ&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;उसके सितम का कोई भी पहलू बुरा नहीं&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;तरके-ताल्लुकात भी हैं सादगी के साथ&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;ए दिल बड़ा अजीब है अपना भी मामला&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;जीना उसी के साथ है, मरना उसी के साथ&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;'क़ासिम' तेरे ख्याले परेशां का क्या हुआ&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;क्यों तूने उसको छोड़ दिया बेदिली के साथ&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-7654703660859360573?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/7654703660859360573/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=7654703660859360573' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/7654703660859360573'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/7654703660859360573'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='रिश्ते बड़े अजीब हैं, तेरी गली के साथ...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-157713384873752427</id><published>2011-06-19T02:48:00.004+09:00</published><updated>2011-06-19T03:00:33.853+09:00</updated><title type='text'>पापा जाने कहां तुम चले गए...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-qC_WItgXuUw/Tfzk9d4xqfI/AAAAAAAAAnE/lL_yfREiLPw/s1600/18051_1335285941408_1208870520_1013103_1002888_n.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 238px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-qC_WItgXuUw/Tfzk9d4xqfI/AAAAAAAAAnE/lL_yfREiLPw/s320/18051_1335285941408_1208870520_1013103_1002888_n.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5619618179697453554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;b&gt;जून का तीसरा इतवार... &lt;/b&gt;दुनियाभर केबच्चों के लिए फादर्स डे.. लेकिन इसी जून की पहली तारीख मेरे पप्पा को मुझसे छीनकर ले गई। एकपल को ऐसा लगा जैसे सबकुछ ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। ऐसा लगा जैसे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई हो। शायद मेरे घर को किसी की नज़र लग गई.. &lt;b&gt;हमेशा मुस्कुराने वाले मेरे पप्पा बड़े चुपके से हमें छोड़कर चलते बने।&lt;/b&gt; ग़म तो यह कि हमसे कुछ कहा भी नहीं। &lt;b&gt;मेरे प्यारे पप्पा जब मेरे सिर सेहरा सजाने का ख्वाब देख रहे थे, तभी मौत आई और ज़िंदगी को धोखा देकर पप्पा को मुझसे छीनकर ले गई।&lt;/b&gt; पिछले साल फादर्स डे पर अपने पप्पा के लिए मैने चंद लाइनें लिखी थीं.. ऐसा लग रहा है जैसे एक-एक लाइन दिल को चीरकर रख देगी। पप्पा अगर कोई ख़ता हो गई हो, तो उसे माफ कर देना।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;पप्पा.. अब भी पहले जैसे ही थे.. दिन बदल गए थे.. पप्पा नहीं बदले।&lt;/b&gt; उम्र की थकान उनके चेहरे से ज़ाहिर हो जाती थी। लेकिन बच्चों की ख़ातिर वो आज भी उफ़ तक नहीं करते थे। मेरे लिए दुनिया में अगर कोई सबसे ज्यादा प्यारा था, तो मेरे पप्पा। &lt;b&gt;मां ने मुझे जन्म दिया है.. लेकिन पप्पा ने तो ज़िंदगी का ककहरा सिखाया था।&lt;/b&gt; एक हमारे पप्पा ही तो थे जिनके कंधो पर हमने छोटी सी उम्र से ही ढेरों सपने संजो लिए थे।&lt;b&gt;होश संभालने के बाद पापा के सामने ही तो सबसे पहले हाथ फैलाया था। और पप्पा ने जेब से एक चवन्नी निकाल कर हाथ पर रख दी थी।&lt;/b&gt; उसके बाद तो ये सिलसिला सा चल निकला था। जब भी किसी चीज़ की ज़रूरत होती.. पप्पा के पास पहुंच जाते। दुनिया की तमाम मुश्किलें आ जाएं.. बस फिक्र क्या करना.. आखिर मेरे पप्पा जो थे। &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-2jf0kXLf4R8/TfznAA02ZFI/AAAAAAAAAnU/PVMhqe8lnA0/s1600/18051_1335285861406_1208870520_1013101_4376659_n.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 247px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-2jf0kXLf4R8/TfznAA02ZFI/AAAAAAAAAnU/PVMhqe8lnA0/s320/18051_1335285861406_1208870520_1013101_4376659_n.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5619620422459221074" /&gt;&lt;/a&gt; सुबह क्लीनिक जाने वाले पप्पा जब शाम को थके-हारे घर लौटते थे.. तब झट से उनकी गोदी में चढ़ जाते थे। निगाहें कुछ खोजती थीं... शायद पप्पा बाज़ार से कोई चीज़ लाए हैं। कुछ खाने की चीज़... और पप्पा अपने बच्चों के मन की बात समझ जाते थे... घर लौटते वक्त उनके हाथ में कुछ न कुछ ज़रूर होता था। &lt;b&gt;पप्पा का लाड़ तो पूछिए मत। उनका बस चलता.. तो आसमान से तारे भी तोड़कर ले आते।&lt;/b&gt; झुलसती गर्मी हो, कड़कड़ाती सर्दी हो, या फिर बरसात.. कड़ी धूप में मीलों का सफ़र... टपकती हुई किराए के घर की छत...दीवारों में सीलन.. तमाम दुश्वारियां सामने थीं.. लेकिन पप्पा ने कभी हार नहीं मानी। उंगली पकड़कर साथ चलने वाले पप्पा हमारी खातिर कुछ भी करने के लिए तैयार रहते थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-ntWG9i8EBjg/TfzmMJKv3qI/AAAAAAAAAnM/aH7zejztQZI/s1600/25686_1397638380180_1208870520_1183941_2206734_n.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-ntWG9i8EBjg/TfzmMJKv3qI/AAAAAAAAAnM/aH7zejztQZI/s320/25686_1397638380180_1208870520_1183941_2206734_n.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5619619531345354402" /&gt;&lt;/a&gt;जैसे-जैसे हम बड़े हो रहे थे.. पप्पा के सामने फ़रमाइशों की झोली बढ़ती जा रही थी। &lt;b&gt;मुश्किलों के उस दौर में भी प्यारे पप्पा ने कभी हार नहीं मानी। हमें पालने और पढ़ाने के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया।&lt;/b&gt; अपनी ऐशो-आराम की उम्र उन्होंने हमारा मुस्तकबिल बनाने में गुज़ार दी। वक्त के साथ हम बढ़े होने लगे। &lt;b&gt;कभी पापा की उंगली पकड़कर चलने वाले हम अब उनके कंधे से उचकने की कोशिश करने लगे।&lt;/b&gt; हम ये सोचकर कितने खुश होते थे.. कि हम पप्पा से बड़े हो रहे हैं। बार-बार पप्पा के बराबर खड़े होकर उनकी लंबाई से ऊपर जाने की कोशिश करते। लेकिन पप्पा अपने बच्चों के बड़े होने पर हमसे भी ज्यादा खुश होते थे। बेशक उनकी ज़िम्मेदारियां बढ़ रही थीं। फिर स्कूल से निकलकर कॉलेज का ज़माना आया। अब बारी थी.. घर से दूर दूसरे शहर में जाने की। लेकिन पप्पा अब भी खुश थे.. कि उनके बच्चे बड़े हो रहे हैं। लेकिन बच्चे तो अपनी ही दुनिया में मस्त थे। चवन्नी या एक रुपये से अब काम नहीं चलता था। अब पप्पा के सामने जेब खर्च की मोटी फ़रमाइश होती थी। फिर कॉलेज के बाद बारी आई नौकरी की। छोटे शहर से बड़े शहर का रुख हुआ। हम अब भी खुश थे.. बड़े शहर की चकाचौंध और नौकरी में पूरी तरह खो गए थे। &lt;b&gt;पप्पा की गोद में सोने वाले अब पप्पा से मीलों दूर थे। पप्पा अब भी खुश थे..&lt;/b&gt; लेकिन अब उनकी आंखे नम थीं.. क्योंकि बच्चे अब सचमुच बड़े हो गए थे... और उनसे बहुत दूर भी हो गए थे। &lt;b&gt;और मेरे प्यारे पप्पा फिर से अकले हो गए। &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-157713384873752427?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/157713384873752427/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=157713384873752427' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/157713384873752427'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/157713384873752427'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='पापा जाने कहां तुम चले गए...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-qC_WItgXuUw/Tfzk9d4xqfI/AAAAAAAAAnE/lL_yfREiLPw/s72-c/18051_1335285941408_1208870520_1013103_1002888_n.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-5970947196088773499</id><published>2011-01-20T16:11:00.008+09:00</published><updated>2011-01-20T16:29:54.253+09:00</updated><title type='text'>नसबंदी कराओ, नैनो पाओ...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TTfjYWzRuwI/AAAAAAAAAmo/I0p2t1438Ls/s1600/Family%2BPlaning.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 234px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TTfjYWzRuwI/AAAAAAAAAmo/I0p2t1438Ls/s320/Family%2BPlaning.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5564165872216554242" /&gt;&lt;/a&gt;इस तस्वीर को देखकर कुछ याद आया आपको... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर में इसका भी बड़ा योगदान है। छोटा परिवार, सुखी परिवार.. लड़का हो या लड़की बच्चे दो ही अच्छे... दो बच्चों के बाद बस करो.. नसबंदी कराओ गर्व से जियो... गाड़ियों से लेकर मौहल्ले भर की दीवारें इन नारों से पटी रहती थीं..&lt;/span&gt; घर के छोटे बच्चे बिना कोई मतलब समझे इन्हें पढ़ते, और फिर घर में जाकर वहीं बात दोहराते। मां-बाप अगर बच्चों को अपने साथ लेकर बाहर जाते, तो उनको अपने पीछे छुपा लेते, कि कहीं बच्चे दीवार पर लिखे परिवार नियोजन के विज्ञापन को न पढ़ लें। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;60 बरस हो गए देश को, सरकार के नारे पानी में बह गए &lt;/span&gt;और आबादी का विस्फोट जारी रहा। तस्वीर देखनी हो, तो सिर्फ दिल्ली दर्शन कर लीजिए। पैर रखने की जगह नहीं है इस शहर में। आबादी तकरीबन 1 करोड़ 50 लाख से भी ज्यादा। दिल्ली में तो इंसानों के साथ-साथ गाड़ियां भी इतनी हो गई हैं.. कि सड़क पर पैर रखना भी मुश्किल हो गया है। भला हो मेट्रो का.. लेकिन वो बेचारी भी क्या करे.. रोज़ बढ़ती जा रही इस आबादी के बोझ से कैसे निपटे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ज़रा देश के हाल पर भी नज़र डाल लीजिए। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;2009 में भारत की आबादी 119 करोड़ 80 लाख दर्ज की गई। 18 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला यूपी ब्राज़ील के बराबर पहुंच गया है।&lt;/span&gt; आबादी महामानव की तरफ मुंह फैलाए खड़ी है.. खाने वाले ज्यादा हो गए हैं... उपज कम हो रही है, नतीजा महंगाई ने आम इँसान की नाक में नकेल डाल दी है। और शरद पवार को भी बहाना बनाने का एक और मौका मिल गया। लेकिन आबादी पर ब्रेक लगाने के मामले में सभी चुप हैं। सरकार की तमाम कोशिशें फेल हो गईं.. लेकिन पिछले दिनों दो बड़ी मस्त ख़बरें आईं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पहली ख़बर भोपाल से आई... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;-300 से ज्यादा नसबंदी कराने वाले व्यक्ति को परिवार कल्याण कार्यक्रम में सक्रिय योगदान देने के लिए नैनो कार दी जाएगी।&lt;br /&gt;-200 अथवा उससे ज्यादा नसबंदी के आपरेशन कराने वाले व्यक्ति को मोपेड बतौर पुरस्कार में दी जाएगी। खास बात ये है कि भोपाल में इस सुनहरी घोषणा का ऐलान खुद वहां के कलेक्टर निकुंज श्रीवास्तव ने गांधी मेडिकल कालेज में किया था। अब कलेक्टर साहब को कौन बताए कि एक नैनो के लिए कोई भला 300 शिकार कहां से फांसकर लाएगा। वो भी सिर्फ नैनो के लिए.. इससे तो वो 3000 रुपये महीने की आसान किस्त पर वैसे ही नैनो ख़रीद लेगा। और भला 200 नसबंदी के लिए कौन भला मोपेड लेगा। अब सरकार को कौन बताए, कि आजकल मोपेड का नहीं, फर्राटेदार बाइक का ज़माना है। हां अब कोई नैनो के लिए काग़ज़ों में ही 300 शिकार फांस ले, तो अलग बात है। &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TTfjkpaNQhI/AAAAAAAAAmw/XbaFtUtIn8g/s1600/Nano%2BCar.gif"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 192px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TTfjkpaNQhI/AAAAAAAAAmw/XbaFtUtIn8g/s320/Nano%2BCar.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5564166083370107410" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दूसरी ख़बर भी मध्य प्रदेश से ही आई..&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ख़बर सागर ज़िले से थी, जहां के कलेक्टर ने ऐलान किया कि अगर कोई 5 या उससे ज्यादा लोगों को नसबंदी के लिए प्रेरित करे, तो उसे बंदूक का लाइसेंस मिलेगा।  जो लोग खुद से भी नसबंदी के लिए आएंगे उनको भी बंदूक के लाइसेंस में प्राथमिकता मिलेगी। इस ख़बर पर मेरे एक दोस्त ने ठहाका लगाया, कि ''भईया.. जब नसबंदी ही करा लेगा तो बंदूक से खाक निशाना लगाएगा और फिर अब शिकार करेगा भी तो किसका...''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नसबंदी वालों को इनाम का सरकारी ऐलान पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले भी नसबंदी कराने वालों को कभी कैश, तो कभी कुछ और छोटे-मोटे इनाम का लालच देकर नसबंदी कराई जाती थी.. इन छोटे-मोटे इनामों का फायदा छोटे-मोटे दलाल टाइप के लोग खूब उठाते थे। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इनाम के लालच में कईयों की तो जबरन नसबंदी करा दी जाती थी। कई तो ऐसे लोग भी जाल में फंस जाते थे, जिनकी पहले ही नस बंद हो चुकी थी। नसबंदी के इनाम के लालच में कई बुढ्ढे भी इस जाल में फांस लिये जाते थे।&lt;/span&gt; इस चक्कर में कई ऐसे लोग भी शिकार हो जोते थे, जिनकी ज़िंदगी फुटपाथ पर बसर होती थी। अख़बारों में ख़बरें छपतीं, लेकिन कुछ दिन हो-हल्ला मचने के बाद सबकुछ शांत हो जाता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समझ नहीं आता कि सरकार आखिर ऐसी बेकार की स्कीमें बनाती क्यों है। क्या देश की आबादी पर लगाम लगाने के लिए यही एक सबसे अच्छा तरीका है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सरकार में हिम्मत है, तो कानून बनाए। 2 बच्चों के बाद कानूनन रोक लगाए।&lt;/span&gt; लेकिन ऐसा सरकार भला कैसे कर सकती है। ऐसा हुआ, तो नेताओं को वोट कैसे मिलेंगे। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जब संसद में बैठे नेता ही 10-10 बच्चों के बाप होंगे, तो फिर देश की जनता का क्या कसूर।&lt;/span&gt; ये तो वही बात हो गई, कि शराब और सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। उसके बाद भी सरकार उसकी बिक्री पर रोक नहीं लगाती, क्योंकि उससे सरकार के ख़ज़ाने में सबसे ज्यादा पैसा आता है।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; ऐ हिंदुस्तान तेरे हाल पर रोना आया।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-5970947196088773499?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/5970947196088773499/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=5970947196088773499' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5970947196088773499'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5970947196088773499'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='नसबंदी कराओ, नैनो पाओ...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TTfjYWzRuwI/AAAAAAAAAmo/I0p2t1438Ls/s72-c/Family%2BPlaning.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-1866139374323534772</id><published>2010-11-14T05:59:00.003+09:00</published><updated>2010-11-14T06:05:27.278+09:00</updated><title type='text'>मैं आतिश परस्त नहीं..</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TN79NICUgjI/AAAAAAAAAl4/K5fryyvIUtA/s1600/FIRE%2BFOREST.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TN79NICUgjI/AAAAAAAAAl4/K5fryyvIUtA/s400/FIRE%2BFOREST.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5539142993649631794" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;जंगल में आग लगी.. चारों तरफ़ हाहाकार मचा था..&lt;/b&gt; आग की लपटें आसमान को छू रही थीं। जंगल से निकलकर धुआं बस्ती की फिज़ा में दम घोंटने लगा। आग इतनी भयानक हो चुकी थी, मानो पल भर में ही जंगल को राख कर देगी। तपिश ऐसी कि वहां एक पल भी रुकना नामुमकिन हो चुका था। बेबस जानवर जंगल से जानवर शहर की तरफ भाग रहे थे। जिंदगी बचाने के लिए उनके पास इसके सिवा शायद कोई ज़रिया नहीं था। &lt;b&gt;चंद आतिश परस्तों ने कुछ रंग-बिरंगे काग़ज़ के टुकड़ों के लिए हरे-भरे जंगल को आग के हवाले कर दिया था।&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बेज़ुबान जानवर बेबस थे.. उनका घर जल रहा था.. लेकिन कोई आग बुझाने वाला नहीं था। जानवरों की बस्ती में कुछ आतिशी इंसानों ने शोलों को हवा दे दी थी। कुछ बेज़ुबान तो इस आग में जलकर खाक हो गए, तो कुछ दम घुटने से ही इस दुनिया से रुखसत हो गए। जंगल जल रहा था, लेकिन&lt;b&gt; पास की इंसानी बस्ती में किसी को भी अपना फर्ज़ याद नहीं आया.. &lt;/b&gt;जंगल से निकलकर जानवर बस्ती में पहुंचने लगे.. तो तमाशबीनों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया.. किसी ने दौड़ा-दौड़ाकर शेर को मार डाला.. तो कोई हाथियों पर पत्थरों की बरसात करने लगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अपना घर छोड़कर बेघर हुए इन जानवरों की सुध लेने वाला कोई नहीं था। &lt;b&gt;शहर में इंसानी भेष में जानवर थे..&lt;/b&gt; जो उनकी हालत पर तरस खाने के बजाए बेज़ुबानों पर ज़ुल्म कर रहे थे। इधर जंगल में आग भड़कती ही जा रही थी। मीलों में फैला जंगल आहिस्ता-आहिस्ता आग के आगोश में समाता जा रहा था। लेकिन किसी में इतनी ताकत नहीं थी, जो उस जंगल को आग से बचा ले। जंगल में बड़े से पीपल के पेड़ पर एक चिड़िया भी रहती थी.. इस आग में उसका घर भी छूटने वाला था... उसकी आंखो में आंसू थे.. उसे गम था अपना आशियाना छिन जाने का। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लेकिन &lt;b&gt;चिड़िया से जंगल की आग देखी न गई। अचानक वो घोंसले से बाहर आई और कुछ दूर एक छोटे से तालाब पर पहुंची, वहां से उसने अपनी चोंच में दो बूंद पानी लिया, और लाकर उसे जंगल के ऊपर छिड़क दिया। इसके बाद वो फिर तालाब पर गई, दो बूंद पानी लाई और उसे जंगल पर छिड़क दिया। &lt;/b&gt;इसी तरह उसने दस-बारह बार किया। जब वो ऐसा करके थक गई तो अपने घोंसले में बैठकर सुस्ताने लगी। तभी सामने वाले पेड़ पर मौजूद अजगर ने उसकी तरफ देखा और बोला तुझे क्या लगता था, कि तेरी चोंच में पानी लाने से जंगल की आग बुझ जाएगी। तू क्यूं इतनी मेहनत कर रही थी। चिड़िया ने जवाब दिया। मैं भी जानती हूं कि मेरे चोंच में पानी लाने से जंगल की आग नहीं बुझने वाली। लेकिन&lt;b&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt; कल जब इस जंगल का इतिहास लिखा जाएगा, तो मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं, बल्कि आग बुझाने वाले में लिखा जाएगा। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-1866139374323534772?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/1866139374323534772/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=1866139374323534772' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/1866139374323534772'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/1866139374323534772'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='मैं आतिश परस्त नहीं..'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TN79NICUgjI/AAAAAAAAAl4/K5fryyvIUtA/s72-c/FIRE%2BFOREST.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-8923033620724401637</id><published>2010-08-19T02:45:00.004+09:00</published><updated>2010-08-19T03:12:24.217+09:00</updated><title type='text'>दोस्तों जिंदगी दर-बदर हो गई...</title><content type='html'>सभी दोस्तों से ये पुरखुलूस गुज़ारिश है, कि एक बार इस ग़ज़ल को पढ़ने की ज़हमत ज़रूर करें। बड़े अरसे बाद क़लम उठाई है, शायद ग़लतियां भी बहुत हों। ग़ज़ल कभी बहुत ज्यादा लिखी नहीं। कभी-कभार काग़ज़ पर अल्फ़ाज़ उकेरने की गुस्ताखियां की हैं। इस बार भी शायद कुछ ऐसा ही है। लिखने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन किसी पैमाने पर उतरने वाली ग़ज़ल बन नहीं पाई। मीटर और पैरामीटर से अपना दूर तक भी वास्ता नहीं है। लिहाज़ा उसके लिए तो ज़रूर माफ़ करें। अगर आपको पसंद आ जाए तो इस अदीब की इसलाह ज़रूर करें।&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TGwiLJChUzI/AAAAAAAAAks/AN3aQIEx8Bo/s1600/Lonely+2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TGwiLJChUzI/AAAAAAAAAks/AN3aQIEx8Bo/s1600/Lonely+2.jpg"&gt;&lt;img style="text-align: left;display: block; margin-top: 0px; margin-right: auto; margin-bottom: 10px; margin-left: auto; cursor: pointer; width: 320px; height: 213px; " src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TGwiLJChUzI/AAAAAAAAAks/AN3aQIEx8Bo/s320/Lonely+2.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5506814019167671090" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold; "&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold; "&gt;जब से उसकी टेढ़ी नज़र हो गई।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;दोस्तों जिंदगी दर-बदर हो गई।।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;वो क्या गए हमसे रूठकर यारों।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;महफिले और मुख़्तसर हो गईं।।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;नफ़रतों के दायरे जब से बढ़ने लगे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;दिल की गलियां भी और तंग हो गईं।।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;संगदिल के संग रहना ही ज़ेरेनसीब था।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;जीती बाज़ी हारना अब किस्मत हो गई।।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;उजले लिबास में लोग दिल के काले हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;मसीहाओं की अब यही पहचान हो गई।।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;प्यार की बस्ती में धोखा ही धोखा है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;रंग बदलना लोगों की फितरत हो गई।।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;प्यार, नफ़रत, ग़म, गुस्सा और फरेब।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;ज़िंदगी की अब यही कहानी हो गई।।&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-8923033620724401637?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/8923033620724401637/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=8923033620724401637' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8923033620724401637'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8923033620724401637'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='दोस्तों जिंदगी दर-बदर हो गई...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TGwiLJChUzI/AAAAAAAAAks/AN3aQIEx8Bo/s72-c/Lonely+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-8232609183378387614</id><published>2010-07-24T03:04:00.005+09:00</published><updated>2010-07-24T03:21:01.175+09:00</updated><title type='text'>दिल्ली में छपाक.. छई..</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TEncHQ6Ds7I/AAAAAAAAAkQ/enylGcqyJnU/s1600/Cars+in+Rain..+(1).jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 213px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TEncHQ6Ds7I/AAAAAAAAAkQ/enylGcqyJnU/s320/Cars+in+Rain..+(1).jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5497166837538075570" /&gt;&lt;/a&gt;कई दिन से उमस बढ़ती जा रही थी.. गर्मी के साथ चिपचिपाहट भी बढ़ने लगी थी.. फि़ज़ा खुशनुमा तो थी, लेकिन माहौल में काफ़ी नमी थी.. बस खुदा से दुआ थी, कि बारिश हो जाए.. कम से कम इस चिपचिपाती गर्मी से तो राहत मिलेगी.. लेकिन मौसम को शायद ये मंज़ूर नहीं था..&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; दिन तो किसी तरह दफ़्तर में गुज़र जाता था, लेकिन कबूतरखाने जैसे घरों में रात काटना बड़ा मुश्किल हो रहा था...&lt;/span&gt; लेकिन कहावत है न कि खुदा के घर देर है, लेकिन अंधेर नहीं... दिल्ली शहर में जब बारिश हुई तो झमाझम हुई.. बदरा बरसे तो जी भरकर बरसे.. आसमान में काली घटा ऐसी छाई, कि फिर तो रातभर बारिश ने मूसलाधार रूप अख्तियार कर लिया... बादलों ने तन और मन भिगो कर रख दिया.. लेकिन इस शहर और अपने गांव में यही फर्क है, कि यहां बारिश का मज़ा लेने के बजाए लोग चाहरदीवारी में ही कैद होकर रह जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TEncjMhW3gI/AAAAAAAAAkY/xxxo1GfUnWA/s1600/Dilli+Rain.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TEncjMhW3gI/AAAAAAAAAkY/xxxo1GfUnWA/s320/Dilli+Rain.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5497167317397069314" /&gt;&lt;/a&gt;और एक अपना गांव है, जहां बारिश में जमकर भीगो, कोई रोक-टोक नहीं... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दिल्ली में बारिश झमाझम हो रही थी.. लेकिन ये क्या... एक घंटे बाद टीवी ऑन किया, तो हर चैनल पर डूबती-उतराती दिल्ली की तस्वीरें नज़र आ रही थी...&lt;/span&gt; शहर में कई-कई फुट पानी भर चुका था, गाड़ियों की लंबी-लंबी कतारें लगी थीं, दिल्ली जाम से दो-चार हो रही थी, और दिल्ली वाले बारिश से तरबतर। राजधानी की हालत पर तरस आ रहा था.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लेकिन क्या करें, बदहाली के लिए भी हम लोग ही ज़िम्मेदार हैं.. घर में नहीं हैं दाने और अम्मा चली भुनाने की तर्ज़ पर लोन लेकर गाड़ियों का अंबार लगाने पर तुले हैं..&lt;/span&gt; और फिर जब घुटनों पानी से मशक्कत करके घर पहुंचते हैं, तो सरकार को कोसते हैं... सड़कें भी आखिर क्या करें... फैलकर बड़ी तो नहीं हो सकती न... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TEndB2inSSI/AAAAAAAAAkg/7i1THDGif4U/s1600/Boat.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 230px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TEndB2inSSI/AAAAAAAAAkg/7i1THDGif4U/s320/Boat.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5497167844072704290" /&gt;&lt;/a&gt;कई बार लगता है कि इससे तो अपना प्यारा छोटा सा गांव ही बेहतर है, जहां हम बचपन में भी &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बारिश के पानी में क़ाग़ज़ की कश्तियां चलाते थे..&lt;/span&gt; और आज भी जाते हैं, तो बरसात में अपने इस पसंदीदा खेल को भला कैसे छोड़ सकते हैं.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पहली या दूसरी क्लास में रहे होंगे, काग़ज़ की नाव बनाना तो तभी सीख लिया था.. &lt;/span&gt;वैसे तो स्कूल में काग़ज़ के बहुत से खिलौने बनाना सीखे थे, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लेकिन क़ाग़ज़ की नाव तो ज़िंदगी का एक हिस्सा बन गई.. शायरों ने इसे कलम में पिरो लिया, तो बच्चों ने इसमें अपनी दुनिया बसा ली.. &lt;/span&gt;बारिश के मौसम में फिर उसी घर में लौट जाने को जी करता है, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मन करता है फिर से बचपन में लौट जाने को जहां दिलभर कर शरारतें करो.. जहां बरसात के पानी में छपाक.. छई करने को मिले..&lt;/span&gt; जहां बारिश के पानी में किसी के ऊपर छींटे उड़ाने की फिर से छूटे मिले.. जहां बारिश के पानी में निकर पहनकर फिर से सड़क पर दौड़ने को मिले.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे अच्छी तरह याद है, जब जुलाई के महीने में स्कूल खुलते ही खूब बारिशें होती थीं, स्कूल में पानी भर जाता था.. और फिर सबकी छुट्टी हो जाती थी... बस फिर क्या था... किताबों से भरा बैग पीठ पर लादकर घर के लिए दौड़ लगा दिया करते थे.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्या मस्त दिन थे, वो बारिश में भीगने के... हसीन और बेहद खूबसूरत दिन... जहां बरसात में पापा के साथ अंगीठी पर भुट्टा भूनकर खाते थे..&lt;/span&gt; तालाब से सिंघाड़े तोड़कर लाते थे... क्या मस्ती होती थी.. मोहल्ले में हमारे पानी भर जाए, तो कोई नगरपालिका को नहीं कोसता था.. बच्चों की तो समझो ऐश हो जाती थी... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लेकिन दिल्ली शहर को देखकर तो डर लगता है.. कहां हम बचपन में कागज़ की नाव चलाते थे, और कहां अब दिल्ली शहर के बरसाती पानी में कारें डूबती-उतराती हैं... &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-8232609183378387614?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/8232609183378387614/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=8232609183378387614' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8232609183378387614'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8232609183378387614'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='दिल्ली में छपाक.. छई..'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TEncHQ6Ds7I/AAAAAAAAAkQ/enylGcqyJnU/s72-c/Cars+in+Rain..+(1).jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-6894131968779786478</id><published>2010-06-20T02:49:00.005+09:00</published><updated>2010-06-20T03:03:10.858+09:00</updated><title type='text'>सबसे प्यारे मेरे पा...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TB0DzbTAqFI/AAAAAAAAAkA/YOVuWDyXjq4/s1600/Pappa.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 238px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TB0DzbTAqFI/AAAAAAAAAkA/YOVuWDyXjq4/s320/Pappa.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5484544103242836050" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पप्पा.. अब भी पहले जैसे ही थे.. दिन बदल गए थे.. पप्पा नहीं बदले। &lt;/span&gt;उम्र की थकान उनके चेहरे से ज़ाहिर हो जाती है। लेकिन बच्चों की ख़ातिर वो आज भी उफ़ तक नहीं करते। मेरे लिए दुनिया में अगर कोई सबसे ज्यादा प्यारा है, तो मेरे पप्पा ही हैं। मां ने मुझे जन्म दिया है.. लेकिन पप्पा ने तो ज़िंदगी का ककहरा सिखाया है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एक हमारे पप्पा ही तो हैं, जिनके कंधो पर हम छोटी सी उम्र से ही ढेरों सपने संजो लेते हैं।&lt;/span&gt; होश संभालने के बाद पापा के सामने ही तो सबसे पहले हाथ फैलाया था। और पप्पा ने जेब से एक चवन्नी निकाल कर हाथ पर रख दी थी। उसके बाद तो ये सिलसिला सा चल निकला था। जब भी किसी चीज़ की ज़रूरत होती.. पप्पा के पास पहुंच जाते। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दुनिया की तमाम मुश्किलें आ जाएं.. बस फिक्र क्या करना.. आखिर मेरे पप्पा जो हैं।&lt;/span&gt; सुबह क्लीनिक जाने वाले पप्पा जब शाम को थके-हारे घर लौटते थे.. तब झट से उनकी गोदी में चढ़ जाते थे। निगाहें कुछ खोजती थीं... शायद पप्पा बाज़ार से कोई चीज़ लाए हैं। कुछ खाने की चीज़... और पप्पा अपने बच्चों के मन की बात समझ जाते थे... घर लौटते वक्त उनके हाथ में कुछ न कुछ ज़रूर होता था। और पप्पा का लाड़ तो पूछिए मत। उनका बस चलता.. तो आसमान से तारे भी तोड़कर ले आते। झुलसती गर्मी हो, कड़कड़ाती सर्दी हो, या फिर बरसात.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कड़ी धूप में मीलों का सफ़र... टपकती हुई किराए के घर की छत...दीवारों में सीलन.. तमाम दुश्वारियां सामने थीं.. लेकिन पप्पा ने कभी हार नहीं मानी।&lt;/span&gt; उंगली पकड़कर साथ चलने वाले पप्पा हमारी खातिर कुछ भी करने के लिए तैयार रहते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TB0EmIxb9KI/AAAAAAAAAkI/q0yQOQqXc5o/s1600/Pappa2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TB0EmIxb9KI/AAAAAAAAAkI/q0yQOQqXc5o/s320/Pappa2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5484544974443508898" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जैसे-जैसे हम बड़े हो रहे थे.. पप्पा के सामने फ़रमाइशों की झोली बढ़ती जा रही थी।&lt;/span&gt; मुश्किलों के उस दौर में भी प्यारे पप्पा ने कभी हार नहीं मानी। हमें पालने और पढ़ाने के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया। अपनी ऐशो-आराम की उम्र उन्होंने हमारा मुस्तकबिल बनाने में गुज़ार दी। वक्त के साथ हम बढ़े होने लगे। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कभी पापा की उंगली पकड़कर चलने वाले हम अब उनके कंधे से उचकने की कोशिश करने लगे। &lt;/span&gt;हम ये सोचकर कितने खुश होते थे.. कि हम पप्पा से बड़े हो रहे हैं। बार-बार पप्पा के बराबर खड़े होकर उनकी लंबाई से ऊपर जाने की कोशिश करते। लेकिन पप्पा अपने बच्चों के बड़े होने पर हमसे भी ज्यादा खुश होते थे। बेशक उनकी ज़िम्मेदारियां बढ़ रही थीं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फिर स्कूल से निकलकर कॉलेज का ज़माना आया। अब बारी थी.. घर से दूर दूसरे शहर में जाने की। लेकिन पप्पा अब भी खुश थे.. कि उनके बच्चे बड़े हो रहे हैं।&lt;/span&gt; लेकिन बच्चे तो अपनी ही दुनिया में मस्त थे। चवन्नी या एक रुपये से अब काम नहीं चलता था। अब पप्पा के सामने जेब खर्च की मोटी फ़रमाइश होती थी। फिर कॉलेज के बाद बारी आई नौकरी की। छोटे शहर से बड़े शहर का रुख हुआ। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हम अब भी खुश थे.. बड़े शहर की चकाचौंध और नौकरी में पूरी तरह खो गए थे।&lt;/span&gt; पप्पा की गोद में सोने वाले अब पप्पा से मीलों दूर थे। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पप्पा अब भी खुश थे.. लेकिन अब उनकी आंखे नम थीं.. क्योंकि बच्चे अब सचमुच बड़े हो गए थे... और उनसे बहुत दूर भी हो गए थे। और मेरे प्यारे पप्पा फिर से अकले हो गए।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-6894131968779786478?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/6894131968779786478/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=6894131968779786478' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6894131968779786478'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6894131968779786478'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/06/blog-post_20.html' title='सबसे प्यारे मेरे पा...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TB0DzbTAqFI/AAAAAAAAAkA/YOVuWDyXjq4/s72-c/Pappa.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-1096915446727332068</id><published>2010-06-13T23:45:00.005+09:00</published><updated>2010-06-14T00:03:09.045+09:00</updated><title type='text'>और वो हाथी को चट कर गए...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TBTxrJzAW6I/AAAAAAAAAjo/KLN9DFku6dY/s1600/ELH.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 180px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TBTxrJzAW6I/AAAAAAAAAjo/KLN9DFku6dY/s400/ELH.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5482272370083257250" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ये ख़बर किसी का भी दिल दहला सकती है।&lt;/span&gt; हो सकता है इसको पढ़ने के बाद आपके रोएं भी खड़े हो जाएं.. लेकिन ये ख़बर एकदम सच है.. इसी ज़मीन पर एक मुल्क ऐसा भी है, जहां लोग मिनटों में एक हाथी को चट कर गए। सुनकर अटपटा लग रहा है न आपको.. लेकिन ये एकदम सच है..&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; इंसान ने हैवान का रूप इख्तियार कर एक हाथी को चट कर दिया। &lt;/span&gt;एक हुजूम देखते ही देखते विशालकाय हाथी को हज़म कर गया.. और किसी को डकार भी नहीं आई। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;छह हज़ार किलो का हाथी, डेढ़ घंटे से भी कम वक्त में ख़त्म हो गया.. &lt;/span&gt;देखते ही देखते हाथी की बोटी-बोटी कर दी गईं... और मैदान में कुछ बचा, तो सिर्फ़ हाथी का कंकाल..अगर आपको अब भी यकीन नहीं है, तो ये तस्वीरें देख लीजिए... जो इस कहानी को खुद-ब-खुद बयां कर रही हैं। क्योंकि तस्वीरें कभी झूठ नही बोलतीं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TBTx9rDGzkI/AAAAAAAAAjw/ZBT362rD1RU/s1600/ELH2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TBTx9rDGzkI/AAAAAAAAAjw/ZBT362rD1RU/s400/ELH2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5482272688246804034" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हाथी का गोश्त खाने के शौकीन इन लोगों ने भालों और नुकीले हथियारों से उसका काम तमाम कर दिया। इन लोगों ने तो दरिंदगी की इंतिहा पार कर दी...जंगल में बीमारी से तड़प-तड़प कर हाथी मौत की नींद सो गया.. और उसे बचाने वाले हाथ उसकी मौत पर जश्न मनाने में जुटे थे। मामला जिम्बाब्वे के गोरालिज़ू नेशनल पार्क का है. जहां बीमारी की वजह से एक हाथी की मौत हो गई..  जैसे ही ये ख़बर इलाके में आम हुई.. एक हुजूम हाथी की तरफ़ उमड़ पड़ा... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मरे हुए हाथी को देखते ही लोगों ने आव देखा न ताव.. भीड़ में जिसको भी मौका मिला.. वो हाथी का गोश्त खाने के लिए पागल हो गया...&lt;/span&gt; भूखी भीड़ मरे हुए हाथी पर टूट पड़ी। दरिंदगी की हद पार करते हुए लोगों ने उसकी बोटी-बोटी कर डाली...&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; भूखे भेड़ियों की तरह लोगों ने उसके जिस्म से गोश्त के पारचे उतारना शुरु कर दिये। &lt;/span&gt;जिसको जो मिला, उसने मरे हुए हाथी पर वही आज़माया। तीर-तलवारों से लेकर छोटे-छोटे भालाओं तक, हाथी पर हर तरह के हथियार का इस्तेमाल किया गया... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt; बच्चों से लेकर बड़े तक सब इस जश्न में शामिल थे...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TBTyrPTiSbI/AAAAAAAAAj4/6nUUGq4lHmI/s1600/ELH3.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 283px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TBTyrPTiSbI/AAAAAAAAAj4/6nUUGq4lHmI/s400/ELH3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5482273471073503666" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गांव-गांव से लोग हाथी का गोश्त खाने के लिए उमड़ पड़े... हाथी के दोश्त की दावत आम हो गई... लोग बोरे और बर्तनों में भरकर गोश्त अपने घर ले गए.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लेकिन कुछ लोग तो ऐसे थे, जो हाथी के गोश्त को कच्चा ही चबा गए... &lt;/span&gt;गोश्त को झपटने के लिए हालत ये थी, कि लोग एक दूसरे से गुत्थमगुत्था भी हो गए... देखते ही देखते मिनटों में ही छह हज़ार किलो का हाथी कंकाल में बदल गया.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हालांकि इस घटना के बाद इंसान और जानवर में फर्क करना ज़रा मुश्किल हो रहा है...&lt;/span&gt;  लेकिन इंसान अपना काम तमाम कर चुका था.. अब बारी जानवरों की थी... और इंसान के बाद वहां कुत्ते भी अपने लिए बोटी-हड्डी की तलाश में मंडराने लगे.. पापी पेट के लिए इंसान सचमुच हैवान बन गया.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एक मरे हुए हाथी के लिए इससे बुरा क्या होगा, कि उसकी मौत पर मातम मनाने के बजाए, लोग उसके मातम का जश्न मना रहे थे...&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-1096915446727332068?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/1096915446727332068/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=1096915446727332068' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/1096915446727332068'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/1096915446727332068'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='और वो हाथी को चट कर गए...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/TBTxrJzAW6I/AAAAAAAAAjo/KLN9DFku6dY/s72-c/ELH.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-2006868277736255684</id><published>2010-05-09T04:21:00.005+09:00</published><updated>2010-05-09T04:34:06.524+09:00</updated><title type='text'>मां तेरे चेहरे में मुझे भगवान नज़र आता है...</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मां... मैंने कभी ख़ुदा की सूरत तो नहीं देखी..&lt;br /&gt;मगर तेरे चेहरे में मुझे भगवान नज़र आता है..&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S-W7IOi6sqI/AAAAAAAAAjg/ZnJqz2eE1Dw/s1600/Mother_child_720.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 319px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S-W7IOi6sqI/AAAAAAAAAjg/ZnJqz2eE1Dw/s400/Mother_child_720.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5468983072529232546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मां &lt;/span&gt;जब मैंने इस दुनिया में आंखे खोली थीं... तो सबसे पहले तेरा ही चेहरा नज़र आया था.. तुम्हारे नाज़ुक हाथों में मेरी परवरिश हुई.. उंगली पकड़कर आपने ही तो मुझे चलना सिखाया था.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जब मैंने बोलना शुरु किया था, तो सबसे पहले मेरे मुंह से मां ही तो निकला था.. और तुम कैसे ख़ुशी से चहकी थीं...&lt;/span&gt; देखो-देखो.. उसने मुझे मां कहा है... घुटनों के बल चलते वक्त जब मुझे ज़रा सी ठेस लग जाती थी, तो कैसे तुम्हारा कलेजा छलनी हो जाता था.. जब मैंने होश संभाला, तब सबसे पहले तुमने ही मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया था... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उसके बाद स्कूल जाने से पहले तुमने ही तो मुझे घर में क ख ग घ सिखाया था... &lt;/span&gt;तुम मेरी मां के बाद मेरी पहली टीचर भी तो बनीं थीं... फिर जब मैं पापा की उंगली पकड़कर स्कूल जाने लगा, तो तुम सुबह सवेरे ही मेरे लिए उठ जाती थीं... पहले मुझे नहलाना-धुलाना, फिर जल्दी से नाश्ता बनाना.. मां तुम्हारे दिन की शुरुआत तो इसी के साथ ही होती थी... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे मैं बड़ा होने लगा...फिर मेरी फ़रमाइशें बढ़ने लगीं... मेरे नख़रे बढ़ने लगे... मेरी शैतानियां बढ़ने लगीं.. लेकिन तुमने हमेशा किसी साए की तरह मेरा साथ निभाया... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मैं बीमार हुआ, तुम रातों को भी मेरी ख़ातिर नहीं सोईं... मुझे दर्द हुआ.. तुम हमेशा मेरी ख़ातिर रोईं... &lt;/span&gt;लेकिन मेरी एहसानफ़रामोशी तो देखो...तुम्हारे खाने से लेकर तुम्हारी बातों तक हर किसी में मुझे ऐब निकालने की आदत थी.. लेकिन तुमने तो कभी उफ़ तक नहीं की... मैंने कितनी बार ज़िद की होगी तुमसे.. लेकिन तुम कभी ख़फ़ा भी तो नहीं होती थी... कितनी बार तुमसे झूठ भी बोला होगा.. लेकिन कभी मुझे सज़ा तक नहीं दी... मुझे अगर ज़ख्म हो जाए... तो मेरी मां की तो जान ही निकल जाती थी... मेरे स्कूल से देर हो जाने पर कैसे तुम बैचेन हो जाया करती थीं... जब पापा कभी मुझे डांटते थे, तो कैसे तुम मुझे अपने पीछे छिपा लिया करती थीं... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़िदगी की धूप में ख़ुद को खड़ा करने वाली मां, हर घड़ी सिर्फ़ मेरे लिए ही दुआ करती है... &lt;/span&gt;मैं जब बड़ा हुआ तो स्कूल से कॉलेज जाने का वक्त आया.. लेकिन घर से बाहर जाने के बारे में सुनकर ही मां कैसे परेशान सी हो गई थीं.. उनके जिगर का टुकड़ा उनसे कहां रहेगा.. कैसे रहेगा.. उसे खाना कौन खिलाएगा, कौन उसके नख़रों को बर्दाश्त करेगा... लेकिन मुझे तो जाना था.. अब घर की दहलीज़ तो छूटना ही थी.. मां ने भी अपने बच्चे के बेहतर मुस्तकबिल के लिए दिल पर पत्थर रख लिया था... अब मां दूर हो गई थी... अब उससे बात करने के लिए एक फ़ोन का ही सहारा था... दूसरे शहर में अब मां की अहमियत का अंदाज़ा हुआ था... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अब याद आती थी.. मां के हाथ की बनी खीर.. बचपन में उनके हाथ से सिले कपड़े.. घर के पीछे वाले पेड़ पर मां के हाथ का बनाया हुआ झूला.. गर्मी में आम का पन्ना.. सर्दियों में मां के हाथ का बुना हुआ स्वेटर..&lt;/span&gt; अभी तो घर छूटा था... लेकिन मंज़िल तो किसी दूसरे शहर में थी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढ़ाई मुकम्मल होने के बाद अब तलाश थी नौकरी की... लेकिन अपने घर में नौकरी का कोई ज़रिया नहीं था... अब छोटे शहर से बड़े शहर की तरफ़ रूख़ करना मजबूरी थी... मां की आंखे नम नहीं थीं... बल्कि अब उनकी आंखों से ज़ार-ज़ार आंसू बह रहे थे..  बेटा अब बहुत दूर जा रहा था... जिगर का टुकड़ा अब शायद परदेसी होने वाला था... उसका दाना-पानी दूसरे शहर में ही लिखा था... अब घर नहीं छूटा था.. अब पापा के साथ मां भी छूट गई थी... घर से विदाई के वक्त पापा ने दिल को तसल्ली दे ली थी... लेकिन मां तो आख़िर मां थी... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उसका लख़्ते-जिगर उसका नूरे-नज़र अब जा रहा था दूर-बहुत दूर... &lt;/span&gt;लेकिन एक बार फिर मां ने अपने अरमानों को जज़्ब कर लिया था... बेटा अब बड़े शहर में था.. लेकिन परदेस में वक्त ने सबकुछ बदल डाला था... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मां से सिर्फ़ फोन पर ही थोड़ी सी गुफ्तुगू होती है... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अब मुनव्वर राना और निदा फ़ाज़ली की ग़ज़लों में मां याद आती है...&lt;/span&gt; अब अकेले में तन्हाई में मां याद आती है... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अब मां के हाथ की करेले की सब्ज़ी बहुत मीठी लगती है...&lt;/span&gt; अब मां घर लौटकर मां की गोद में न तो रोने का वक्त है और न ही मां की गोद में सोने का... अब मां बहुत दूर है... उस छोटे से गांव में जहां वो बेसन की रोटी पर देसी घी लगाती थी... जहां मिट्टी के चूल्हे पर आंखे जलाती है...जहां मेरी ख़ातिर अब भी वो पापा से लड़ जाती है... अब मां याद आती है... सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ, याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ। बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे, आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ। मां मुझे फिर से ले चलो उसी बचपन में जहां मेरी शैतानियां हों... और तुम्हारा ढेर सारा लाड़-प्यार... मेरा वादा है कि फिर मैं तुम्हें तंग नहीं करूंगा.. कभी नहीं.. कभी नहीं... कभी नहीं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-2006868277736255684?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/2006868277736255684/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=2006868277736255684' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2006868277736255684'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2006868277736255684'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/05/blog-post_09.html' title='मां तेरे चेहरे में मुझे भगवान नज़र आता है...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S-W7IOi6sqI/AAAAAAAAAjg/ZnJqz2eE1Dw/s72-c/Mother_child_720.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-8319195925527413186</id><published>2010-05-01T01:13:00.006+09:00</published><updated>2010-05-01T01:32:04.753+09:00</updated><title type='text'>मेरी किस्मत और मेरा चांद..</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S9sFsNZ3OyI/AAAAAAAAAjU/fezB9YfP6Tw/s1600/Moon.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S9sFsNZ3OyI/AAAAAAAAAjU/fezB9YfP6Tw/s320/Moon.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5465968829814749986" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मेरी किस्मत और मेरा चांद&lt;br /&gt;मुझसे खेल रहे थे लुकाछिपी का खेल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा चांद मेरे क़रीब आकर भी दूर हो जाता&lt;br /&gt;और मेरी किस्मत मुझे ठेंगा दिखा जाती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौदहवीं की रौशनी में चमकने के बावजूद&lt;br /&gt;नजूमी के पन्नों में दमकने के बावजूद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूरियों का दायरा...&lt;br /&gt;चांद और किस्मत के दरम्यान और बढ़ गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और मैं फ़ैसला लेने में लाचार था&lt;br /&gt;कि मेरी किस्मत बुलंद है&lt;br /&gt;या मेरा चांद मेरी ज़िंदगी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आख़िर ज़िंदगी के एक मोड़ पर&lt;br /&gt;मेरा चांद बेज़िया होने लगा&lt;br /&gt;और किस्मत ने लुकाछिपी के &lt;br /&gt;इस खेल में मुझे मात दे दी।।&lt;br /&gt;(बेज़िया मतलब डूबना)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-8319195925527413186?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/8319195925527413186/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=8319195925527413186' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8319195925527413186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8319195925527413186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='मेरी किस्मत और मेरा चांद..'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S9sFsNZ3OyI/AAAAAAAAAjU/fezB9YfP6Tw/s72-c/Moon.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-3828192461075160812</id><published>2010-04-28T01:56:00.007+09:00</published><updated>2010-04-28T02:10:23.835+09:00</updated><title type='text'>इस शहर में अब मन नहीं लगता...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S9cZKq2os6I/AAAAAAAAAic/lKvB5kPvEkE/s1600/My+Home.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S9cZKq2os6I/AAAAAAAAAic/lKvB5kPvEkE/s320/My+Home.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5464864343930221474" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बंसत निकल चुका था... हर तरफ फागुन की मस्ती छाई थी.. खेतों में गेंहूं की फसल कट चुकी थी... गन्ना भी खेतों से उठ चुका था...&lt;/span&gt; दिल्ली में बहुत दिन रहने के बाद अकेलेपन में घर की याद सताने लगी थी... मैंने दफ्तर से कुछ दिन की छुट्टी ली और अपने घर चला गया... घर दिल्ली से दो सौ किलोमीटर था, लेकिन अपना था... सफर काटना मुश्किल हो रहा था... मन कर रहा था, कि उड़ते हुए घर पहुंच जाऊं... घरवाले बहुत याद आ रहे थे... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सात घंटे की थकान भरा सफ़र पूरा करने के बाद मैं घर पहुंचा, तो घर में सूने चेहरों पर मुस्कुराहट लौट आई थी.. मेरे जाने से मानों घर खिल चुका था...&lt;/span&gt; घरवाले भी जानते थे, कि मैं दो-या तीन दिन की छुट्टी पर ही आया हूं.. लेकिन उनके लिए इतना ही काफी था, कि मैं उनकी नज़रों के सामने हूं...नाते-रिश्तेदारों से मुलाकात के बाद मैंने अपने खेत पर जाने का फैसला किया... चाचा को साथ लेकर मैं जंगल में अपने खेत पर निकल गया... गन्ने की फसल पूरी तरह उठ चुकी थी... खेत की मेंडों पर चारों तरफ लिप्टिस और पॉपुलर के पेड़ लगा दिये गये थे.. लिप्टस के पेड़ तो अब छाया भी देने लगे थे... बाकी खेत में गन्ने की पेड़ी थी... बीच-बीच में मैंथा भी बो दिया गया था... खेत अपनी तारीफ अपने मुंह से कर रहा था.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S9cZbNQv8HI/AAAAAAAAAik/CWAcGWCTfxM/s1600/Dady.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S9cZbNQv8HI/AAAAAAAAAik/CWAcGWCTfxM/s320/Dady.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5464864628044460146" /&gt;&lt;/a&gt;मेरा मन किया कि अब वापस दिल्ली न जाकर यहीं रुक जाऊं... अब कौन है दिल्ली में.. किसके लिए वापस जाऊं... यहां तो सभी अपने हैं.. मां-बाप हैं.. भाई हैं.. अपना घर है... और सबसे बड़ी बात अपनापन है... कम से कम मां के हाथ का खाना तो मिलेगा... दिल्ली में ढंग से खाना भी नसीब नहीं होता... मां के हाथ का खाना खाए हुए तो महीनों बीत जाते हैं... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;शकरकंद की खीर खाए हुए तो कई साल हो गये... लेकिन इस बार घर पर मां से कहकर गन्ने के रस की खीर ज़रूर बनवाई थी.. बहुत मज़ा आया था उसे खाने में..&lt;/span&gt; कई साल बाद गन्ने के रस की खीर खाने का मौका मिला था...मेरे दिल ने फिर कहा... अब दिल्ली लौटकर क्या करोगे... कोई नहीं है वहां तुम्हारा... सिवाए नौकरी के... वो भी मज़दूरों जैसी... न खाने का होश... न जीने का... लेकिन फिर कहीं मन में एक ख्याल आ जाता.. कि घर पर मैं करूंगा भी क्या... न कोई नौकरी.. न कोई कारोबार... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मन ने कहा..नहीं..नहीं.. अभी नहीं... इतनी जल्दी नहीं... अभी कुछ दिन और देखता हूं... शायद कोई बात बन जाए... इसी उधेड़बुन में छुट्टी के तीन दिन कहां गुज़र गये... पता भी नहीं चला... ऐसा लगा जैसे हवा का एक झोका आया... और सबकुछ उड़ाकर ले गया... मां की आंखों में आंसू थे.. इन तीन दिन में उनसे दो लफ्ज़ ढंग से बाते भी नहीं हुई थीं.. वक्त तो जैसे तूफ़ान की तरह उड़ गया था... &lt;br /&gt;दिल्ली के लिए रावनगी की तैयारी शुरु हो गई... इसी बीच मैंने मौका निकालकर पापा से कह ही दिया...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पापा.. अब दिल्ली में मन नहीं लगता.. वापस घर आने को दिल करता है..&lt;br /&gt;हां... तो आ जाओ.. इसमें परेशानी क्या है...&lt;br /&gt;परेशानी तो कोई नहीं है.. लेकिन मैं सोच रहा हूं, कुछ दिन नौकरी और कर लूं... फिर जल्द ही यहां वापस लौट आऊंगा...&lt;br /&gt;कोई बात नहीं.. तुम अपना मन बना लो... फिर जब चाहें आ जाना.. यहां तो तुम्हारा घर है...&lt;br /&gt;पापा की इतनी सी बात ने बड़ा सहारा दे दिया...&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अनमने मन से घरवालों से विदाई लेकर दिल्ली के लिए रवानगी की... लेकिन घर से निकलते वक्त भी दिल कह रहा था, कि वापस मत जाओ.. वहां कौन है तुम्हारा... किसके लिए जा रहे हो.. लेकिन क्या करता.. नौकरी जो ठहरी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फिज़ा भी मुखालिफ थी.. रास्ते मुख्तलिफ थे... हम कहां मुकाबिल थे.. सारा ज़माना मुख़ालिफ़ था..&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-3828192461075160812?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/3828192461075160812/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=3828192461075160812' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/3828192461075160812'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/3828192461075160812'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/04/blog-post_28.html' title='इस शहर में अब मन नहीं लगता...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S9cZKq2os6I/AAAAAAAAAic/lKvB5kPvEkE/s72-c/My+Home.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-6855691122203773162</id><published>2010-04-01T22:41:00.006+09:00</published><updated>2010-04-01T23:01:51.443+09:00</updated><title type='text'>गरीबों की कार का गरीबों जैसा हश्र...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S7Smfx6puQI/AAAAAAAAAiE/8CLtBXfOLKg/s1600/Maruti+Pics+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 229px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S7Smfx6puQI/AAAAAAAAAiE/8CLtBXfOLKg/s320/Maruti+Pics+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455168113558010114" /&gt;&lt;/a&gt;अरे कहां हैं...आप..? आपके सपनों की कार अब आपसे विदा ले रही है... और आप खामोश हैं... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पहले आपका स्कूटर आपसे विदा हुआ.. और अब आपकी कार...&lt;/span&gt; अरे वही कार जिसके लिए आपने अपनी जेब काटकर कुछ रुपये गुल्लक में जमा किया थे... वही कार जिसके लिए आपने अपना पुराना स्कूटर भी बेच दिया था... चार पहियों वाली छोटी सी वही कार, जिसे शोरूम से घर लाने के बाद आप सीना चौड़ाकर घूमते थे.. जिसके लिए, आपने आनन-फानन में आंगन के बाहर एक गैराज भी तैयार कराया था.. अरे भई कार आ रही है, तो गैराज क्यों नहीं होगा... वरना कार खड़ी कहां होगी... कार आने के बाद उसकी आवभगत में क्या जश्न हुआ था.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कार को देखने के लिए पूरा मोहल्ला जमा हो गया था.. &lt;/span&gt;मजाल क्या कोई बच्चा उसे छू तो ले... उस पर ज़रा सी खरोंच भी आ जाए तो उफ्फ़ जान ही निकल जाए.. वही कार जिसमें बैठकर आप अपने-अपनों को ही भूल जाते थे.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वही कार जिसने सोसाइटी में आपका स्टेटस सिंबल बढ़ा दिया था... अपने बीवी बच्चों के साथ आप जब उस कार में बैठते थे, तो शायद खुद को किसी लॉर्ड से कम नहीं समझते थे.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;घर में सपनों की कार ने आपको बड़ा आदमी बनाया था, तो साथ में अदब और सलीका भी सिखाया था... कपड़े पहनने का सलीका सिखाया था.. &lt;/span&gt;अब कार में बैठने के लिए क्रीज़ वाले ही कपड़े पहने जाते थे.. कार ज़रा सी गंदी हो जाए, तो फिर क्या.. पूरा घर मिलकर उसकी धुलाई-सफ़ाई में लग जाता था.. कार ने ज़रा सी खिचखिच क्या की, बस ज़रा देर में ही पहुंच गई गैराज... उसके नाज़-नखरे उठाने के लिए पूरा घर लग जाता था.. बात-बात में आप कहीं जाने के बहाने ढूंढते थे, ताकि कार को गैराज से निकालकर कहीं तफ़रीह ही कर आएं..&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; कार में बैठने के बाद रूतबा ऐसा बढ़ा था, कि अब नु्क्कड़ की चाय पीने के बजाए रेस्त्रां में बैठकर गप्पें नोश फ़रमाई जाती थीं...&lt;/span&gt; कहीं बाहर खाना खाने के बहाने ढूंढे जाते थे... बेगम और बच्चों के साथ गर्मियों की छु्ट्टियों में पहाड़ पर जाने के प्रोग्राम बनते थे.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S7SlyKELdvI/AAAAAAAAAh8/DLOlw92gBpc/s1600/Maruti+Pics3.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S7SlyKELdvI/AAAAAAAAAh8/DLOlw92gBpc/s320/Maruti+Pics3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455167329766438642" /&gt;&lt;/a&gt;इधर छुटिटयों का ऐलान हुआ, उधर पूरा घर जुट गया तैयारियों में... पीछे डिग्गी में भरा ढेर सारा सामान.. और चल दिये मंज़िल की ओर... और कार बेफिक्र हर कहीं आपके साथ जाने को तैयार.. हरदम तैयार... बस स्टार्ट करने की देर है.. और लो जी चल पड़ी अपनी मंज़िल की तरफ़... फिर चाहें कैसी ही सड़क हो.. सड़क ऊबड़-खाबड़ हो या फिर उसमें गड्ढे हों...पथरीली हो, या फिर पहाड़ की चढ़ाई, बेचारी ने उफ़्फ तक नहीं की... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कार में चलने के बाद आपकी शाहखर्ची भी बढ़ गई थी.. भले ही पैसे से आप अमीर न बने हों, लेकिन कार ने आपका रूतबा तो ज़रूर बढ़ाया था... अब आप सादा फिल्टर के बजाए सिगार पीने लगे थे.. &lt;/span&gt;यार दोस्तों में कार की शानदार सवारी के किस्से बार-बार सुनाए जाते थे... आपकी बेगम मोहल्ले भर की औरतों को कार के किस्से-कहानियां सुनाती थीं.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;और आपके पप्पू की तो पूछिए ही मत.. स्कूल में सब बच्चे अब पप्पू से दोस्ती करना चाहते थे, ताकि किसी बहाने पप्पू की कार में चड्डू खाने को मिल जाए..&lt;/span&gt; चड्डू न सही कम से कम कार तो देखने को मिल ही जाएगी... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक्त का पहिया घूमा तो मारूति ने मिडिल क्लास से निकलकर गरीब आदमी के घर में कदम रखा... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सेकेंड हेंड मारूति के चलन ने उन लोगों को भी कार वाला बना दिया, जो खुद को 'बे'कार समझते थे... कार ने आम आदमी का इतना ख्याल रखा, कि 20 से 50 हज़ार की हैसियत वाले भी मारूति 800 की बदौलत कार वाले हो गए...&lt;/span&gt; लेकिन अब आप बड़े आदमी हो गए, तो उस छोटी सी कार को भला क्यों याद रखेंगे... वक्त के साथ आपके सपने भी बड़े होने लगे हैं... अब मारूति को छोड़कर आप लक्ज़री कार में सवार हो चुके हैं... अब आपको अपनी कार का शीशा हाथ से ऊपर चढ़ाने की ज़रूरत नहीं हैं... अब आपकी गाड़ी में सब कुछ ऑटोमेटिक है... बड़ी कार के साथ रूतबा और भी बढ़ा हो गया है...अब आप ऐसी की ठंडी हवा में लक्ज़री कार की सवारी का लुत्फ़ लेते हैं..देश की बड़ी आबादी को कार वाला बनाने वाली मारूति 800 जा रही है... कभी न लौटकर आने के लिए.. लेकिन आपको क्या.. आपकी बला से... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S7SkkNAGGoI/AAAAAAAAAh0/-c46U7INtHg/s1600/Maruti+Pics.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S7SkkNAGGoI/AAAAAAAAAh0/-c46U7INtHg/s320/Maruti+Pics.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455165990524820098" /&gt;&lt;/a&gt;26 साल का लंबा अरसा तय करने के बाद मारूति कंपनी ने उस कार को बंद करने का फैसला किया है, जो हिंदुस्तान के मिडिल क्लास के परिवार को ढोती थी...जो किसी वक्त में हिंदुस्तान के सुखी परिवार का स्टेट्स सिंबल बन चुकी थी.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;14 दिसंबर 1983 को जब इंदिरा गांधी ने इसे गुड़गांव से लॉंच किया था, तो कार बाज़ार में तहलका मच गया था... &lt;/span&gt;हालांकि भारत में उस वक्त कुछ गिनी-चुनी ही कारें थीं.. और वो भी अमीरों के शौक में शामिल थीं... मिडिल क्लास तो तब कार के बारे में सोच भी नहीं सकता था.. मारूति से सिर्फ़ खानदान ही नहीं जुड़े थे, बल्कि इस कार के साथ जज़्बात जुड़े थे... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;26 बरस में मारूति ने करीब 28 लाख से ज्यादा 800 मॉडल की कारें बेचीं.. लेकिन आज वही कंपनी कह रही है, कि हम भावनाओं को हावी नहीं होने देते..&lt;/span&gt; देश में ख़तरनाक होती आबोहवा के लिए अब इस बेचारी को भी ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है... लेकिन कोई ये नहीं कहता कि सड़कों पर दनानदन दौड़ रही कारें भी तो इसके लिए ज़िम्मेदार हैं... फिर बेचारी अकेली मारूति 800 पर ही तोहमत क्यों..?  कंपनी ने बाकी सभी कारों को यूरो-4 पर अपग्रेड कर लिया है, और मिडिल क्लास के बाद आम आदमी की इस कार पर किसी को ज़रा भी तरस नहीं खाया...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-6855691122203773162?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/6855691122203773162/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=6855691122203773162' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6855691122203773162'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6855691122203773162'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='गरीबों की कार का गरीबों जैसा हश्र...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S7Smfx6puQI/AAAAAAAAAiE/8CLtBXfOLKg/s72-c/Maruti+Pics+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-5515655427610784968</id><published>2010-03-16T02:07:00.008+09:00</published><updated>2010-03-16T02:55:23.897+09:00</updated><title type='text'>ये तस्वीरें ज़रूर देखिए.. बहुत कुछ कहती हैं...</title><content type='html'>इस बार ब्लॉग की पोस्ट बिल्कुल ही अलग सी है.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इस बार कलम नहीं सिर्फ तस्वीरें बोलेंगी... देखने में भले ही ये तस्वीरें मामूली सी हों... लेकिन इनके पीछे कई सदियां छिपी हुई हैं.. &lt;/span&gt;इन तस्वीरों में जीकर तमाम पीढ़ियां गुज़र गईं... ये तस्वीरें बेशक गुजरे ज़माने की दास्तान बयान करती हों... लेकिन इन तस्वीरों के पीछे फोटोग्राफी की कई दास्तानें छिपी हैं... एक दौर छिपा है, जिसकी कहानियां हम आज की पीढ़ी को सुनाते हैं.. ये तस्वीरें गुज़रा ज़माना याद कराती हैं.. तो बचपन के दिनों को याद कराकर आंखों को भी नम कर देती हैं...&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55qvCM6b5I/AAAAAAAAAhM/5IiMUEds2dM/s1600-h/3.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 272px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55qvCM6b5I/AAAAAAAAAhM/5IiMUEds2dM/s400/3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5448909955442306962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अब ज़रा चाची की इस इस तस्वीर को ही गौर से देख लीजिए&lt;/span&gt;... फोटो खिंचवाने का ये भी एक अनूठा ही शौक था.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फोटो स्टूडियो में नकली मोटरसाईकिल पर बैठकर फोटो खिंचवाने का भी अपना ही अलग मज़ा था... और पीछे सवारी भी बैठी हो, फिर तो क्या कहने... &lt;/span&gt;क्यों जी कुछ याद आया.. आंटी जी की इस तस्वीर को देखकर.. घर के पास वाले मेलों में तो अपने भी ऐसी तस्वीरे ज़रूर खिंचवाई होगी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55tOY0rJoI/AAAAAAAAAhc/NIjrjnQQZA8/s1600-h/2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 214px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55tOY0rJoI/AAAAAAAAAhc/NIjrjnQQZA8/s320/2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5448912693113857666" /&gt;&lt;/a&gt;चलिए अब एक और तस्वीर से आपको रूबरू कराते हैं.. 80 से 90 के दौरान अगर आपकी शादी हुई होगी, तो अपनी बेगम के साथ आपने भी तस्वीर तो ज़रूर खिंचवाई होगी.. क्या कमाल के फोटग्राफर हुआ करते थे... आपके इशारे से पहले ही समझ जाते थे, कि आपको ऐसी तस्वीर चाहिए, जिससे ये साबित हो जाए, कि आप उसके लिए चांद ही तोड़कर ले आए.. ढूंढिए अपने घर में भी कोई ऐसी तस्वीर...&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चांद में से झांकते शौहर जनाब अपनी बीवी को दिलासा दिला रहे हैं कि बेगम मान भी जाओ.. असली न सही, कम से कम आपके लिए चांद तो ले ही आया.. &lt;/span&gt;लेकिन बेगम हैं कि फोटो में भी रूठी-रूठी नज़र आती हैं.. तस्वीर में चांद भी है, दिल भी है, लेकिन दिलरुबा रूठी-रूठी सी है.. इंडियन फोटोग्राफी का पूरा कमाल है.. लेकिन कमाल ये है कि बेगम हैं कि मानती ही नहीं.. कुछ याद करिए.. आपने भी ऐसी तस्वीर ज़रूर बनवाई होगी.. तो निकालिए अपनी एलबम और गुज़रे ज़माने को भी ज़रा याद कर लीजिए.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55u_NhiLrI/AAAAAAAAAhk/aOCuG0yKl8w/s1600-h/1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 206px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55u_NhiLrI/AAAAAAAAAhk/aOCuG0yKl8w/s320/1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5448914631406005938" /&gt;&lt;/a&gt;अब एक तस्वीर यारबाज़ों के लिए.. ये उनके लिए जिन्हें काम के बाद यारी का बड़ा शौक था.. दोस्तों के साथ घूमने जाने के बहाने ढूंढते थे... और बात-बात पर पहुंच जाते थे फोटोग्राफर भाईसाहब के पास.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नए-नए कपड़ों और सूटबूट में सजधजकर पहुंच गए तस्वीर खिंचवाने.. लेकिन वो तस्वीर ही क्या जिसमें टशन न हो.. जिसमें अदा न हो.. दोस्तों का साथ हो और एक्टिंग न हो, तो फिर क्या कहने.. &lt;/span&gt;फोटोग्राफर की दुकान पर अदा दिखाने का पूरा सामान मौजूद होता था.. बस फिर क्या था.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हाथ में पकड़ा टेलीफोन और पीछे टेलिविज़न.. बगल में खड़े हो गए साथी.. क्या कमाल की पिक्चर होती थी.. पीछे पहाड़ों का नज़ारा, कुर्सी पर बैठकर बन गये लाट साहब..&lt;/span&gt; फोटोग्राफर ने कहा स्माइल प्लीज़... और लो जी खिंच गई तस्वीर... अपने यार दोस्तों के साथ तो आपने भी ज़रूर खिंचवाई होगी ऐसी तस्वीर.. क्यों जी याद आए दोस्तों के साथ कुछ पुराने दिन..यारबाज़ी के दिन...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55xvduOpoI/AAAAAAAAAhs/8dUqMYVkQmo/s1600-h/4.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55xvduOpoI/AAAAAAAAAhs/8dUqMYVkQmo/s320/4.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5448917659411195522" /&gt;&lt;/a&gt;ये तस्वीर देखकर आपको हंसी तो आ रही होगी, लेकिन हंसियेगा मत.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कभी न कभी तो आपने भी किसी के साथ ऐसी तस्वीर खिंचवाई होगी.. रानी मुखर्जी न सही, प्रीती जिन्टा ही सही.. कुछ नहीं तो माधुरी के साथ ही.. आपके दिल ने भी धक-धक तो किया ही होगा... &lt;/span&gt;अरे क्या हुआ असली न सही.. तो उसकी तस्वीर ही सही... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कम से कम तस्वीर ने तसव्वुर करने को कब मना किया है...&lt;/span&gt; पीछे पहाड़ों का खूबसूरत नज़ारा और बगल में रानी मुखर्जी हो.. तो किस कमबख्त का मन नहीं करेगा...एक अदद तस्वीर बनवाने के लिए... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बस रानी मुखर्जी की कमर में डाल दिया हाथ.. कौन सा रानी मुखर्जी मना कर रही है.. और फिर वैसे भी फोटोग्राफर तो पूरे ही पैसे लेगा..&lt;/span&gt; और फिर जब मौका मिल रहा है, तो क्यों न कैश करा लिया जाए... मेला भी याद रहेगा.. और मेले में खिंचवाई तस्वीर भी..तस्वीरें भले ही पुराने दौर की हों... लेकिन एक दौर को याद करा गईं... कुछ भूला-बिसरा वक्त..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-5515655427610784968?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/5515655427610784968/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=5515655427610784968' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5515655427610784968'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5515655427610784968'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='ये तस्वीरें ज़रूर देखिए.. बहुत कुछ कहती हैं...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55qvCM6b5I/AAAAAAAAAhM/5IiMUEds2dM/s72-c/3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-6907633426228127312</id><published>2010-02-27T13:56:00.010+09:00</published><updated>2010-02-27T17:13:42.536+09:00</updated><title type='text'>दुनिया का सबसे ऊंचा पेट्रोल पंप...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S4iyZ3irtUI/AAAAAAAAAf8/7ElGsrDvIcE/s1600-h/Pet.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S4iyZ3irtUI/AAAAAAAAAf8/7ElGsrDvIcE/s400/Pet.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5442796307153139010" /&gt;&lt;/a&gt;सबसे पहले आप ये तस्वीर देख लीजिए.. और तस्वीर में इस बोर्ड पर जो लिखा है उसे भी गौर से पढ़ लीजिए... जी हां &lt;strong&gt;सबसे ऊंचा पेट्रोल पंप.. और सबसे ऊंचा सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे ऊंचा पेट्रोल पंप.. या ये भी कह सकते हैं कि भारत-तिब्बत सीमा पर सबसे आखिरी पेट्रोल पंप... &lt;/strong&gt;अगर यहां आकर आपकी गाड़ी में पेट्रोल ख़त्म हो गया.. तो समझो.. फिर तो आपकी गड्डी चलने से रही... हिंदुस्तान के इस अनूठे पेट्रोल पंप पर भी हम आपको ले चलेंगे.. लेकिन उससे पहले ये जान लेना ज़रूरी है, कि भारत का ये सबसे आखिरी और दुनिया का सबसे ऊंचा पेट्रोल पंप आखिर हैं कहां..?  शिमला से करीब 425 किलोमीटर और समुद्रतल से 3800 मीटर ऊंचाई पर एक छोटा सा कस्बा है काज़ा... हिमाचल के लाहौल-स्पीति ज़िले में मौजूद इस कस्बे की खूबसूरती देखते ही बनती है... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो पूरे लाहौल-स्पीति को ही बर्फीला रेगिस्तान कहा जाता है... लेकिन काज़ा की पहाड़ियों पर जमी बर्फ और हल्के काले बादल इसको और भी दिलकश बना देते हैं... लाहौल स्पीति की पूर्वी सीमा तिब्बत से मिलती है और तिब्बत की सीमा के पास ही मौजूद है काज़ा.. स्पीति नदी के किनारे पहाड़ी की चोटी पर बसे इस छोटे से कस्बे में कुछ होटल्स और रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए छोटा सा बाज़ार भी है...&lt;strong&gt;हालांकि काज़ा के बारे में कहा जाता है कि यहां ऑक्सीजन की कमी की वजह से कई बार आपको सांस लेने में भी दिक्कत हो सकती है..&lt;/strong&gt; लेकिन यहां पहुंचने का रोमांच सारी थकावट को दूर कर देता है... काज़ा से कुछ ऊपर ही है रोहतांग दर्रा, जिसकी समुद्रतल से ऊंचाई तकरीबन 3980 मीटर है.. और रोहतांग जाने वाले काज़ा से होकर ही गुज़रते हैं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S4iy-eikbXI/AAAAAAAAAgE/EOBJLoSJhtw/s1600-h/Pet2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S4iy-eikbXI/AAAAAAAAAgE/EOBJLoSJhtw/s400/Pet2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5442796936096935282" /&gt;&lt;/a&gt;मनाली से भी काज़ा के लिए आपको टैक्सियां मिल सकती हैं... लेकिन सर्दियों में जब बर्फ ज्यादा पड़ती है, तो काज़ा जाने वाले रास्ते भी कुछ वक्त के लिए बंद हो जाते हैं... कई बार तो बिजली की भी दिक्कत आने लगती है... काज़ा से करीब बीस किलोमीटर दूर है किब्बर गांव... काज़ा से किब्बर जाने वाले रास्ते में ही पड़ता है दुनिया का सबसे ऊंचा पेट्रोल पंप... छोटे से गांव किब्बर कि आबोहवा इतनी खुशनुमा है कि मन करता है, बस यहीं के होकर रह जाओ... &lt;strong&gt;यहां की चोटियों पर खड़े होकर लगता है कि आसमान अब और दूर नहीं है और अगर एक पत्थर भी तबियत से उछाला जाए, तो यकीनन आसमां में सुराख हो सकता है...&lt;/strong&gt;  काज़ा के पास ही इंडियन ऑयल ने बनाया है अनूठा रिकॉर्ड.. दुनिया का सबसे ऊंचा पेट्रोल पंप कायम करने का... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पेट्रोल पंप पर वो सभी सहूलियतें हैं जो किसी दूसरे पेट्रोल पंप पर होती हैं... पेट्रोल-डीज़ल के साथ ही, फर्स्ट एड तक... पहाड़ी पर मौजूद पेट्रोल पंप छोटा ज़रूर है, लेकिन आपके सफ़र में कभी रुकावट नहीं आने देता... पेट्रोल पंप के आस-पास सफेद चांदी जैसी बर्फ की चोटियां आपको बरबस ही अपने आगोश में ले लेती है... &lt;strong&gt;तिब्बत की सीमा से सटे इस पेट्रोल पंप पर जो भी आता है, वो खुद पर फख्र ज़रूर करता है... इस पेट्रोल पंप के कुछ लम्हों को अपने कैमरे में ज़रूर कैद करता है...&lt;/strong&gt; खास बात ये है कि पेट्रोल पंप के बड़े से बोर्ड के नीचे सर्व शिक्षा अभियान का नारा भी लिखा है.. &lt;strong&gt;जो माता-पिता शिक्षित होंगे, संतान उसी की सुखी होगी...  &lt;/strong&gt;यानि इंडियन ऑयल का ये पंप, न सिर्फ पहाड़ की मुश्किल राहों को आसान बना रहा है, बल्कि सरकार के नेक काम में भी इसने भागीदारी निभाई है... वाकई लाजवाब है भारत का आखिरी और दुनिया का सबसे ऊंचा पेट्रोल पंप...&lt;br /&gt;आखिर में काज़ा से जुड़ी एक और दिलचस्प बात.. जब मैंने ये पोस्ट पब्लिश की, उसके बाद मेरे पास आदर्श का फोन आया, आदर्श का कहना था, कि &lt;strong&gt;काज़ा वैसे तो एक टूरिस्ट प्लेस है ही, लेकिन जब किसी अधिकारी या कर्मचारी को सज़ा देना होती है, तो सरकार उसका ट्रांसफर काज़ा में कर देती है... &lt;/strong&gt;है न दिलचस्प बात..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-6907633426228127312?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/6907633426228127312/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=6907633426228127312' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6907633426228127312'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6907633426228127312'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/02/blog-post_27.html' title='दुनिया का सबसे ऊंचा पेट्रोल पंप...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S4iyZ3irtUI/AAAAAAAAAf8/7ElGsrDvIcE/s72-c/Pet.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-3614036462434506826</id><published>2010-02-08T03:42:00.004+09:00</published><updated>2010-02-08T03:52:06.428+09:00</updated><title type='text'>जब कोई आपसे रूठ जाए...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S28KagrIZmI/AAAAAAAAAfM/oGN6YhJBo5g/s1600-h/Bewafai2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S28KagrIZmI/AAAAAAAAAfM/oGN6YhJBo5g/s320/Bewafai2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5435574725823194722" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जब आपका कोई आपसे रूठ जाए तो आप क्या करते हैं... &lt;/span&gt;उसे मनाने की कोशिश करते हैं न..? लेकिन फिर भी कोई आपसे रूठा ही रहे तो आप क्या करेंगे.. उसे एक बार फिर से मनाने की कोशिश करेंगे... लेकिन अगर वो आपसे मिलना ही न चाहे तब आप क्या करेंगे... क्या कोई किसी से इस कदर भी रूठ सकता है, कि वो फिर उसे मनाने का मौका भी न दे... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्या कोई गुनाह इतना बड़ा भी हो सकता है, कि उसकी माफी नहीं हो सकती...&lt;/span&gt; इक छोटी सी बात क्या तमाम रिश्तों को ख़त्म कर देती है, क्या तमाम जज़्बात ख़त्म हो जाते हैं... क्यों तुम मेरे साथ खुद को भी सज़ा दे रहे हो... अगर कसूर मेरा है, तो सज़ा भी मुझे मिलनी चाहिए.. तुम बेवजह गुनाह में भागीदार क्यों बन रहे हो... तुम भले ही अपने दिल पर पत्थर रखकर उसे समझाने की कोशिश करो... लेकिन मैं ये अच्छी तरह जानता हूं, कि खुश तुम भी नहीं हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेशक ख़ताओं की सज़ा दी जाए.. लेकिन एक बार ख़तावार की बात भी तो सुन लेना चाहिए... ये जानते हुए भी कि कुछ गलतफहमियां किसी की ज़िंदगी को ज़र्रा-ज़र्रा भी कर सकती हैं... फिर कुछ नादानियां किसी को उम्र भर की सज़ा कैसे दे सकती हैं... मुमकिन है कोई किसी को भुला देता हो, लेकिन उसकी यादों को मिटाना तो नामुमकिन है...&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; तस्वीरें कमरे से हटाई जा सकती हैं... लेकिन जो यादें दिलों में बस गईं उनको कैसे मिटाया जा सकता है... &lt;/span&gt;अपनी तस्कीन के लिए हम किसी को भुलाने की कोशिश कर सकते हैं... लेकिन भुला तो नहीं सकते न... बंदूक की गोली के ज़ख्म मुकर्रर वक्त पर भर जाते हैं... लेकिन प्यार के अंजाम में मिला ये घाव तो उम्र भर के लिए तड़पने को मजबूर कर देता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S28LTT8Nl3I/AAAAAAAAAfU/Wajq8s3pqG8/s1600-h/Alone3.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S28LTT8Nl3I/AAAAAAAAAfU/Wajq8s3pqG8/s320/Alone3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5435575701657720690" /&gt;&lt;/a&gt;ये कैसे मुमकिन है, कि दो प्यार करने वाले ही फिर एक-दूसरे से हमेशा-हमेशा नफ़रत करने लगें... शिकवा तो ये कि हमने कभी खुद को बदला ही नहीं... मिले भी हर किसी से, लेकिन अफ़सोस के अजनबी ही बने रहे... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्यार कैसे किसी के लिए सज़ा बन जाता है... बाद नफ़रत के फिर एक दर्द का सिलसिला सा शुरु हो जाता है... &lt;/span&gt;प्यार तो हज़ार गुनाहों को माफ करता है, लेकिन फिर यही प्यार कैसे नफ़रत की वजह बन जाता है... कैसे शबनम शोलो में बदल जाती है... कैसे रुखसार पर ढलकने वाले आंसुओं का मतलब बदल जाता है... बेशक प्यार कभी कुछ जानकर नहीं होता... लेकिन एहसास तो हो ही जाता है... ज़रूरी तो नहीं कि प्यार जताने के लिए इज़हार की ज़रूरत ही पड़े... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यार तो आंखो की जुबां समझता है... जज़्बातों को पढ़ लेता है... कई बार तो लगता है कितनी आसान थी वो ज़िंदगी, जब हमारी सिर्फ खुशी से दोस्ती थी...अब लगता है &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कितनी अजीब है ज़िंदगी किसी को प्यार नहीं मिलता, तो किसी को मिलकर भी नहीं मिलता... &lt;/span&gt;लेकिन हमें तो कुछ पल की मोहलत भी न मिली...न तो वक्त ने हम पर रहम किया और न ज़माने ने... उनकी नज़रों ने हमें पल भर में ही रुसवा कर दिया... न हम सच्चे प्यार के काबिल रहे और न उन्होंने ही हमें एतबार के काबिल समझा... जिसके लिए रास्ते की तमाम बंदिशों को तोड़ा, एक दिन वही साथ छोड़कर चला जाता है.. बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताए, बिना कुछ सुने... इक सज़ा दे जाता है...  उम्र भर भुगतने के लिए... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कुछ तबीयत ही मिली थी ऐसी, चैन से जीने की सूरत ना हुई&lt;br /&gt;जिसे चाहा उसे अपना ना सके जो मिला उससे मुहब्बत ना हुई&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-3614036462434506826?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/3614036462434506826/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=3614036462434506826' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/3614036462434506826'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/3614036462434506826'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/02/blog-post_08.html' title='जब कोई आपसे रूठ जाए...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S28KagrIZmI/AAAAAAAAAfM/oGN6YhJBo5g/s72-c/Bewafai2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-8626504523283317158</id><published>2010-02-05T03:57:00.005+09:00</published><updated>2010-02-05T04:10:53.792+09:00</updated><title type='text'>मेरी जुगाड़ यात्रा...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S2saL_2mXzI/AAAAAAAAAe8/eLwhqmtLzrw/s1600-h/jugar2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 203px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S2saL_2mXzI/AAAAAAAAAe8/eLwhqmtLzrw/s320/jugar2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5434466168773959474" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जुगाड़..&lt;/span&gt; नाम सुनकर आपको कुछ अटपटा ज़रूर लगेगा.. लेकिन जनाब चौंकिए मत.. इस जुगाड़ पर तो आपकी और हमारी पूरी ज़िंदगी चल रही है.. ताज़ा-ताज़ा जुगाड़ आजकल झारखंड में चल रहा है.. क्या जुगाड़ लगाया, बीजेपी ने.. उन्हीं सोरेन साहब को पटा लिया, जिन्हें वो पानी पी-पीकर कोसती थी... लेकिन ये तो कुछ भी नहीं है.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जुगाड़ तो 1999 में हुआ था.. &lt;/span&gt;जब अटल जी एनडीए के 13 पहियों के रथ पर सवार होकर आए थे... बाद में उसमें कितने और जुड़े थे, अब तो ठीक से याद भी नहीं... लेकिन जुगाड़ का वो फार्मूला पूरे पांच साल चला था। लेकिन बात अब असली जुगाड़ की... असल में मेरा मकसद आपको जुगाड़ की यात्रा कराना था.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनवरी के पहले हफ्ते की बात है.. मेरे चाचा और चाची हज से लौटकर आए, लिहाज़ा उनसे मिलने जाना भी ज़रूरी था... दिल्ली से खतौली तक का सफ़र तो बस से पूरा हो गया.. लेकिन खतौली से आगे उनके गांव फुलत तक जाने के लिए न तो बस थी, और न ही कोई ट्रेन... गांव तक जाने के लिए बस एक ही साधन था... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जुगाड़.. क्या कमाल की गाड़ी है.. रतन टाटा देख लें तो शर्मा जाएं... &lt;/span&gt;उनकी लाख टके की नैनो तो जुगाड़ के आगे पानी भरती नज़र आए.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नैनो में कहां चार लोग ही बैठ सकते हैं... ज़रा वज़न ज्यादा हुआ, तो क्या भरोसा नैनो चलने से मना कर दे... &lt;/span&gt;लेकिन अपना जुगाड़ मस्त है... एक ही खेप में इंसान और जानवर एक साथ उसपर सवारी करते हैं... फिर भी जगह बाकी है, तो कुछ बोझा भी लाद लो... लेकिन अपना जुगाड़ उफ़ तक नहीं करता... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S2sbR1_qp3I/AAAAAAAAAfE/Hf4ektUIwNU/s1600-h/jugar4.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S2sbR1_qp3I/AAAAAAAAAfE/Hf4ektUIwNU/s320/jugar4.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5434467368718477170" /&gt;&lt;/a&gt;सड़क चाहें कैसी भी हो, ऊबड़-खाबड़ हो... पथरीली हो या रपटीली हो... जुगाड़ जब चलता है तो मस्त चलता है... उड़नखटोले जैसी दिखने वाली &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इस गाड़ी की डिज़ाइनिंग भी ऐसी लाजवाब कि अच्छे-अच्छे इंजीनियर भी चकरा जाएं... &lt;/span&gt;दुनिया में चार पहियों की इससे सस्ती गाड़ी तो शायद अबतक नहीं बनी होगी... क्या कमाल का जुगाड़ है... सबसे पहले डीज़ल इंजन के पुराने जनसैट का जुगाड़ किया... फिर कहीं से जीप का स्टैयिरंग लिया और उसमें ट्रैक्टर का गियर बॉक्स लगा दिया... एक्सीलेटर, क्लच और ब्रेक भी ट्रैक्टर के पुराने पुर्ज़ों से जुगाड़ लिये... लो जी आधी गाड़ी तो तैयार... लेकिन पहिए अभी बाकी हैं... सो पुरानी जीप और पुराने ट्रैक्टर से ये प्रॉब्लम भी सॉल्व हो गई... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद कहीं से लकड़ी के कुछ पटले जुगाड़े और उन्हें मैकेनिक के यहां ले जाकर एक जुगाड़ वाली बॉडी बनवा ली.. फिर उसे फिट करा लिया... लो हो गया तैयार जुगाड़... न हींग लगी और न फिटकरी और रंग भी चोखा हो गया... अब चाहें इस पर खेत-खलिहान का बोझा लादो, या दरोगा जी की नाक के नीचे सवारियां भरो.. हाईवे पर दौड़ाओ या खेतों में, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अपना जुगाड़ मस्त है... न रजिस्ट्रेशन का झंझट, न ड्राइविंग लाईसेंस की चिकचिक.. आखिर पूछता कौन है... &lt;/span&gt;बच्चे चलाएं या बूढ़े... जुगाड़ चलता जाता है... बिना किसी की परवाह किये... हिचकोले खाता.. हवा से बातें करता.. अपना जुगाड़ दौड़ता जाता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जुगाड़ का भी एक दर्द है, देश की आधी आबादी उसके भरोसे टिकी है.. सैकड़ो गांव तो ऐसे हैं, जहां अगर जुगाड़ न हो, तो शायद वहां के लोग शहर का मुंह भी न देख पाएं... लेकिन फिर भी इस जुगाड़ की कोई कद्र ही नहीं... सब उसे बड़ी हिकारत की नज़र से देखते हैं... जनता के लिए बिजली सड़क पानी का दावा करने वाली सरकारों को तो शायद मालूम भी नहीं होगा, कि मुल्क में करीब आधी आबादी आज भी जुगाड़ पर टिकी है... और बाकी लोग भी देख रहे हैं, कि उनका देश भी जुगाड़ से ही चल रहा है... सरकारें ही जब जुगाड़ पर टिकी हों, तो ज़मीन पर रहने वालों को पूछता ही कौन है... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सब्र कर जुगाड़ एक दिन तेरे भी पूछ होगी, जब अमेरिका चुपके से जुगाड़ का भी पेटेंट करा लेगा और फिर हम इंपोर्टेड जुगाड़ पर सफर करके बड़ा फख्र महसूस करेंगे...&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-8626504523283317158?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/8626504523283317158/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=8626504523283317158' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8626504523283317158'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8626504523283317158'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='मेरी जुगाड़ यात्रा...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S2saL_2mXzI/AAAAAAAAAe8/eLwhqmtLzrw/s72-c/jugar2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-7999264624766642975</id><published>2010-01-24T14:03:00.010+09:00</published><updated>2010-01-24T14:26:15.826+09:00</updated><title type='text'>मेला.. जाने कहां गये वो मेले</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S1vWizra_aI/AAAAAAAAAec/TzomsahZ32w/s1600-h/Mela2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S1vWizra_aI/AAAAAAAAAec/TzomsahZ32w/s320/Mela2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5430169669201493410" /&gt;&lt;/a&gt;बचपन में मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी पड़ी थी ईदगाह... उसमें हामिद नाम का एक छोटा सा बच्चा था, जो अपनी दादी के लिए मेले से एक चिमटा लाया था, ताकि उसकी दादी के हाथ जलने न पाएं... उस कहानी को पढ़कर दो आंसू हामिद और उसकी दादी के लिए ज़रूर छलक आते थे... लेकिन न तो अब हामिद है, न उसकी दादी और न ही अब कहीं मेले नज़र आते हैं... हिंदुस्तान की पहचान मेले गांव-देहातों की शान हुआ करते थे, &lt;strong&gt;मेलों में सज धजकर जाना फख्र की बात माना जाता था... &lt;/strong&gt;जहां कहीं मेला लगता था, वहां तो समझो ईद हो जाती थी.. बड़ी फुर्सत से जाते थे मेले में... दूर-दूर से नाते-रिश्तेदार भी मेला करने आते थे... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे कस्बे में भी साल में कई मर्तबा मेला लगता था... लेकिन सबसे मशहूर मेला मुहर्रम का था.. दूर-दूर से दुकाने आती थीं, जिसमें बच्चों के लिए तमाम तरह के खिलौनों की दुकाने होती थीं, तो कहीं औरतों के लिए बिसातखाने की दुकाने... कहीं-कहीं हर माल वालों की दुकान भी होती थी, जहां पांच रुपये में सुई से लेकर मानों तो हवाई जहाज तक मिल जाता था... तो कहीं हल्वे-पराठे और जलेबियों की दुकाने भी लगती थी... गर्मागर्म जलेबी खाने के बाद अगर आपकी जीभ को कुछ चटपटा खाने की मंशा हो, तो समोसों से लेकर आलू टिक्की और गोल गप्पे तक हाज़िर होते थे... &lt;strong&gt;गोल गप्पे भी दिल्ली की तरह नहीं.. पांच रुपये में तीन&lt;/strong&gt;... वहां तो भरपेट खाओ.. जितना मन करे, कचौड़ियों से लेकर पकौड़ियों तक.. लेकिन दाम बस एक से दो रुपये तक... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S1vW4Rp0aNI/AAAAAAAAAek/DLFnof0OC5A/s1600-h/Mela+Muharram.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S1vW4Rp0aNI/AAAAAAAAAek/DLFnof0OC5A/s320/Mela+Muharram.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5430170038025087186" /&gt;&lt;/a&gt;मेले में खिलौनो और खील-बताशों के बीच ही सबीलें भी लगाई जाती थीं, जहां लोगों को शर्बत पिलाया जाता था....अगर अब आप खाने-पीने और दुकानदारी से निपट गये हों, तो चले आईए मेले के दूसरे छोर पर... अहा.. क्या-क्या नज़ारे होते थे... बड़े-बड़े झूले...जिसमें बैठने के बाद रोंगटे खड़े हो जाएं... और कोई पहली बार बैठ गया, तो समझो उसको तो चक्कर आ जाए... झूले में बैठने के बाद लगता था, कि बस सबसे ऊपर तो अब हम ही हैं... मेले में फोटोग्राफर की दुकान पर सबसे ज्यादा मजमा जुटता था...नौजवान लड़के-लड़कियां बड़ी अदा के साथ उसकी दुकान पर फोटो खिंचवाते थे... कोई हाथ में टेलीफोन लेकर फोटो खिंचवाता था, तो कोई मोटरसाईकिल पर सवार होकर अपनी तस्वीर बनवाता था.. चश्मा लगाकर और बन-ठनकर फोटो खिंचवाने वालों की तो पूछिए मत... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ़ तमाशे वाले.. एक से एक तमाशे... कहीं मदारी बंदर का नाच दिखा रहा है, तो कहीं जादूगर बच्चे का सिर धड़ से काट देता था, और तमाशा देखने वाले दूसरे बच्चों का तो खून सूख जाता था... फिर जादूगर सबको धमकाकर कहता था, कि जो आदमी यहां से बिना पैसे दिये जाएगा.. वो घर तक सही सलामत नहीं पहुंच पाएगा... उसको जादू के करतब से मैं बीमार कर दूंगा... और मासूम बच्चे डर के मारे घर से जो पैसे लेकर आते थे, वो सब उसी को देकर चले जाते थे... इसके बाद बारी आती थी सर्कस की... अजब-गजब करतब करती लड़कियों को देखने के लिए पूरा का पूरा कस्बा जुट जाता था... सर्कस के बाहर शेर का बड़ा सा बोर्ड भी लगा होता था, लेकिन शेर कभी नज़र नहीं आया...&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S1vZFDnmQLI/AAAAAAAAAes/NkS2lUq8BNk/s1600-h/Mela3.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 176px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S1vZFDnmQLI/AAAAAAAAAes/NkS2lUq8BNk/s320/Mela3.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5430172456619229362" /&gt;&lt;/a&gt;वहीं पास में ही एक छोटा सा सनीमा वाला &lt;strong&gt;रोज़ाना तीन शो... शोले..शोले..शोले... सुपर डुपर हिट फिल्म... ज़रुर देखिए.. ज़रूर देखिए&lt;/strong&gt; की आवाज़ लगाता था... सनीमा क्या था... पूरा जुगाड़ था... पटलों पर बैठकर वीसीआर पर फिल्म देखते थे... सनीमा से फ्री होने के बाद देर रात में एक और शो चलता था... नाम था डांस पार्टी... पता नहीं कहां से उसमें लड़कियां डांस करने आती थीं.. लेकिन उसमें मजमा बहुत जुटता था... देर रात तक डांस पार्टी चलती थी... और बिगड़ैल शहज़ादे उसमें पैसे लुटाकर देर रात घर लौटते थे... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सनीमा और सर्कस से निपट गये हों, तो चलिए आपको लेकर चलते हैं अजब अनूठे करतब में... जहां एक आदमी ऐलान करता है, कि वो बारह दिन तक साईकिल पर ही सवार रहेगा और बारहवें दिन समाधि ले लेगा... अजीबो-गरीब तमाशा होता था वो... आदमी बारह दिन तक साईकिल चलाता रहता था... उसी पर बैठकर खाता था... उसी पर नहाता था... गरज ये कि बारह दिन तक सारे काम साईकिल पर ही बैठकर करता था, फिर बारहवें दिन एक बड़ा सा गड्डा खोदा जाता था, जिसमें वो साईकिल समेत चला जाता था... फिर उसकी कब्र बनाई जाती थी, मतलब ये कि ज़िंदा आदमी कब्र में दफ्न.. फिर उसे दो दिन बाद कब्र से निकाला जाता था... और वो उसमें से जिंदा निकलता था... लेकिन इतना सब करने के बाद भी उसे मामूली से पैसे मिलते थे... लेकिन पेट भरने के लिए शायद उतना ही काफी होता था... हां इतना ज़रूर होता था, कि उस वक्त तमाशे और मेलों में भीड़ बहुत जुटती थी.. शायद उस वक्त लोगों को फुर्सत बहुत रही होगी... अब न वो मेले हैं और न फुरसत के वो चार दिन... जाने कहां गये वो मेले...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-7999264624766642975?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/7999264624766642975/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=7999264624766642975' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/7999264624766642975'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/7999264624766642975'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/01/blog-post_24.html' title='मेला.. जाने कहां गये वो मेले'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S1vWizra_aI/AAAAAAAAAec/TzomsahZ32w/s72-c/Mela2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-4986741537838552002</id><published>2010-01-14T16:29:00.005+09:00</published><updated>2010-01-14T16:43:24.309+09:00</updated><title type='text'>पति-पत्नी और वो.. अब कोई झंझट नहीं</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S07JekI0T9I/AAAAAAAAAeE/KUXGT3-GnUY/s1600-h/Extra+Mr+afairs.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 286px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S07JekI0T9I/AAAAAAAAAeE/KUXGT3-GnUY/s320/Extra+Mr+afairs.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5426496127961944018" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चलिए नए साल पर एक खुशख़बरी&lt;/span&gt; उन मर्दों के लिए जो शादी के बाद भी पति-पत्नी और वो के चक्कर से निकले नहीं हैं... और खुशख़बरी उनकी पत्नियों के लिए भी जो अपने दिलफेंक मियां से आजिज़ आ चुकी थीं... घबराइये मत... जो काम आपके पति कर रहे हैं वो उनकी ज़िंदगी में तो रंग भर ही रहा है, आपकी शादी-शुदा ज़िंदगी में भी उससे बहार आ जाएगी... अरे ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं... बल्कि ये नया राग तो अंग्रेज़ों की देन है... और वो भी कोई अंग्रेज़ पुरुष नहीं, बल्कि एक फिरंगी महिला... फ्रांस की मशहूर साइक्लोजिस्ट मैरसी वैलेंट कहती हैं, कि अगर आपके पति परमेश्वर किसी दूसरी मोहतरमा से आंख लड़ा रहे हैं, तो उनके पीछे चाकू लेकर भागने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि अब तो आपको खुश होना चाहिए... और अगर उनकी ज़िंदगी में कोई वो है, तो घबराइये मत, क्योंकि इससे आप दोनों के रिश्तों में गर्मी आने के बजाए नरमी आएगी... और ज़िंदगी पहले से ज्यादा बेहतर हो जाएगी... आपको यकीन न हो, तो अंग्रेज़ी की ये चार लाइने भी पढ़ लीजिए... पूरा माजरा समझ में आ जाएगा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;If your husband is enjoying a secret rendezvous with another women, don't run after him with a knife, for the extra-marital affair is a sign that your marriage is a healthy one.&lt;br /&gt;That's the claim of France''s most prominent female psychologist Maryse Vaillant in controversial new book on the effects of infidelity on married life, Men, Love, Fidelity, reports The Telegraph.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैडम मैरसी के मुताबिक इसे बेवफ़ाई भी नहीं माना जा सकता... और अगर आपके पति इस तरह के रिश्तों में भरोसा रखते हैं, तो उन्हें अकेला छोड़ दीजिए, क्योंकि कुछ दिन बाद वो इसे खुद ही छोड़ देंगे... पता नहीं फ्रांस की इन साइक्लोजिस्ट मैडम का दावा कितना सही है, लेकिन इतना तो तय है कि इसे पढ़ने के बाद टाइगर वुड की पत्नी पर क्या बीत रही होगी, इसका अंदाज़ा आप खुद ही लगा लीजिए... और टाइगर वुड का तो पूछिए ही मत, पांचो उंगलियां तो पहले ही घी में थीं, अब सर भी कढ़ाही में है... वो तो पति-पत्नी और वो से भी आगे बढ़ चुके थे... वो-वो करते-करते उनकी तो 18 वो हो गईं थीं, गजब मैनेजमेंट है भाई... वाह भई वाह... चलो टाइगर वुड्स के अलावा किसी और को भी राहत मिली... हमारे यहां भी एक नेताजी हैं... बड़े रंगीले.. बड़े रंगीन मिजाज़.. कौन नहीं जानता, उनके बारे में... कितना नाम छपा उनका अख़बारों में, कितनी बार बेचारे टीवी पर आए... इसको कहते हैं न हींग लगी न फिटकरी और रंग चोखा हो गया...उम्र भले ही पचपन की थी, लेकिन मन बेचारा जवानी का ही था... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S07KCvNQCBI/AAAAAAAAAeM/HKXTHWVrOgc/s1600-h/Extra+mr+Affrs.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 213px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S07KCvNQCBI/AAAAAAAAAeM/HKXTHWVrOgc/s320/Extra+mr+Affrs.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5426496749408618514" /&gt;&lt;/a&gt;आखिर दिल पर किसका बस चलता है.. दिल तो बेचारा है... प्यार का मारा है... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;डर लगता है तन्हा सोने में जी.. दिल तो बच्चा है जी, थोड़ा कच्चा है जी...&lt;/span&gt; फ्रांस की मोहतरमा मैरसी की किताब तो मार्केट में आने के बाद ही कोहराम मचा रही है...  अंग्रेज़ तो उनकी इस थ्योरी को शायद इसको हज़म भी कर जाएं.. क्योंकि विदेशों में तो ये सब वैसे भी चलता है.. लेकिन अपने हिंदुस्तान के घरों में ज़रूर पड़ोस के घर से बेलन चलने की आवाज़े सुनाई पड़ने लगेंगी... ज़रा एक बार को मान लीजिए कि ये थ्योरी अपरूव्ड हो गई तो क्या होगा...खुदा की कसम कयामत हो जाएगी... पति-पत्नी और वो के किस्से हर मुहल्ले से सुनाई पड़ने लगेंगे...ज़रा रिश्तों में खटास आई नहीं, कि मश्विरे देने वालों की कतार लग जाएगी... कोई कहेगा मेरा ख्याल है, तुम अपने पति की किसी से सैटिंग करवा दो, फिर देखना कैसे तुम्हारे पति तुम्हारी उंगलियों पर नहीं नाचते हैं... मेरे पति की तो कई सैटिंग्स हैं, मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ता... वो तो मेरे एक इशारे पर चलते हैं... टोने-टोटको में एक नया टोटका ये भी शामिल हो जाएगा...वाह जी वाह, क्या थ्योरी है...रिश्ते फिर से बहाल करने के लिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-4986741537838552002?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/4986741537838552002/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=4986741537838552002' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/4986741537838552002'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/4986741537838552002'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/01/blog-post_14.html' title='पति-पत्नी और वो.. अब कोई झंझट नहीं'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S07JekI0T9I/AAAAAAAAAeE/KUXGT3-GnUY/s72-c/Extra+Mr+afairs.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-2602971963163219653</id><published>2010-01-11T14:26:00.004+09:00</published><updated>2010-01-11T14:35:50.941+09:00</updated><title type='text'>किस पर करें भरोसा..?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0q3DKT4C6I/AAAAAAAAAds/gH3YCeU9Hsg/s1600-h/trust.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0q3DKT4C6I/AAAAAAAAAds/gH3YCeU9Hsg/s320/trust.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5425349966056393634" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भरोसा क्यों और किस पर किया जाए...&lt;/span&gt; किसलिए किया जाए... क्या सिर्फ़ इसलिए कि उसने आपको अपनी कसम खाकर ये एतबार करा दिया, कि मैं तुम्हारा भरोसा कभी डिगने नहीं दूंगा... क्या सिर्फ़ इसलिए कि उसने अपने बच्चों की कसम खाकर ये एतमाद दिला दिया, कि मैं तुम्हारे साथ दगा नहीं करूंगा... क्या सिर्फ़ इसलिए कि उसने तुम्हारे कंधे को हल्के से अपने हाथों से दबा दिया... और तुम्हें इस बात की तसल्ली दे दी, कि मेरे दोस्त बुरे वक्त में मैं ही तुम्हारे साथ हूं.. ज़माना तो बहुत ख़राब है और तुम अपने दिल के राज़ मुझसे शेयर कर सकते हो.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तुम अपनी ज़िंदगी का फलसफा मेरे सामने रख सकते हो..&lt;/span&gt; तुम अपनी कहानी मुझे सुना सकते हो.. तुम अपना हाले-दिल मुझसे कह सकते हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम अपनी ज़िंदगी का कभी न खोलने वाला राज़ भी मुझे बता सकते हो, और मेरा वादा है तुमसे कि तुम्हारा ये राज़ कभी फरिश्तों को भी पता नहीं चल पाएगा... मेरा वादा है ये तुमसे, कि मैं तुम्हारा एतबार टूटने नहीं दूंगा... मेरा वादा है तुमसे, कि तुम्हारा ये राज़ हमेशा-हमेशा के लिए दफ्न हो जाएगा... और हम अपनी ज़िंदगी की किताब के वरक खोलकर उसके सामने रख दें... क्या कोई राज़ किसी को सिर्फ़ इसलिए बता दिया जाए, क्योंकि उसने आपको अपने कुछ ज़ाती राज़ बता दिये हैं... लेकिन बावजूद इसके इस बात की क्या गारंटी है कि इसके बाद दुनिया में कोई भी आपके निजी माअमलात में दख़लअंदाज़ी नहीं कर पाएगा... आपके राज़ हमेशा-हमेशा के लिए दफ्न हो जाएंगे... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0q4EsQBcyI/AAAAAAAAAd0/l8dinkhavuM/s1600-h/Trust+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0q4EsQBcyI/AAAAAAAAAd0/l8dinkhavuM/s320/Trust+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5425351091858535202" /&gt;&lt;/a&gt;आप पर उंगली उठाने की हिम्मत कोई नहीं कर पाएगा... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्या ऐसा सचमुच होता है, जब आप किसी को अपने राज़ बता देते हैं और उसके बाद आपकी निजी ज़िंदगी में चैन-सुकून आ जाता है...&lt;/span&gt; कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता... मेरा अपना तजुर्बा तो कहता है कि इसके बाद आपकी टेंशन और बढ़ जाती है... और आपको हमेशा इसी बात का डर सताता रहता है कि पता नहीं वो कब मेरे राज़फ़ाश कर दे... कई बार ऐसा होता है, कि जिसे आपने सबसे ज्यादा अज़ीज़ समझकर अपना राज़दार बनाया, कुछ दिन बाद उसी के साथ रिश्तों में दरार आ गई... फिर इस बात की क्या गारंटी है, कि वो आपके राज़फ़ाश नहीं करेगा... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद इसीलिए आपको कई बार ऐसे शख्स की खुशामद भी करनी पड़ती है, जिसे आप रत्तीभर भी पसंद नहीं करते... सिर्फ़ इसीलिए कि कहीं वो आपके राज़ बेपर्दा न कर दे... आखिर इस भरोसे का भरोसा है क्या..? आखिर इंसानी फितरत का भरोसा क्या है...? आखिर इस भरोसे का पैमाना क्या है..? शायद इन तमाम सवालों का जवाब किसी के पास नहीं होगा, और अगर हुआ, तो यही कि किसी न किसी पर तो भरोसा करना ही पड़ेगा ही, वरना इसके बिना तो ज़िंदगी का पहिया घूमने से रहा... या फिर आप लोग भी यही कहेंगे कि राज़ को राज़ ही रहने दो... क्योंकि पर्दा जो उठ गया, तो फिर गिर नहीं पाएगा... और ज़माने का भरोसा क्या इसकी तो फितरत ही ज़ालिम है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वरना क्या भरोसा उसके वादे का मगर..&lt;br /&gt;दिल को खुश रखने को एक वादा तो है...&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-2602971963163219653?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/2602971963163219653/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=2602971963163219653' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2602971963163219653'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2602971963163219653'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/01/blog-post_11.html' title='किस पर करें भरोसा..?'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0q3DKT4C6I/AAAAAAAAAds/gH3YCeU9Hsg/s72-c/trust.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-167888590837326707</id><published>2010-01-08T16:07:00.007+09:00</published><updated>2010-01-08T16:21:06.574+09:00</updated><title type='text'>सर्दी ने मार डाला...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0baqJIIEGI/AAAAAAAAAdE/fTv8Sv9dHuw/s1600-h/Kohra.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 236px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0baqJIIEGI/AAAAAAAAAdE/fTv8Sv9dHuw/s320/Kohra.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5424263218753704034" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कोहरे में कुछ सुझाई नहीं दे रहा था.... &lt;/span&gt;हाथ को हाथ नज़र नहीं आ रहा था... लेकिन फिर भी घर तो पहुंचना ही था.. रात के करीब साढ़े बारह बज रहे थे... मोटरसाइकिल पर चलना दूभर हो चुका था... सड़क पर हर तरफ़ बस कोहरा ही कोहरा था... आगे वाली कार के पीछे मैं चलता चला जा रहा था...घर किस रास्ते पर है मालूम नहीं पड़ रहा था... धुंध में दो पग भी चलना मुश्किल था... बाइक दस किलोमीटर की रफ्तार से रेंग रही थी... सड़क पर सन्नाटा पसरा था... लोग अपने-अपने घरों में बिस्तरों में दुबके थे... घर का रास्ता कोसों दूर लग रहा था... दफ्तर से मेरा घर बामुश्किल पांच या छह किलोमीटर होगा... लेकिन कोहरे की चादर में ये रास्ता लगातार लंबा होता जा रहा था... कोहरे ने हेलमेट के शीशे पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था... हेल्मेट हटाते ही मुंह पर ओस की बूंदे गिरने लगती... हालांकि ठंड में कंपकपी छूट रही थी...लेकिन मौसम का एक रुमानी अंदाज़ ये भी अच्छा लग रहा था...&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0ba54qJfiI/AAAAAAAAAdM/1ep-F10mT9U/s1600-h/Fog2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0ba54qJfiI/AAAAAAAAAdM/1ep-F10mT9U/s320/Fog2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5424263489210908194" /&gt;&lt;/a&gt;दास्तानों में होने के बावजूद हाथ बर्फ़ हो चुके थे... जो कार आगे चल रही थी, कुछ दूर चलने के बाद वो अचानक ओझल हो गई.... अब मेरे लिए एक कदम बढ़ाना भी मु्श्किल हो चुका था... मैं किस रास्ते पर जा रहा हूं... मुझे कुछ पता नहीं था... कुछ दूर चलने के बाद मुझे मेरी तरह ही बाइक पर एक और शख्स नज़र आया... सोचा इन्हीं जनाब से रास्ता पूछ लिया जाए... लेकिन शायद वो खुद भटके हुए थे... खैर जैसे-तैसे घर पहुंचा... करीब डेढ़ बज चुका था.. दस मिनट का सफर एक घंटे में पूरा हुआ... घर में घुसते ही न आव देखा न ताव... जल्दी से रज़ाई उठाई और बिस्तर के आगोश में जाने में ही भलाई समझी... लेकिन नींद इतनी जल्दी कहां आना थी... अब तो आदत पड़ चुकी थी देर रात सोने की... और तकरीबन रात के ढाई बजे ही जाकर आंख लगी होगी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात गहराने के साथ ही बिस्तर लगातार सर्द होता जा रहा था... याद आ रहा था बचपन और बचपन की कहानियां... मुंशी प्रेमचंद का हल्कू मेरी आंखो के सामने खड़ा था.. जिसने साहूकार का कर्ज़ चुकाने की खातिर अपने लिए कंबल तक नहीं खरीदा... और पूरी रात जंगल में ऐसे ही ठिठुरते हुए गुज़ार दी थी... हल्कू तो अब भी बहुत हैं.. लेकिन उनका दर्द समझने वाला कोई मुंशी प्रेमचंद शायद अब नहीं है... मैंने सुबह दस बजे का अलॉर्म लगाया था... लेकिन आंख सुबह सात बजे ही खुल गई... किसी ने दरवाज़े पर नॉक किया था... मन किया उठते ही जो भी होगा उसे दो-चार बातें तो ज़रूर सुनाऊंगा... सुबह-सुबह ही नींद खराब कर दी... लेकिन दरवाज़ा खोला तो कामवाली बाई खड़ी थी... ठंड में ठिठुरते हुए... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0bcL4FN1DI/AAAAAAAAAdc/o95sM29TbDY/s1600-h/Hocker.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 203px; height: 152px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0bcL4FN1DI/AAAAAAAAAdc/o95sM29TbDY/s400/Hocker.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5424264897805276210" /&gt;&lt;/a&gt;कोहरा अब भी रात जैसा ही पसरा हुआ था... मौसम अब भी उतना ही सर्द था... उसके जिस्म पर इतनी ठंड में भी एक पुरानी सी शॉल थी.. कपड़ों की हालत देखकर लग रहा था, कि इससे पहले वो दूसरे घर में काम करके आई है... और अब यहां... बाप रे बाप.. इतनी सर्दी में अपना तो पानी में हाथ डालने को भी दिल नहीं करता... और ये लोग घर से बाहर ठंड में सिकुड़े जा रहे हैं...दरवाज़े में अख़बार का बंडल भी पड़ा था... जो अख़बार वाला लड़का सुबह ही डाल गया था... ठंड में अपनी साईकिल पर... आंधी हो या तूफान, जाड़ा हो या बरसात... उसे तो काम पर जाना ही है... दुनिया सोती रहे... अखबार वाला लड़का कभी नहीं सोता... दूधवाला तय वक्त पर दूध देने आ जाता है... भले ही वो पानी पहले से ज्यादा मिलाता हो... लेकिन उसके भी आने का वक्त नहीं बदला... दरवाज़े पर बर्तन में दूध भी रखा हुआ था...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गली में अब भी दस-पंद्रह साल के दूसरे लड़के अख़बार के बंडल बना-बनाकर दूसरों के घर में फेंक रहे थे.. तन पर उनके एक स्वेटर से ज्यादा कुछ भी नहीं था... साईकिल के हैंडल पर उनकी उंगलियां ठंड में काली पड़ चुकी थीं... पैरों में हवाई चप्पल के बावजूद वो सर्दी के सामने घुटने टेकने को तैयार नहीं थे... हवा के थपेड़ों में उन्होंने ज़िंदगी जीना सीख लिया था... और इस बात को भी अच्छी तरह जानते थे, कि ये मौसम तो अमीरों के लिए बने हैं... सर्दियों में गर्म कपड़े, रज़ाई में चाय के साथ मूंगफली और गजक... कमरे में गर्म हीटर... ये सब तो बड़े लोगों के चोंचले हैं.... लेकिन उन बदनसीबों को तो हर दिन काम पर जाना है... उनको न सर्दी लगती है, न गर्मी और न बारिश के थपेड़े उनका रास्ता रोक पाते हैं... उन्हें तो सिर्फ़ भूख लगती है... और घर पर बच्चे उनका इंतज़ार करते हैं....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-167888590837326707?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/167888590837326707/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=167888590837326707' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/167888590837326707'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/167888590837326707'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='सर्दी ने मार डाला...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S0baqJIIEGI/AAAAAAAAAdE/fTv8Sv9dHuw/s72-c/Kohra.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-5392608380584975236</id><published>2009-12-29T12:17:00.005+09:00</published><updated>2009-12-29T12:29:42.318+09:00</updated><title type='text'>इस एहसास को कोई नाम न दो...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Szl2Mgh5l9I/AAAAAAAAAcs/9vO9Fx5f9q0/s1600-h/Love+3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 274px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Szl2Mgh5l9I/AAAAAAAAAcs/9vO9Fx5f9q0/s400/Love+3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420493583779731410" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इस प्यार को कोई नाम न दो.. &lt;/span&gt;इस एहसास को कोई नाम न दो.. इस जज़्बात को कोई नाम न दो... मगर ये कैसे मुमकिन है... जब एक ज़िंदगी दूसरी ज़िंदगी से मुकम्मल तरीके से जुड़ी हो... आंखो में लाखों सपने हों... दिल में हज़ारों अरमान हों... हज़ार ख्वाहिशें हों... फिर कैसे कोई नाम न दें... एक ही सफ़र के दो मुसाफिर थे... कुछ दूर चलकर बेशक रास्ते बदल गये हों... लेकिन मंज़िल तो एक ही थी... मकसद भी एक ही था... सुबह के सूरज की पहली किरन की तरह उसका एहसास था... शाम की लाली की तरह उसके उसके रंग थे... बदलते मौसम की तरह उसकी छुअन थी... हर एहसास अपने आप में अनूठा था.. हर जज़्बात के पीछे एक पूरी ज़िंदगी थी... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी महक से सारा जहान महक उठता था.. उसके आने से ही हवाएं भी मदमस्त होकर चलती थीं... उसके आने की जब ख़बर महकी, उसकी खुशबू से मेरा घर महका... उसकी खुशबू से मेरा मन महका... ज़िंदगी फूल की पत्तियों की तरह और नाज़ुक हो गई... दिन पहले से और बड़े लगने लगे...&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; इंतज़ार और भी बेहतरीन लगने लगा&lt;/span&gt;... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वक्त की शायद इफ़रात हो चुकी थी&lt;/span&gt;... तमाम उम्र भी कम लगने लगी... सात जन्म भी कम लगने लगे... उसके आने की ख़बर से ही दिल बेकरार होने लगता... उसके जाने की ख़बर से बेचैनियां बढ़ जातीं... मुझे सरे-राह कोई मिला था... और मेरी ज़िंदगी में दाखिल हो चुका था... अगले जन्म में भी उसके साथ के लिए दुआएं होने लगीं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Szl2uZfyCnI/AAAAAAAAAc0/gWkvgtt7C9w/s1600-h/Heart+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 213px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Szl2uZfyCnI/AAAAAAAAAc0/gWkvgtt7C9w/s400/Heart+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420494166007351922" /&gt;&lt;/a&gt;ज़िंदगी फिर से बदल चुकी थी... सांसो की रफ्तार वक्त के साथ बदलने लगी... अब पहले से ज्यादा रवानगी आ चुकी थी... आंखो से उदासी गायब हो चुकी थी... ज़िदगी और भी हसीन हो चुकी थी... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मौहब्बत ने अदावत को शिकस्त दे दी थी&lt;/span&gt;... हसरतें हिलोरें मारने लगीं... मन करता था, कि दुनिया की निगाहों से बचने के लिए समंदर को पार कर जाएं... और ये समंदर इतना बड़ा हो जाए, कि हमारी ज़िदगी के साथ-साथ चलता रहे... कभी ख़त्म न हो और अपने आगोश में समा ले... दुनिया के रंग अब और भी खूबसूरत लगने लगे थे.... तमाम कायनात से मौहब्बत होने लगी... उजड़े दयार में उसके कदम ऐसे पड़े, कि सबकुछ जन्नत नज़र आने लगा... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फूल इतने खूबसूरत लगने लगे, कि उसमें से ग़ज़ल निकलने लगी&lt;/span&gt;... उर्दू से बेपनाह मौहब्बत हो गई... उसकी छोटी-छोटी खुशियां जान से भी ज्यादा प्यारी लगने लगीं... मन करता कि काश अपनी एक अलग दुनिया हो, जहां कोई रोक-टोक न हो... जहां सबकुछ अपनी मर्ज़ी से हो... जहां किसी की दख़लअंदाज़ी न हो... जहां उसके साथ सिर्फ़ मैं हूं... और इसके सिवा कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं... सिर्फ़ हो तो बस इश्क की कैफियत... मौहब्बत का एक खुशनुमा एहसास.... हमारे दरम्यान न उदासी हो... न तन्हाई हो... अगर हो तो सिर्फ़ एक खुशनुमा एहसास... रंग भरा एहसास...एक हल्की सी छुअन... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन शायद ये सबकुछ इतना आसान नहीं था... मकतबे इश्क में हमने एक ढंग ही निराला देखा... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उसको छुट्टी न मिली जिसको सबक याद हुआ&lt;/span&gt;.... अब हर तरफ़ सन्नाटा है... ऐसा लगता है, जैसे वक्त से पहले पतझड़ आ चुका हो... पेड़ों से पत्ते सब झड़ चुके हैं.. मौसम करवट बदल चुका है... लेकिन अफ़सोस ये कि बसंत भी तो नहीं आया... अब न फूलों से ग़ज़ल निकलती है... न उर्दू से मौहब्बत है... न सांसों में पहले की तरह रवानगी है... अब समंदर से भी डर लगता है...  अब उनींदी आंखो में सपने भी नहीं आते... अब न रुमानियत है.... न जाने क्यों एसा लगता है जैसे कोई सफ़र में साथ था मेरे... फिर भी संभल-संभल के चलना पड़ा मुझे... अब इंतज़ार है बस फिर से मौसम बदलने का.... और मुझे यकीन है... पतझड़ के बाद फिर से बहार आएगी... और मौसम फिर से पहले से भी ज्यादा हसीन हो जाएगा...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-5392608380584975236?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/5392608380584975236/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=5392608380584975236' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5392608380584975236'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5392608380584975236'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/12/blog-post_29.html' title='इस एहसास को कोई नाम न दो...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Szl2Mgh5l9I/AAAAAAAAAcs/9vO9Fx5f9q0/s72-c/Love+3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-9213056991695681066</id><published>2009-12-26T00:21:00.006+09:00</published><updated>2009-12-26T00:36:19.980+09:00</updated><title type='text'>अशोक सर बेटे के लिए लौट आओ न...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzTapA8FiaI/AAAAAAAAAcI/mGo3D0Rwssg/s1600-h/Ashok+ji+3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 230px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzTapA8FiaI/AAAAAAAAAcI/mGo3D0Rwssg/s400/Ashok+ji+3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5419196649795062178" /&gt;&lt;/a&gt;मैं क्या लिखूं... मेरे हाथ आज जवाब दे रहे हैं... दिल बैठा जा रहा है... समझ नहीं आता.. &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आखिर ऐसा क्यों होता है... जो आपको सबसे प्यारा होता है, ऊपर वाला भी उसी को सबसे ज्यादा प्यार क्यों करता है... &lt;/span&gt;आज सुबह जब अमिताभ का फोन आया... तो मेरा जिस्म बेजान हो गया... देर रात सोने के बाद सुबह मैं बेफिक्री की नींद में था.. अचानक फोन बज उठा.. सुबह के पौने आठ बजे थे.. देखा तो अमिताभ का फोन था.. उसकी आवाज़ में भर्राहट थी.. अरे आपने कुछ सुना... क्यों क्या हुआ... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अरे सुना है अशोक सर को हार्ट अटैक पड़ा है.. ही इज़ नो मोर.. &lt;/span&gt;क्या बात कर रहे हो दिमाग ख़राब है तुम्हारा... नहीं मैं सही कह रहा हूं... अभी शोभना का फोन आया है.. उसने बताया कल्याण सर उन्हें मेट्रो अस्पताल ले गये हैं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आनन-फानन में मैंने बाइक उठाई और दौड़कर नोएडा में मेट्रो अस्पताल पहुंच गया.. गाड़ी बेताहाशा भाग रही थी... लेकिन अमिताभ की बात पर यकीन नहीं हो रहा था... अस्पताल पहुंचकर अपनी आंखो से उन्हें देख लिया... लेकिन यकीन नहीं हुआ... अरे खुदा ये कैसे हो सकता है... अस्पताल के बेड पर पड़े अशोक जी लग रहा था.. जैसे अबयज़ को देखकर मुस्कुरा पड़ेंगे.. और सीधे बोलेंगे &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चल यार चाय पीने चलते हैं... &lt;/span&gt;लेकिन अशोक सर तो शायद कभी न उठने के लिए ही सोये थे..  मैं इंतज़ार कर रहा था... कि अशोक सर एकदम मुस्कुराते हुए उठेंगे और पूछेंगे तुमने नई नौकरी की पार्टी अभी तक नहीं दी... लेकिन अशोक सर ने तो शायद कसम खाई थी.. कुछ न पूछने के लिए... मैंने तो सोच लिया था.. कि अब उन्हें सिगरेट पीने के लिए भी नहीं रोकूंगा.. लेकिन उन्होंने तो आज सिगरेट पीने के लिए भी नहीं कहा... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अचानक उनका बेटा कहता है... पापा उठ जाओ न प्लीज़... चाहे गिफ्ट मत दिलाना... &lt;/span&gt;सुनकर मेरी आंखे भर आईं... लेकिन अशोक सर तो अपने बेटे के लिए भी नहीं उठे...&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzTa77W1NPI/AAAAAAAAAcQ/iUuGj9ZMPuM/s1600-h/ashok+ji1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 275px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzTa77W1NPI/AAAAAAAAAcQ/iUuGj9ZMPuM/s400/ashok+ji1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5419196974714139890" /&gt;&lt;/a&gt;क्रिसमस का दिन बेटा घर पर पापा के आने का इंतज़ार कर रहा था.. और पापा अपने बेटे को बाज़ार लेकर जाने का वादा करके आए थे... लेकिन कौन जानता था... कि ये सुबह तो कभी लौटकर नहीं आएगी... उस 11 साल के मासूम को क्या पता था.. कि उसके पापा इस बार उसका वादा तोड़ देंगे... लेकिन अशोक सर ने मेरा भी एक वादा तोड़ा है... मुझसे उन्होने कहा था.. कि अबयज़ तुम नई जगह जा रहे हो.. हमें भूल मत जाना... मैंने कहा था.. कि सर आपको भला मैं कैसे भूल सकता हूं... मैं अपनी बात पर आज भी कायम हूं... लेकिन अशोक सर तो मुझे अकेला छोड़कर चले गये...  मुझे याद है जब वीओआई के शुरुआती दिन थे.. अशोक सर ने ईटीवी हैदराबाद से यहां ज्वाइन किया था... सबसे पहली मुलाकात उनकी मुझसे ही हुई थी... और वो पहली बार में ही मुझे बड़े भाई का प्यार देने लगे थे...&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; ईटीवी के स्टार एंकर रहे उस शख्स की डिक्शनरी में गुरुर नाम के अल्फाज़ की कोई जगह नहीं थी...&lt;/span&gt; चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट... किसी रोते हुए को भी हंसा देती थी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद दिनों में भी वो मेरे साथ इतना घुल गये थे.. कि उनके बगैर मुझे भी अकेलापन महसूस होने लगता था... हम लोग आपस में तमाम बातें शेयर करने लगे... रुतबे और उम्र में वो मुझसे बड़े ज़रूर थे.. लेकिन उनका रवैया मेरे साथ एक दोस्त की तरह ही था... शुरुआत में वो हैदराबाद से अकेले ही दिल्ली आए थे... उनकी पर्सनालिटी क्या कमाल की थी... मैंने एक दिन ऐसे ही उनकी बीवी के बारे में पूछ लिया.. फिर तो उन्हेने अपनी पूरी किताब खोलकर रख दी... उनकी लव मैरिज हुई थी.. एक पंजाबी लड़की से शादी करने के लिए उन्होंने क्या-क्या पापड़ बेले... ये भी उन्होने मुझे बताया... लेकिन एक सालह भी दे डाली... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बेटे कभी लव मैरिज मत करना... तुम अपने प्यार के लिए अपनी खुशी के लिए अपनी मर्ज़ी से शादी तो कर लेते हो.. लेकिन इससे तुम्हारे मां-बाप की क्या हालत होती है.. तुम अंदाज़ा नहीं कर सकते... &lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzTbQ3cjAMI/AAAAAAAAAcY/6PwSZjpOAiE/s1600-h/Ashok+ji.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 350px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzTbQ3cjAMI/AAAAAAAAAcY/6PwSZjpOAiE/s400/Ashok+ji.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5419197334441623746" /&gt;&lt;/a&gt; दफ्तर में हम लोग जब भी चाय पीने जाते.. साथ में ही जाते थे.. अशोक सर को सिगरेट पीना होती थी और मुझे चाय... लेकिन अशोक सर सिगरेट बहुत पीते थे... मैंने एक बार उन्हें टोका, कि सर आप इतनी सिगरेट मत पिया करो... तो उनका अपना ही मस्त जवाब था.. वो हर फिक्र को धुएं में उड़ाने में भरोसा करते थे...&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; अरे रहने दे न यार.. कुछ नहीं होता... जिंदगी में ऐश से जीना चाहिए... वैसे भी ये सिगरेट अब मुझसे नहीं छूट सकती... &lt;/span&gt;सीमा ने भी कई बार कोशिश की... लेकिन वो भी मेरी सिगरेट छुड़ा नहीं पाई... मैंने जब उन्हें बार-बार टोकना शुरु किया.. तो फिर वो चुपके से अकेले ही सिगरेट पीने चले जाते थे.. अशोक सर की मेरे साथ इतनी यादें जुड़ी हैं.. कि मैं उन्हें एक किताब में भी नहीं समेट सकता... जितने दिन वो मेरे साथ रहे... मैने अपना हर फैसला उनसे पूछकर लिया... वो मेरे हर राज़ के साझीदार थे.. लेकिन मजाल है, कि आजतक उनके मुंह से कोई बात किसी के सामने निकली हो... वो मेरे सारे राज़ अपने साथ ही लेकर चले गये... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आज अस्पताल के बाहर सैकड़ों लोगों की भीड़ इस बात का एहसास करा रही थी... कि एक इंसान हमारे बीच नहीं है... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आज हमने एक शख्सियत नहीं कोई है.. बल्कि एक इंसान खोया है... वो इंसान जिसने अभी इस दुनिया में चालीस बसंत भी पार नहीं किये थे.. &lt;/span&gt;लेकिन इतने कम वक्त में उस शख्स के चाहने वाले इतने थे.. कि अस्पताल के बाहर खड़े होने की जगह भी नहीं थी... लोगों की आंखो से आंसू बह रहे थे... लेकिन मुझे तो अब भी यकीन नहीं था... शाम को शमशान घाट पर आखिरी विदाई का वक्त था... उनका मासूम बेटा अपने पिता की चिता को आग दे रहा था... वो मासूम शायद अभी भी यही समझ रहा था... कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पापा क्रिसमस पर बाज़ार नहीं ले गये तो क्या.. नए साल पर तो ज़रूर ले जाएंगे... &lt;/span&gt;लेकिन सच्चाई तो यही थी.. कि उसके पापा नए साल पर क्या अब कभी नहीं आएंगे.. अब वो उससे कोई भी ऐसा वादा नहीं करेंगे... जिसे वो निभा न सकें... लेकिन अबयज़ से कौन कहेगा... कि चल यार चाय पीने चलते हैं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-9213056991695681066?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/9213056991695681066/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=9213056991695681066' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/9213056991695681066'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/9213056991695681066'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/12/blog-post_26.html' title='अशोक सर बेटे के लिए लौट आओ न...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzTapA8FiaI/AAAAAAAAAcI/mGo3D0Rwssg/s72-c/Ashok+ji+3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-4108701605839295546</id><published>2009-12-24T03:04:00.004+09:00</published><updated>2009-12-25T01:49:20.070+09:00</updated><title type='text'>मुझे यकीन है.. तुम आओगे ज़रूर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzJXzkJJ3DI/AAAAAAAAAbw/me8AEg8p2zA/s1600-h/Love2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzJXzkJJ3DI/AAAAAAAAAbw/me8AEg8p2zA/s320/Love2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5418489845067144242" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तुमने तमाम उम्र &lt;/span&gt;साथ रहने का वादा तो नहीं किया था.. लेकिन तुम मेरी ज़िंदगी में बहुत आहिस्ता से दाखिल हो गये थे.. मुझे एहसास भी नहीं हुआ. और तुमने मेरे दिल पर हुकुमत कर ली.. मैं तुम्हारी हर अदा और हर इशारे का गुलाम हो गया... हर आहट पर जान देने को तैयार.. हर आह पर मर-मिटने को तैयार... तुममें कुछ तो ऐसा था.. जिसने मुझे मदहोश किया था... कोई तो ऐसी बात थी.. जिसने मुझे दीवाना बना दिया था... सुबह से लेकर शाम तक... हर आहट पर लगता था, कि तुम हो... फिज़ा चलती थी.. तो लगता था, कि तुम हो... पानी में अठखेलियां करते बच्चे हों, या शरारत भरी तुम्हारी कोई मुस्कुराहट... मेरे चारों तरफ़ शायद तुम्हारा एक घेरा बन चुका था... मेरी ज़िंदगी का शायद तुम एक हिस्सा बन चुके थे.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम एक जान दो जिस्म तो नहीं थे, लेकिन हम हर जज्बात के साथी थे.. हम हर दर्द के साथी थे.. हम हर दुख के साथी थे... हमने हर कदम साथ चलने का वादा तो नहीं किया था.. लेकिन हमने राह में कदम ज़रूर साथ बढ़ाए थे... उसी रास्ते पर जहां हमसे पहले तमाम लोग चलकर निकल गये...  ये रास्ता मुश्किलों भरा ज़रूर था.. लेकिन इतना कठिन भी नहीं... हर सुबह की शुरुआत में क्यों लगता था.. जैसे कोई मेरी आंखों पर हाथ रखकर कहता हो... उठो सुबह हो चुकी है.. जागो.. सवेरा हो गया है.. देखो सूरज कितना चढ़ आया है...ऐसा लगता था, जैसे कोई कहता हो, कि देखो तुम अपना ख्याल नहीं रखते हो.. तुम सर्दी में ऐसे ही चले आते हो... तुम कभी अपने बारे में भी सोचा करो...  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाने क्यों ऐसा लगता है जैसे तुमने मुझे शरारतन हल्की सी चपत लगाई हो और कहते हो, कि जाओ मुझे तुमसे बात नहीं करना.. तुमने कबसे मुझे फोन ही नहीं किया... तुम्हारे पास मुझसे साझा करने के लिए दो अल्फ़ाज़ भी नहीं हैं... आखिर ऐसा क्या हुआ था.. कि अचानक तुम मेरी ज़िंदगी में चुपचाप से दाखिल हो गये.. बिना कोई आहट किये... दिल के दरवाज़े पर कोई दस्तक भी न हुई... और तुम पहरेदार बन गये... मेरे एक-एक पल का हिसाब रखने लगे... मेरी हर घड़ी पर नज़र रखने लगे...दिल की धड़कनों ने भी अब तुम्हारे हिसाब से अपनी रफ्तार तय कर ली... मेरी रफ्तार भी अब तुम्हारी रफ्तार की साझा हो गई... हर कदम उसी रास्ते पर पड़ता, जहां तुम्हारी कदमबोसी हुई थी...&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzObPB2-c2I/AAAAAAAAAcA/2EGQq9OTV7s/s1600-h/Love.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 318px; height: 400px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzObPB2-c2I/AAAAAAAAAcA/2EGQq9OTV7s/s400/Love.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5418845459156202338" /&gt;&lt;/a&gt;ऐसा क्यों लगता था, जैसे मेरा सबकुछ तुम्हारा हो चुका है... तुम्हारा सबकुछ मेरा हो चुका है... तुम्हारे लिए मेरा ईमान भी मुझसे बेईमानी करने लगा... क्यों मेरा मन कहता था, कि मेरी उम्र भी तुम्हे लग जाए... क्यों दुआओं में सिर्फ़ तुम्हारा ही नाम आता था... क्यों तुम्हारी पसंद मेरी पसंद बन चुकी थी... तुम्हारी किताबों में मुझे अपनी ही इबारत नज़र आती थी.. तुम्हारा होले से मेरे पास आकर मुझे चिढ़ा जाना या मुझसे चुटकी लेकर निकल जाना...क्या ये सब अनजाने में था.. क्यों मुझे लगता है कि तुम मेरा मुस्तकबिल थे.. तुम मेरा मुकद्दर थे... तुम मेरे लिए ज़िंदगी जीने की वजह थे.. तुम मेरे लिए जज्बा थे... तुम मेरा हौसला थे... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी नस-नस ये कहती है, कि तुम्हारे आने के बाद जीने की एक वजह मिल गई थी... तुम्हारी आंख से निकले मोती, क्यों मेरी बेचेनी की वजह बन जाते थे...  क्यों मेरा एक दिन गायब हो जाना, तुम्हें बेकरार कर देता था... क्यों एक-दूसरे को देखे बिना हमारा दिन गुज़रता नहीं था... लेकिन न जाने क्यों मुझे आज भी समझ नहीं आता... कि कैसे कोई अजनबी किसी का हो जाता है... फिर कैसे उसी से रूठ जाता है... लेकिन ये भी सच है कि तुम्हारी हया तुम्हारा गहना है... और शायद यही वो वजह थी... जिसने मुझे तुम्हारी सादगी पर फिदा कर दिया... न जाने क्यों मुझे आज भी लगता है, कि तुम आओगे.. फिर से.. ज़रूर आओगे... और होले से एक चपत लगाकर कहोगे, कि तुम्हारा दिमाग ख़राब है.. जो बात-बात पर रूठ जाते हो...चलो मुझे भी तुमसे बात नहीं करना...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-4108701605839295546?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/4108701605839295546/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=4108701605839295546' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/4108701605839295546'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/4108701605839295546'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/12/blog-post_24.html' title='मुझे यकीन है.. तुम आओगे ज़रूर'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SzJXzkJJ3DI/AAAAAAAAAbw/me8AEg8p2zA/s72-c/Love2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-3425304105854392006</id><published>2009-12-09T04:01:00.005+09:00</published><updated>2009-12-09T04:10:15.156+09:00</updated><title type='text'>बेज़ुबान बच्चा बेज़ुबान जानवर बन गया...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sx6jakZiFeI/AAAAAAAAAbU/yGV2Xv3mV9A/s1600-h/STILL+2+copy.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sx6jakZiFeI/AAAAAAAAAbU/yGV2Xv3mV9A/s320/STILL+2+copy.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5412943478988608994" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उत्तर प्रदेश से तो सभी वाकिफ़ हैं.. &lt;/span&gt;उसी का एक हिस्सा है पश्चिमी उत्तर प्रदेश... धन-दौलत से मालामाल... गन्ना किसानों से भरपूर इस इलाके में पैसे की कोई कमी नहीं... रईसी इस इलाके की रग-रग में बसी है... उसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक ज़िला है बिजनौर... इस ज़िले का शुमार सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे ज़िलों में किया जाता है। सबसे ज्यादा सरकारी नौकरीपेशा इसी ज़िले से हैं... बिजनौर ज़िले में ही मौजूद है तहसील चांदपुर... बेहतरीन कस्बा.. शानदार कस्बा... नफ़ासत पसंदों का छोटा सा शहर.. तहज़ीब की चादर ओढ़े.. इस कस्बे में यूं तो हर शख्स खुशहाल है... लेकिन इसी कस्बे में एक मासूम भी है... अज़ीजुर्रहमान का बेटा शकूर... 14-15 साल का एक बच्चा...  मासूम इसलिए.. क्योंकि उसपर जमाने ने सितम ढाए... लेकिन उसने उफ़ तक न की... घरवालों ने उसे बेड़ियों में जकड़ दिया... लेकिन उसकी ज़ुबान से कोई अल्फाज़ तक न निकला.. हां अपनी खामोश निगाहों से वो लोगों से इल्तिज़ा ज़रूर करता है.. लोगों को हसरत भरी निगाहों से भी देखता है.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन दुनिया बड़ी बेदर्द है.. और उस पर तरस खाने वाला कोई नहीं है... बचपन से बेड़ियों में जकड़े इस मासूम के घर की दीवारें भी उसके घरवालों की मुफ़लिसी को बयां करती हैं... सर्दी में भी उसके जिस्म पर एक निकर और एक फटी टी-शर्ट है.. खुले आंगन में ठंड से ठिठुरते उस बच्चे की परवाह शायद किसी को नहीं है... कच्चे घर की कच्ची दीवारों के बीच बेड़ियों में जकड़े शकूर के लिए तो ज़िंदगी किसी नरक से कम नहीं होगी... होश संभालने के बाद उस बदनसीब ने तो सुबह का सूरज बेड़ियों में ही देखा है... उसका दाना-पानी से लेकर सोने, गाने तक सबकुछ बेड़ियों में कट जाता है... लेकिन न तो बेरहम मां-बाप को तरस आता है... न उसके नाते-रिश्तेदारों को... लोग आते हैं.. उसका तमाशा देखते हैं.. और ऊल-जलूल से मशविरे देकर चले जाते हैं... बच्चे आते हैं उसे पत्थर मारकर चले जाते हैं... &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वो मौहल्ले भर के लिए तमाशा है.. और सब तमाशाई बन जाते हैं...&lt;/span&gt; तो कुछ लोग उससे डरे-सहमे उसके पास से भी गुज़रने पर खौफ़ खाते हैं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sx6jrQbX3uI/AAAAAAAAAbc/yS6vpT7YjYE/s1600-h/STILL+4+copy.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sx6jrQbX3uI/AAAAAAAAAbc/yS6vpT7YjYE/s320/STILL+4+copy.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5412943765685395170" /&gt;&lt;/a&gt;इक्कीसवीं सदी में जीने वाले उस मासूम पर भी तरस नहीं खाते.. जिसे न तो अपना होशो-हवास है और न दुनिया का... लेकिन तरस तो उसके मां-बाप पर भी आता है. जो दकियानूसी बातों में पढ़कर अपने बेटे की ज़िंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं... उन नासमझों को किसी ने बता दिया, कि उनका बेटा बीमार है.. उस पर हवा का असर है... उसे भूत-प्रेतों से बचाना होगा... उस पर जिन्नातों का असर है...और उसे पंद्रह साल तक बेड़ियों से बांधकर रखो, तो वो ठीक हो जाएगा... बस उस दिन से उस बच्चे की ज़िंदगी जहन्नुम की मानिंद हो गई... अपने जिगर के टुकड़े को सीने से लगाने वाले मां-बाप ने ही उसके गले में फंदा डाल दिया... इतना होता, तो भी सब्र था... उस नन्हीं जान के गले में फंदा डाला गया.. फिर उसे एक लकड़ी के खंभे से बांध दिया गया.. उसके बाद उस खंभे को ज़मीन में खूंटे की तरह गाड़ दिया... बेज़ुबान बच्चा बेज़ुबान जानवर की तरह खूंटे से बंध गया... जितनी बार वो अपने सिर को हिलाता.. रस्सी उसके गले में निशान बना देती.. फिर उसका सिर ज़ोर से उस लकड़ी के खंभे में लगता... लेकिन वो बच्चा अपना दर्द किससे कहे... और कैसे कहे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब देख रहे हैं.. लेकिन उसके दर्द को समझने के बजाए उस पर हंस रहे हैं.. तालियां पीट रहे हैं... भूख लगने पर उसे खाना भी किसी जानवर से बदतर तरीके से परोसा जाता है... सचमुच &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ख़ुदा भी आसमां से जब ज़मी पर देखता होगा... मेरे बंदे कितने गधे हैं, ये तो सोचता होगा...&lt;/span&gt; औलाद के जन्म से पहले जो मां-बाप नीम-हकीमों से लेकर पीर फकीरों तक फरियाद लगा रहे थे.. अब बच्चे की परवरिश के लिए वही मां-बाप फिर उन्हीं नीम-हकीमों और पीर फकीरों के बताए रास्ते पर चल रहे हैं... 13 साल से वो मासूम जानवरों की तरह अपनी ज़िंदगी जी रहा है... लेकिन मुल्ला और पंडित अपनी रोज़ी-रोटी चमकाने के लिए उसकी जान से खेल रहे हैं.... बेज़ुबान शकूर मजबूर है...अक्ल से भी और बंदिशों से भी... लोग उसे पागल कहते हैं... लेकिन हकीकत में पागल तो वो लोग हैं.. जो उसकी नादानी पर हंसते हैं.. जो उस पर पत्थर मारकर चले जाते हैं... जो उसके साथ जानवरों जैसा सलूक करते हैं... उसके मां-बाप को कौन समझाए, कि उसका इलाज बेड़ियां नहीं है.. बल्कि उसे एक अच्छे डॉक्टर की ज़रूरत है, उसे एक प्यारे मां-बाप की ज़रूरत है और उसे ढेर सारे प्यार की ज़रूरत है, ...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-3425304105854392006?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/3425304105854392006/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=3425304105854392006' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/3425304105854392006'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/3425304105854392006'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='बेज़ुबान बच्चा बेज़ुबान जानवर बन गया...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sx6jakZiFeI/AAAAAAAAAbU/yGV2Xv3mV9A/s72-c/STILL+2+copy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-7514865656660695856</id><published>2009-11-24T20:45:00.009+09:00</published><updated>2009-11-24T20:57:14.724+09:00</updated><title type='text'>भारत में चाय की आखिरी दुकान</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SwvJiGtyqgI/AAAAAAAAAbE/bz3VFf6_Shs/s1600/Tea+Shop.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SwvJiGtyqgI/AAAAAAAAAbE/bz3VFf6_Shs/s320/Tea+Shop.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5407637365343824386" /&gt;&lt;/a&gt;कड़कड़ाती सर्दी हो और एक गर्म चाय की प्याली हो तो कहने ही क्या... लेकिन चाय की चुस्कियां रोमांच भरी हों, तो गर्म चाय का मज़ा भी दोगुना हो जाता है... अक्सर आपने भी रज़ाई में दुबककर मूंगफली खाते हुए चाय की चुस्कियां ज़रूर ली होंगी... गुलाबी सर्दी में चाय की ये चुस्कियां सर्दियों की रातों को रूमानी बना देती हैं... ख़ासकर तब जब आप पुरानी यादों में खोये हुए हों.. और कानो में पुराने गाने गूंज रहे हों तो कहने ही क्या... सूरज की पहली किरन के साथ चाय की प्याली से उठती हुई भांप हो और साथ में गर्मागर्म बटर टोस्ट हो, तो उसका लुत्फ़ ही अलग है... लेकिन जिस चाय का जिक्र यहां होने वाला है, वो चाय औरों से ज़रा हटकर है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वादियों के बीच इस चाय का ज़ायका आपके मुंह को ऐसा लगेगा, कि बस पूछिए मत... दिल से बस यही निकलेगा... वाह चाय..! घर के बाहर आपने होटल या किसी खोमचे पर चाय की चुस्कियां ज़रूर ली होंगी.. लेकिन आप मेरे साथ चलिए समंदर से 3018 मीटर की ऊंचाई पर... हिमालय से सटे बद्रीनाथ... भारत के आखिरी गांव माणा में... जहां चार से पांच डिग्री के टेम्परेचर में चाय पीने का अपना अलग ही मज़ा है... बद्रीनाथ से तीन किलोमीटर आगे एक चाय की दुकान... जहां से बिना इजाज़त आगे जाना गैरकानूनी है... जहां पहुंचने के लिए आपको कठिन चढ़ाई का सामना करना पड़ेगा.. बर्फ़ की हसीन वादियों से घिरे इस इलाके में कई मंदिर भी हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत-चीन सीमा पर बर्फीली सड़क के बीचों-बीच बसे इस गांव में है चाय की एक ख़ास दुकान... जहां अगर आपने एक बार चाय पी ली, तो वो ताउम्र याद रखेगी... न सिर्फ ज़ायके के लिए बल्कि अपनी एक और ख़ासियत के लिए... भारत के आखिरी छोर पर मौजूद इस दुकान का नाम ही पड़ गया, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;"भारत में चाय की आखिरी दुकान"&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;  कड़ाके की ठंड और सफ़र की थकान इस दुकान की एक गर्मागर्म चाय की प्याली से पलभर में छूमंतर हो जाएगी...  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SwvJpObh7RI/AAAAAAAAAbM/MdghQ6X9bCs/s1600/Tea+Shop+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SwvJpObh7RI/AAAAAAAAAbM/MdghQ6X9bCs/s320/Tea+Shop+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5407637487673797906" /&gt;&lt;/a&gt;दरअसल माणा गांव में ही रहने वाले दिलबर सिंह और उसके भाई की माली हालत जब ख़स्ता होने लगी, तो उन्होंने 1981 में इस इलाके में एक चाय की दुकान खोलने का फैसला किया... और दुकान खोलने के लिए उन्होंने चुनाव किया माणा गांव के सबसे ऊपर व्यास गुफा के पास... जिसके आगे है चीन जाने के लिए बर्फीली सड़क... शुरुआत में कामकाज हल्का ही रहा, लेकिन फिर इस दुकान ने ऐसी रफ्तार पकड़ी, कि जिसने भी माणा पहुंचकर इस चाय की चुस्कियां लीं, उसने इसकी तारीफ़ों के कसीदे पड़ना शुरु कर दिये...और फिर दिलबर सिंह का धंधा चोखा हो गया... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खास बात ये है कि यहां दार्जिलिंग और असम की कड़क चाय मिलती है, तो साथ ही खास हर्बल, तुलसी और घी वाली चाय भी मौजूद है... एडवेंचर के शौकीन लोग जब इस इलाके से गुज़रते हैं, तो भारत में चाय की इस आखिरी दुकान पर आना नहीं भूलते...लेकिन इस दुकान के साथ एक और खास बात जुड़ी है, वो ये कि जब बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं, तभी इस दुकान की रौनक होती है, और जब बद्रीनाथ के कपाट बंद होते हैं, तभी इस दुकान के दरवाज़े भी छह महीने के लिए बंद हो जाते हैं... मतलब साफ़ है कि अगर आप इतनी रोमांचक चाय पीना चाहते हैं, तो आपको बद्रीनाथ की यात्रा के दौरान के दौरान ही यहां का रुख करना होगा... ज़िंदगी में जब कभी मौका मिले... और अगर अगली बार आप बद्रीनाथ के दर्शनों का प्रोग्राम बना रहे हैं, तो एक बार इस दुकान के दर्शन भी ज़रूर कीजिए... वरना आपको ताउम्र इसका मलाल रहेगा, कि आपने &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;"भारत में चाय की आखिरी दुकान"&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; पर चाय की चुस्कियां नहीं लीं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-7514865656660695856?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/7514865656660695856/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=7514865656660695856' title='20 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/7514865656660695856'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/7514865656660695856'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='भारत में चाय की आखिरी दुकान'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SwvJiGtyqgI/AAAAAAAAAbE/bz3VFf6_Shs/s72-c/Tea+Shop.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-5518719868083392161</id><published>2009-10-30T21:59:00.004+09:00</published><updated>2009-10-30T22:09:53.382+09:00</updated><title type='text'>वीसीआर पर फिल्म और पुरानी यादें...</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Surjm9eOrAI/AAAAAAAAAaU/Sk0RPvZtYnI/s1600-h/tv.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 225px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Surjm9eOrAI/AAAAAAAAAaU/Sk0RPvZtYnI/s400/tv.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5398377361832848386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;रंगीन टीवी पर फिल्म चल रही है राजा हिंदुस्तानी&lt;/strong&gt;... हर कोई मग्न होकर फिल्म देखने में लगा है... एक शॉट् में हीरो आमिर खान करिश्मा कपूर का चुंबन लेता है... और सीटियां बजने लगती हैं... नाइनटीज़ के आखिर में किसी हिंदी फिल्म का ये सबसे लंबा चुंबन सीन था... आशिकों के दिलों की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं... लड़कियां लरज़ती हुई अपना चेहरा छिपा लेती हैं.... घड़ी रात का एक बजा रही है... आंखे नींद के आगोश में जा रही हैं... तभी कोई आवाज़ लगाता है... अरे कोई लड़की उठकर चाय बना ला... चाय का नाम सुनकर लड़कियां इधर-उधर दुबकने लगती हैं... क्योंकि एक तो रज़ाई में से निकलकर चूल्हा जलाने का अलकस, उसपर फिल्म के छूट जाने का डर... लेकिन बड़े बुज़ुर्गों के आगे उनकी एक न चलती... मरती क्या न करतीं चाय तो बनाना ही पड़ेगी और वो भी एक-दो नहीं, कम से कम तीस-चालीस लोगों के लिए... वो भी बड़ा सा भगोना भरकर...जिसमें चाय, दूध और पानी का संगम होगा... जिसे चाय कम जोशांदा कहा जाए तो शायद ठीक होगा... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवंबर 1997 की बात है... जब टीवी का चलन बहुत कम घरों में था... और रंगीन टीवी तो खासकर कम देखने को मिलता था। ज्यादातर घरों में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी ही था। टीवी पर फिल्में तो वैसे भी हफ्ते में दो दिन शनिवार और रविवार को ही आती थी... लेकिन क्या करें बिजली आती नहीं थी, तो फिल्म भला कहां देखने को मिलती। लेकिन फिल्म देखने के शौकीनों ने एक ज़रिया निकाल लिया था.. वीसीआर पर फिल्में देखने का। लेकिन इस वीसीआर पर फिल्म देखने का असली मज़ा तो शादियों के दौरान आता था... घर में शादी के बाद जब काम-धाम निपट जाता था और घर में कुछ रिश्तेदार मेहमान ही बच जाते थे, तो शादी की अगली रात को वीसीआर चलाया जाता था। वीसीआर चलता कम था उसका हल्ला ज्यादा होता था। पूरे मौहल्ले भर को पता चल जाता था कि आज फलां घर में वीसीआर चलेगा... बाकायदा किराए पर वीसीआर मंगाया जाता था.. शादी के घर में जनरेटर तो होता ही था, सो लाइट की कोई फिक्र नहीं होती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक रात में वीसीआर पर तीन फिल्में चलती थीं। इस दौरान इश्किया मिज़ाज लड़कों की चांदी हो जाती थी, ज़रा किसी लड़की ने वीसीआर का जिक्र छेड़ा, जनाब जुट गये वीसीआर का इंतज़ाम करने में। और तो लड़कियों से उनकी फ़रमाइश भी पूछी जाती थी। शोले हर किसी की फरमाइश में सबसे ऊपर होती थी। &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SurkvBqtMdI/AAAAAAAAAak/aKu0aFZTXq4/s1600-h/raja-hindustani-wallpaperT_310.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 299px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SurkvBqtMdI/AAAAAAAAAak/aKu0aFZTXq4/s320/raja-hindustani-wallpaperT_310.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5398378599909503442" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;वीसीआर चलने से पहले ही घर के सारे काम निपटा लिये जाते।&lt;/strong&gt; इधर घर के बढ़े-बूढे़ सोने गये, उधर शुरु हो गया वीसीआर पर सनीमा... नवंबर की कड़कड़ाती रात थी और वीसीआर पर शुरु हुआ फिल्मों का दौर। पहली फिल्म चली राजा हिंदुस्तानी... तब ये फिल्म रिलीज़ ही हुई थी। घर के सभी लोग आंगन में दरी-गद्दा बिछाकर बैठे थे... ऊपर से लोगों ने टैंट हाउस से आये लिहाफ़ भी लपेट लिये थे। गाना बजा आये हो मेरी ज़िंदगी में तुम बहार बनके.. एक ड्राइवर से एक अमीर बाप की बेटी का प्यार... एक मिडिल क्लास के लिए इससे बढ़िया स्टोरी भला और क्या हो सकती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस फिर क्या था, लड़के खुद को सपने में आमिर खान और लड़कियां खुद को करिश्मा कपूर समझने लगीं। और उनके मां-बाप एक दूसरे के लिए खलनायक...। फिल्म देखते-देखते सपनों में अपनी दुनिया बसाने लगे। फिल्म की पूरी स्टोरी ख्यालों-ख्वाबों में उतर जाती। तीन फिल्मों के बीच में हर फिल्म के बाद इंटरवल होता था। इस दौरान चाय का दौर चलता था। लड़कियां चाय बनाने बावर्चीखाने में पहुंची, पीछे से मटरगश्ती करते हुए मजनू मियां भी कतार में लग जाते थे। अगर गलती से ऑपरेटर ने फिल्म लगा दी, फिर देखिए चाय बनाने वाली का गुस्सा... हमारे बिना आये तुमने फिल्म कैसे चला दी, पता नहीं है, हम चाय बना रहे हैं। बेचारे को फिल्म फिर से लगाना पड़ती थी। इस दौरान ऑपरेटर साहब का भी बड़ा रुतबा होता था, टीवी पर फिल्म लगाकर जनाब खुद तो एक कोने में दुबक जाते थे, लेकिन कोई उनको सोने दे तब न... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शोर मचता था.. अरे तस्वीर तो आ नहीं रही है... अरे इसकी आवाज़ कहां चली गई...? सबसे ज्यादा मज़ा तब आता था, जब कैसेट बीच में फंस जाती थी... बेचारे ऑपरेटर को नींद से उठकर आके फिर से वीसीआर को सैट करना पड़ता था। पहली फिल्म के बाद आधे लोग तो सो जाते थे और तीसरी फिल्म तक तो इक्के-दुक्के लोग ही टीवी सैट पर नज़रे चिपकाए होते थे। लेकिन इस दौरान आशिक मिजा़ज अपनी टांकेबाज़ी को बखूबी अंजाम देने में कामयाब रहते थे। अरे भाई फिर फिल्म देखने का फायदा ही क्या हुआ... फिल्म कौन कमबख्त देखने आया था... असली मकसद तो बारात में आई लड़की से टांका भिड़ाना था। लड़की ने अगर मुस्कुरा कर उनसे बात कर ली, तो समझो भाईजान का रतजगा कामयाब हो गया। सुबह मौहल्ले में सबसे ज्यादा सीना उन्हीं का चौड़ा होता था। लेकिन इस दौरान &lt;strong&gt;कुछ कमबख्त &lt;/strong&gt;ऐसे भी होते थे, जो फिल्म तो कम देखते थे, लेकिन दूसरों की जासूसी करने में लगे रहते थे और सुबह की पौ फटने से पहले भांडा फोड़ दिया करते थे। खैर अब न तो वीसीआर रहा, न पहले जैसे सुनहरे दिन.. अब तो फिल्म से लेकर प्यार-मौहब्बत तक सबकुछ हाईटेक हो गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-5518719868083392161?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/5518719868083392161/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=5518719868083392161' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5518719868083392161'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5518719868083392161'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/10/blog-post_30.html' title='वीसीआर पर फिल्म और पुरानी यादें...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Surjm9eOrAI/AAAAAAAAAaU/Sk0RPvZtYnI/s72-c/tv.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-2195756851826850638</id><published>2009-10-28T16:07:00.005+09:00</published><updated>2009-10-28T16:23:40.561+09:00</updated><title type='text'>किराए का घर और इतने सवाल...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SufvpQXuFsI/AAAAAAAAAZs/NT0EFFKUDnE/s1600-h/Rent.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SufvpQXuFsI/AAAAAAAAAZs/NT0EFFKUDnE/s320/Rent.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5397546170474960578" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;छड़े हो जी... &lt;/strong&gt;इस सवाल को सुनकर जैसे कुछ समझ ही नहीं आया... छड़े का मतलब... हमने तो अबतक छड़ी के बारे में ही सुना था... लेकिन ये छड़े क्या है? अरे मेरा मतलब है शादी हुई है या नहीं..? मेरा मतलब कुंवारे हो क्या..? जी मैंने कहा... माफ़ करना जी फिर हम आपको कमरा नहीं दे सकते... हमें फैमिली वालों को ही अपना घर देना है... छड़ों को नहीं देते... ठीक है जैसी आपकी मर्ज़ी... मैंने मकान मालिक को शुक्रिया कहा... और वापस लौट आया...  मकान भले ही न मिला हो.. लेकिन एक अल्फ़ाज़ के बारे में जानने का मौका और मिल गया... &lt;strong&gt;छड़े... यानि कुंवारे...&lt;/strong&gt;दिल्ली, हरियाणा, नोएडा, गाज़ियाबाद और मगरिबी सूबे उत्तर प्रदेश में इस तरह की बोलचाल आम है.. अगर आप किराए पर मकान लेने जाएंगे तो ये सवाल आपसे सबसे पहले पूछा जाएगा.... मकान की तलाश के दौरान अक्सर ऐसे ही सवालों से दो-चार होना पड़ता है... कई बार तो सवालों की बौछार इस तरह होती है, जिससे कुछ देर के लिए आपको ऐसा लगेगा कि शायद आपने कोई जुर्म किया है और आपसे पूछताछ हो रही है... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमाम तरह के सवालात और आपको शक की निगाहों से देखना... &lt;strong&gt;कहां के रहने वाले हो..?&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;काम क्या करते हो?&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;नाम क्या है?&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;कितने लोग रहोगे?&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;इससे पहले कहां रहते थे.&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;?&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;पुराना मकान क्यों छोड़ रहे हो..?&lt;/strong&gt;  &lt;strong&gt;इस शहर में तुम्हे कोई जानता है या नहीं.?&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;तुम्हारे घर में कौन-कौन रहता है...?&lt;/strong&gt; वगैरह-वगैरह। अगर आप इन टेढ़े-मेढ़े सवालों का जवाब देकर इस इम्तिहान को पास कर गये, तो समझो आपको मकान मिल गया। लेकिन आपकी टेंशन अभी यहीं ख़त्म नहीं हुई। अभी तो ढेर सारी शर्तें हैं जिनसे आपको दो-चार होना पड़ेगा। देखिये अगर घर में रहना है तो नॉनवेज नहीं चलेगा.. यार-दोस्त नहीं आयेंगे... बिजली का बिल अलग से आयेगा, बावजूद इसके लाइट कम जलाओगे.. प्रेस नहीं करोगे.. वॉशिंग मशीन नहीं चलेगी... रात को जल्दी आना होगा... ज्यादा शोर-शराबा नहीं होना चाहिए... ऐसा लगता है जैसे आपको मकान किराए पर नहीं मिल रहा है, बल्कि मान मालिक आपको मुफ्त में मकान दे रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाप-रे-बाप इतनी शर्तें और इतने सवाल.. अगर इतनी तैयारी यूपीएससी के एक्ज़ाम में कर लेते.. तो सेकेंड क्लास अफ़सर तो ज़रूर बन जाते। और अगर आपने गलती से बता दिया कि भईया मैं पत्रकार हूं... आपको किसी तरह की तकलीफ़ नहीं होगी, तो समझो आपको मिलता हुआ कमरा भी हाथ से गया। लेकिन अभी आपकी परेशानियां यहीं ख़त्म नहीं हुई हैं। &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sufwr_r6nRI/AAAAAAAAAZ0/jBh59OaOHQQ/s1600-h/Rent3.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sufwr_r6nRI/AAAAAAAAAZ0/jBh59OaOHQQ/s320/Rent3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5397547317047500050" /&gt;&lt;/a&gt;मकान दिलाने के लिए आपने जिन भाईसाहब की मदद ली थी, अभी तो उनका रोल बाकी था। दरअसल चार साल पहले मेरे साथ ऐसा हुआ कि मैंने एक दुकानदार भाई से पूछ लिया कि भईया यहां कोई मकान किराए पर मिल सकता है। इतना सुनना था कि जनाब की बांछे खिल गईं... अरे क्यों नहीं भाई साहब... ज़रूर मिल जाएगा... मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं... जिनका मकान किराए के लिए खाली है... जनाब ने सबसे पहले मुझे पानी पिलाया... और फिर अपनी मीठी-मीठी बातों से आईने में उतार लिया। मुझे लगा कि इस अंजान शहर में इतने शरीफ़ लोग भी रहते हैं... अल्लाह इनका भला करे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस भाई साहब ने अपनी दुकान बंद की और मुझे मकान दिखाने ले गये.. कई मकान दिखाए, जिसमें से एक मुझे पसंद आ गया। इसके बाद, बात हुई किराए की, मकान मालिक ने बड़ा सा मुंह खोला। &lt;strong&gt;भला हो दिल्ली में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स का.&lt;/strong&gt;.. मकान का किराया भी आसमान पर पहुंच गया। &lt;strong&gt;चार हज़ार रुपये का किराया सुनकर झटका सा लगा।&lt;/strong&gt; हमारे रामपुर शहर में तो चार हज़ार रुपये में नवाब साहब का किला भी किराए पर मिल जाएगा.. फिर ये पचास गज़ में बना दो कमरों का कबूतरखाना और किराया चार हज़ार रुपये। बात इतने तक होती, तब भी ठीक था... इसके बाद जो भाईसाहब हमें मकान दिलाने ले गये थे उन्होने भी मुंह खोल दिया... नकली हंसी निकालकर बोले... &lt;strong&gt;हें..हें..हें..&lt;/strong&gt; एक महीने का किराया मुझे भी देना होगा... ये मेरा कमीशन है। एक महीने का आप से लेंगे और एक महीने का मकान मालिक से। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना सुनकर मेरी तो आंखे फटी रह गईं... अबतक जिन्हे हम अजनबी शहर में अपना अज़ीज़ समझ रहे थे एक झटके में ही वो हमारे लिए दलाल बन गये। समझ नहीं आ रहा था, कि थोड़ी देर पहले हमने इन्हें जो झोली भरकर दुआएं दी थीं, उनका क्या करें.. वापस भी नहीं ले सकते। अब इन्हें गालियां दें... या अपने लुटने पर शर्मिंदा हों... मुफ्त में जेब पर एक महीने का डाका पड़ रहा था। लेकिन वो सेर थे तो हम भी सवा सेर थे... बोल दिया हमें मकान नहीं चाहिए और भाई साहब से पिंड छुड़ाकर निकल गये। फिर चार-पांच दिन बाद हम उसी मकान में पहुंचे... मकान मालिक से बात की कि जनाब मकान चाहिए और अगर उनको बीच में डाला, तो दोनों को ही एक-एक महीने का चूना लगेगा... आप चाहें तो मकान दे सकते हैं... मकान मालिक को भी फायदे का सौदा लगा... और मकान की चाभी हमारे हाथ में सौंप दी.. मकान तो किराए पर मिल गया.. लेकिन इस दौरान जिन दिक्कतों से गुज़रना पड़ा उसकी टीस आज भी बाकी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-2195756851826850638?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/2195756851826850638/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=2195756851826850638' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2195756851826850638'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2195756851826850638'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/10/blog-post_28.html' title='किराए का घर और इतने सवाल...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SufvpQXuFsI/AAAAAAAAAZs/NT0EFFKUDnE/s72-c/Rent.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-6077706939218637750</id><published>2009-10-21T21:02:00.007+09:00</published><updated>2009-10-25T19:13:32.375+09:00</updated><title type='text'>वीओआई...एक आवाज़ जो घुटकर रह गई...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/St76vW25yuI/AAAAAAAAAZE/ALd3cP3eN8k/s1600-h/VOI.png"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 146px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/St76vW25yuI/AAAAAAAAAZE/ALd3cP3eN8k/s400/VOI.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5395025095133088482" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आखिरी विदाई का वक्त था&lt;/strong&gt;, तो माहौल थोड़ा ग़मगीन होना लाज़िमी था... जिसे अपने खून पसीने से सींचकर आशियां बनाया था, वो डेढ़ साल में ही ज़मीदोज हो गया... जिन सपनो में पंख लगाकर उड़ने की कोशिश की थी, उन्हे एक झटके में ही किसी ने कतर डाला था... तमाम किले बनाए थे... तूफ़ानों से लड़कर अपनी ज़िंदगी का क़तरा-क़तरा कुर्बान किया था.. उसकी एक-एक चीज़ को सहेजकर ऐसे सजाया था, जैसे कोई मां अपनी बेटी के लिए दहेज़ का सामान जुटाती है... एक चैनल से दूसरे चैनल तक ज़िंदगी में कुछ करने का जज़्बा था... दफ्तर में कलीग एक-दूसरे को देखकर जी रहे थे... हर किसी के मन में कुछ नया करने का जज्बा, खासकर उन लोगों के दिल में जिन्होने अभी जर्नलिज्म के पेशे में कदम ही रखा था... जो मीडिया की चमक-दमक देखकर मैनेजमेंट, आईटी, मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे कई ट्रेडिश्नल करियर को बायबाय करके आये थे, लेकिन उनको जो तजुर्बा हुआ उसके बाद तो वो शायद अपने बच्चों को भी कभी इस प्रोफेशन में न आने दें... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके सपनो का बुलबुला तो पल भर में बिखर गया था...  मुझे अच्छी तरह याद है जब उन लोगों को ऑफ़र लेटर मिले थे, तो उनके चेहरे पर खुशी साफ़ पड़ी जा सकती थी, उनमें काम सीखने की कैसी ललक थी, एक-एक बात को वो बार-बार पूछने आते थे... वो चाहते थे, कि जल्दी-जल्दी सबकुछ सीख जाएं... लेकिन चार महीने में ही उनके सारे ख्वाब चकनाचूर हो गये.. मीडिया की कड़वी हकीकत से वो लोग इतनी जल्दी रूबरू हो जाएंगे, ऐसा तो उन्होने सपने में भी नहीं सोचा होगा... क्या-क्या प्लान बनाए होंगे अपनी ज़िंदगी को लेकर... लेकिन इसमें उन बेचारों का क्या कसूर है... कसूर तो कुकुरमुतों की तरह उगे उन इंस्टीट्यट का है, जिन्होने मीडिया की झूठी चमक-दमक दिखाकर लोगों से पैसे ऐंठ लिए...  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वॉयस ऑफ़ इंडिया... &lt;/strong&gt;यही नाम था उस न्यूज़ चैनल का...था इसलिए क्योंकि अब वो तारीख बन चुका है.. अब उसे लोग सिर्फ़ याद करेंगे... उसके सिवा शायद किसी के पास कोई ऑप्शन भी नहीं होगा.. हम ख़बर हैं बाकी सब भ्रम है.... यही उसकी पंचिंग लाईन थी.. बड़े शहरों में, चौराहों से लेकर मेट्रो स्टेशन तक.. हर कहीं उसके अजीब से विज्ञापन वाले बोर्ड नज़र आते थे... लेकिन एक साल में ही हम ख़बर बन गये.. जब चैनल शुरु हुआ था... तो दूसरे चैनलों की धड़कनें तेज़ हो गईं थी.. हर कोई चाहता था, कि उसे एक बार इस चैनल में काम करने का मौका मिल जाए.. लोगों ने बड़ी तिकड़मे भिड़ाईं कि किसी तरह उनका सपना सच हो जाए.. बस एक बार उन्हें भी वॉयस ऑफ़ इंडिया में काम करने का मौका मिल जाए.. जिनका सपना पूरा हुआ वो खुद को खुशनसीब समझते थे... लेकिन जो बदनसीब यहां तक नहीं पहुंच पाए वो आज खुद को खुशनसीब समझते हैं... &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SuQkQcHSB_I/AAAAAAAAAZk/-sUBfrnrAkk/s1600-h/obvan.png"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SuQkQcHSB_I/AAAAAAAAAZk/-sUBfrnrAkk/s320/obvan.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396478118339938290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अफ़सोस ये कि आज वो लोग&lt;/strong&gt; भी हमें फूटी आंख देखना पसंद नहीं करते जो कल तक फोन पर नौकरी लगवाने की गुहार लगाते थे... मैं खुद ऐसे बहुत सारे लोगों को जानता हूं, जो मुझे फोनकर कहते थे, कि बस यार एक बार बात करवा दो.. किसी बॉस से मिलवा दो.. आज वही लोग खुद को हमसे बड़ा और समझदार साबित करने की कोशिश करते हैं... ऐसा नहीं है कि हमारी किस्मत कोयले से लिखी है, और दूसरी जगह काम करने वाले सोने से अपनी किस्मत लिखवाकर आये हैं... या वीओआई में काम करने वाले सभी लोगों की किस्मत एक साथ खराब हो गई.... वीओआई में काम करने के लिए लोगों ने कई बड़े चैनल्स छोड़ दिये। वीओआई में काम करने वालों में भी कोई कमी नहीं हैं। उनके ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहे हैं। ऐसे में वीओआई में काम करने वालों को हिकारत की नज़र से देखना भला कहां की समझदारी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौन नहीं जानता कि इस दौर में कई बड़े चैनल होने का दावा करने वालों को पसीने आ गये... और उन्होने चुपचाप अपने एम्पलॉयज़ को बाहर का रास्ता दिखा दिया... और तो और उन्होने अपने एम्पलॉयज़ को प्रमोशन और इँक्रीमेंट तक नहीं दिया... लेकिन जिनके घर शीशे के हैं वो भी हमारे ऊपर पत्थर उछाल रहे हैं...ये जानते हुए भी कि इससे उनके घर में भी दरारें आयेंगीं... कौन जानता था, कि हिंदुस्तान की तीसरे नंबर की सॉफ्टवेयर कंपनी सत्यम का इतना बुरा हाल होगा... चाहे एफ़एमसीजी हो, एयरलाईन हो या शेयर मार्केट में काम करने वाली दूसरी बड़ी कंपनियां हों.. हर कोई मंदी की मार से जूझ रहा था... अगर चैनल डूबा तो इसकी एक बड़ी वजह तो यही थी, कि ये ऐसे वक्त में लॉंच हुआ जब बाज़ार में मंदी का आलम था.. मार्केट से रेवेन्यु आया नहीं और चैनल लॉस में जाता रहा.. वरना चालीस ओबी वैन के साथ शुरु हुए इस चैनल की इतनी जल्दी ऐसी हालत हो जाएगी, इसका तो किसी को भी गुमान नहीं था... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने करियर को हर कोई चार चांद लगाना चाहता है... जो लोग भी वॉयस ऑफ़ इंडिया में आए, वो बड़े लोगों को देखकर ही आए... लेकिन आज लोग हमें बिन मांगे सलाह दे रहे हैं, जो मदद तो नहीं कर सकते, लेकिन चुटकियां ज़रूर ले रहे हैं... आज वीओआई में जो कुछ हुआ, या उसके लोगों के साथ जो कुछ हुआ वो तो ज़िंदगी का एक हिस्सा है, और ऐसा नहीं है कि जो लोग आज हंस रहे हैं, कल उनकी ज़िंदगी में ऐसे दिन न आएं... लेकिन मुझे अफ़सोस उन लोगों के लिए है जिन्होने वीओआई के साथ सपने बुन लिए... अफ़सोस उन लोगों के लिए है, जिन्होने यहां पर अपना घर-परिवार तक बसा लिया... अफ़सोस उन लोगों के लिए है, जिन्होने वीओआई के भरोसे लोन लेकर मकान खरीद लिये.. उनके सामने तो एक तरफ़ कुआं और दूसरी तरफ़ खाई है.. वैसे भी महानगरों में रहने वालों की आधी ज़िंदगी तो किस्तों में कट जाती है... लेकिन ऐसा नहीं है कि सब दिन एक समान होते हैं, कभी के दिन बड़े होते हैं, तो कभी की रातें बड़ी होती हैं.. और वैसे भी अंधेरे के बाद ही सूरज निकलता है... खुदा या भगवान तो सबका होता है.. अगर उसने दुनिया में भेजा है, तो रोज़ी-रोटी का इतज़ाम करना उसकी ज़िम्मेदारी है... चलते-चलते बिन मांगी सलाह उन लोगों के लिए है, जो मीडिया को अपना प्रोफेशन बनाने जा रहे हैं... कोई भी कदम बढ़ाने से पहले एक बार वॉयस ऑफ़ इंडिया का इतिहास ज़रूर पढ़ लेना...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-6077706939218637750?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/6077706939218637750/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=6077706939218637750' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6077706939218637750'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6077706939218637750'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/10/blog-post_21.html' title='वीओआई...एक आवाज़ जो घुटकर रह गई...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/St76vW25yuI/AAAAAAAAAZE/ALd3cP3eN8k/s72-c/VOI.png' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-8882878401967239426</id><published>2009-10-18T19:15:00.005+09:00</published><updated>2009-10-18T19:42:49.568+09:00</updated><title type='text'>अरे कोई इन ढाबों से बचाओ...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/StrwfR2T5RI/AAAAAAAAAY0/cgJGkh_i2zc/s1600-h/3297508757_67f07df502.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/StrwfR2T5RI/AAAAAAAAAY0/cgJGkh_i2zc/s320/3297508757_67f07df502.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5393887923887400210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ईद ख़त्म हो चुकी थी&lt;/span&gt; और अब घर से दिल्ली रवानगी का वक्त करीब आ रहा था। अम्मी ने बैग में करीब-करीब सारा सामान बांध दिया था। कपड़ों और किताबों के अलावा खाने का भी कुछ सामान बैग में था। फिर वो सुबह भी आई जब दिल्ली जाने का वक्त आया। घर से निकलते वक्त तमाम हिदायतें भी मिलीं। किसी से फालतू दोस्ती मत करना, रास्ते में कुछ खाना मत... वगैरह..वगैरह। अलसुबह हम बस में सवार हुए, घर से कोई सीधी बस दिल्ली नहीं जाती थी, इसलिए हमेशा की तरह पहले मुरादाबाद की बस ली, वहां से आगे दिल्ली की बस में सवार होना था। मुरादाबाद पहुंचे तो दिल्ली की बस भी तैयार मिल गई। अभी तक सफ़र बड़े आराम से कट रहा था। सफ़र लम्बा था, इसलिए मैंने सोचा क्यों न झपकी ही ले ली जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक घंटे के बाद ही अचानक बस रुक गई, मालूम हुआ, कि बस एक रोडसाइड ढाबे पर रुकी है। दिल्ली के रास्ते में पड़ने वाले एक ढाबे पर.... कुछ नाम भी लिखा था, उस पर शायद वैष्णव ढाबा। किसी भी हाईवे या सड़क से आप गुज़र जाईये... थोड़ी-थोड़ी दूर पर आपको कुकुरमुत्तों की तरह उगे ऐसे हज़ारों ढाबे मिल जाएंगे। जिन पर लिखा होता है... काके दा ढाबा, पम्मी दा ढाबा, शेरे पंजाब ढाबा, माता वैष्णो ढाबा, गुलशन ढाबा, मुस्लिम ढाबा वगैरह वगैरह... कुछ ढाबे तो बाकायदा इस बात का दावा करते हैं, कि वो फलाने परिवहन निगम से अनुबंधित हैं। नेशनल हाईवे-24 की सुनसान सड़क के ऐसे ही एक ढाबे पर ड्राइवर ने यूपी रोडवेज़ की बस रोक दी। बस रोकने के बाद ढाबे वाले के साथ ही ड्राईवर और कंडक्टर भी आवाज़ लगा रहे थे, जिस किसी को कुछ खाना-पीना है, वो खाले... अभी आधे घंटे बस ढाबे पर रुकेगी... किसी को टॉयलेट बाथरूम जाना है, वो जा सकता है। एक-एक कर सारी सवारियां बस से नीचे उतर गईं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढाबे वाला आवाज लगा रहा था... बीस रुपये में भरपेट खाना खाइये। बीस रुपये की थाली है, जिसमें दाल-चावल रोटी, सब्ज़ी, रायता और अचार मिलेगा। हर कोई अपने-अपने अंदाज़ में आवाज़ लगा रहा था, ग्राहकों को लुभाने की या यूं कहें बेवकूफ बनाने की भरपूर कोशिश की जा रही थी। खाना तो मेरे बैग में ही था, जो अम्मी ने घर से चलते वक्त बनाकर दिया था, तो मैंने सोचा कि चलो एक कप चाय ही पी ली जाए, कुछ सुस्ती ही उतर जाएगी। आगे बढ़कर चाय वाले से एक चाय ली, जो पांच रुपये की थी। लेकिन उस चाय को मुंह में रखते ही ऐसा लगा जैसे कोई बदबूदार और कड़वी चीज़ मुंह में डाल ली हो, चाय के स्वाद से लगा, जैसे ये कई दिन पुरानी हो, उसका ज़ायका बयान करने लायक नहीं है। मैंने फौरन ही चाय पास ही कूड़ेदान में फेंक दी... चाय वाले से उसकी शिकायत की, तो ऐसा लगा जैसे वो मेरे ऊपर चढ़ बैठेगा। लेकिन इस अजनबी जगह में मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा, और अपने पांच रुपये पर अफ़सोस कर बस में वापस आकर बैठ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Strw3u7MW_I/AAAAAAAAAY8/VeI0cMGIAic/s1600-h/22.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Strw3u7MW_I/AAAAAAAAAY8/VeI0cMGIAic/s320/22.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5393888344009366514" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लेकिन थोड़ी देर बाद अचानक&lt;/span&gt; फिर कुछ शोर सा सुनाई दिया। मारो-मारो साले को... आवाज़ सुनकर मैं भी नीचे उतर गया। भीड़ में कुछ लोग एक आदमी को पीट रहे थे और वो बेचारा बचाने की गुहार लगा रहा था... जब वो लोग मारकर चलते बने तो मैंने उससे हमदर्दी के बतौर पूछा... भाई साहब क्या हुआ, ये लोग आपको क्यों मार रहे थे?? इतना कहते ही उस बेचारे की रुलाई फूट पड़ी। कहने लगा भईया हमें क्या पता था... ये लोग चिल्ला रहे थे बीस रुपये में भरपेट खाना खाओ। मैं भी खाने बैठ गया, लेकिन खाने खाने के बाद ये लोग खाने का डेढ़ सौ रुपया मांग रहे थे। हमने कहा भईया आप तो बीस रुपये में आवाज़ लगा रहे थे, तो कहने लगे ज्यादा जबान मत लड़ा... चल पैसे निकाल... मैंने कहा, मैं बीस से ज्यादा नहीं दूंगा... तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाकर लूट रहे हो... बस इतना कहना था.. कि सारे लोग मुझे चिपट गये और मुझे मारने लगे। इतना सुनते ही मेरे बदन में कंपकपी छूट गई... मैंने सोचा मैं बड़ा खुशनसीब था, नहीं तो शायद वो चाय वाला मेरी भी ऐसी ही हालत करता। ये तो तस्वीर सिर्फ़ एक ढाबे की है, लेकिन सड़कों के किनारे पर बने ऐसे सैकड़ों-हज़ारों ढाबों का यही हाल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन ढाबों पर बसों के ड्राईवर और कंडक्टर तो मुफ्त में खाना खाते हैं, लेकिन उसके बदले में उनकी सवारियों को बुरी तरह लूटा जाता है। अवैध तरीके से खुले इन ढाबों पर न तो पुलिस छापा मारती है और न ही प्रशासन कोई कार्रवाई करता है। जनता लुटती रहे तो उनकी बला से। उनका हफ्ता बंधा होता है जो तय वक्त पर उनके पास पहुंच जाता है। ढाबे वाले सवारियों से न सिर्फ़ मनमाने दाम वसूलते हैं, बल्कि उनके साथ बाउसरों और गुंडो की एक टीम भी होती है, जो आनाकानी करने वालों को मार-मार कर सबक सिखा देते हैं। उस आधे घंटे के दौरान ढाबे वालों का बस चले तो सवारियों के कपड़े उतार ले। हर चीज़ के दाम बाज़ार से तिगुने और चौगुने वसूले जाते हैं, और जो कोई रेट को लेकर एतराज़ करता है, उसे उनके मुस्टंडे अच्छी तरह से आटे-दाल का भाव समझा देते हैं। जनता आखिर करे भी तो क्या... सरकारें तो गूंगी-बहरी हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-8882878401967239426?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/8882878401967239426/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=8882878401967239426' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8882878401967239426'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8882878401967239426'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='अरे कोई इन ढाबों से बचाओ...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/StrwfR2T5RI/AAAAAAAAAY0/cgJGkh_i2zc/s72-c/3297508757_67f07df502.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-2726565550236510947</id><published>2009-09-19T23:50:00.001+09:00</published><updated>2009-09-19T23:53:26.813+09:00</updated><title type='text'>बेचारे पिता और पति</title><content type='html'>पिता और पति.. दुनिया के किसी भी समाज के लिए इनकी वेल्यू एक जैसी ही है... एक मर्द की तमाम ज़िंदगी इन दो अल्फ़ाज़ों का बोझ ढोते-ढोते गुज़र जाती है... समाज में जब रिश्तों को नाम देने का चलन आया होगा, तो किसी को इस बात का गुमान नहीं होगा, कि जितने छोटे ये अल्फ़ाज हैं, उससे दस गुना ज्यादा बड़ी इनकी ज़िम्मेदारी होगी।   आप सोच रहे होंगे कि मैं आपको अल्फाज़ों की बाजीगरी सिखाने की कोशिश कर रहा हूं... लेकिन मेरा ऐसा मकसद कतई नहीं है... मेरी कोशिश होती है, कि हर बार कुछ अलग सा लिखूं, बहुत दिन से कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखूं... लेकिन मंदी की मार ने इन दो अल्फ़ाज़ों पर ही लिखने को मजबूर कर दिया.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुआ यूं कि जब मंदी की मार ने एक पूरे दफ्तर को ही तबाह कर दिया, तो बुरे वक्त में साथी ही एक-दूसरे को दिलासा देने की कोशिश कर रहे थे। हमेशा की तरह मैं टेंशन से दूर रहकर माहौल को हल्का करने की कोशिश कर रहा था... लोग एक दूसरे के साथ हमदर्दी के दो बोल बोलकर साथियों का गम बांट रहे थे। जो लोग अपना घर-बार छोड़कर दिल्ली जैसे अजनबी शहर में थे उनके साथ हमदर्दी कुछ ज्यादा थी। बातचीत के दौरान ऑफिस में ही मेरी एक साथी के मुंह से निकला, यार हम लड़कियों का तो कुछ नहीं, किसी तरह एडजस्ट कर लेंगे, लेकिन तुम लड़कों का क्या होगा... जो घर से दूर एक अजनबी शहर में अपने सपनो का घर बसाने आये थे। उसकी इस बात पर मुझे हंसी आ गई.. मैंने माहौल को हल्का करते हुए कहा, कि हां तुम सही कहती हो, लड़कियों को तो गॉड गिफ्ट मिला है, उनको तो कोई पालनहार मिल ही जाता है... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन से जवानी तक पिता के कंधों पर ज़िम्मेदारी... और जवानी के बाद ये ज़िम्मेदारी बेचारे पति नाम के प्राणी पर आ जाती है। सिर्फ़ हिंदी की एक मात्रा का फर्क है...गौर से देखिए तो पिता में प पर लगने वाली छोटी इ की मात्रा... लड़की के जवान होते-होते पति के त पर लग जाती है... और ये छोटा सा लफ्ज बोझा ढोते-ढोते कमान बन जाता है... लेकिन तीर निशाने पर ही लगता है... अपनी पत्नी की ज़िम्मेदारी निभाते-निभाते ये छोटा सा अल्फ़ाज़ आगे जाकर फिर पति से पिता बन जाता है... और ये सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है... पति बनकर पहले अपनी हमशीरा के नाज़-नखरे उठाना... फिर जब एक वक्त बाद आपके घर में किलकारियां गूंजने लगती हैं.. तो फिर दूसरी ज़िम्मेदारी आपके सामने हाथ फैलाकर खड़ी होती है... मंदी के इस दौर में अगर एक लड़की की नौकरी चली भी जाती है, तो क्या फर्क पड़ता है.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मां-बाप कुछ दिन बाद अपनी लाडली बिटिया के एक लिए सुंदर सुशील गृहकार्य दक्ष लड़का ढूंढ ही लाते हैं... और मान लीजिए लड़की का रिश्ता जिस लड़के से तय हुआ है, अगर उसकी नौकरी चली जाती है, तो बेचारे गरीब को तो नौकरी के साथ-साथ छोकरी से भी हाथ धोना पड़ता है... फिर चाहे लड़का लाख मिन्नतें करे, लेकिन कोई उस बदनसीब को एक मौका देने को तैयार नहीं होता... हारकर बेचारे को फिर उतरना पड़ता है एक और अग्नि-परीक्षा के लिए। हालांकि कुछ लड़कियां बहुत खुद्दार भी होती हैं, जो चाहती हैं कि वो भी कमाकर अपने हाथ-पैरों पर खड़ी हों और उनके सपनों की भी एक दुनिया हो, लेकिन पति उनको भी ऐसा ही चाहिए जो खूब कमाता हो, जिसका अपना बंग्ला हो, गाड़ी हो, बैंक-बेलेंस हो, जो शादी के बाद हनीमून पर उन्हें विदेश की सैर कराए, और जो उनके सपनों को पंख लगा सके। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या है कोई ऐसी लड़की जो किसी निकम्मे लड़के को अपना दूल्हा बनाएगी? या है कोई ऐसा परिवार जो किसी निकट्ठू को अपना दामाद बनाएगा? चाहे लड़की नौकरीपेशा ही क्यों न हो, चाहे उसका परिवार करोड़ो में ही क्यों न खेलता हो। जवाब होगा नहीं.. क्योंकि समाज ने ऐसी परंपरा बना दी है। और इसका पालन वो लोग भी सीना ठोंककर करते हैं, जो समाज में बदलाव की बात करते हैं। पिता और पति के ये दोनो कैरेक्टर लड़कियों के लिए इकॉनॉमिक सपोर्टर का रोल ही नहीं निभाते, बल्कि उन्हे तो उनके सिक्योरिटी गार्ड का रोल भी निभाना पड़ता है... पहले पिता अपनी बेटी के साथ साया बनकर चलता है, फिर मियां अपनी बेगम को ज़माने भर की निगाहों से बचाने में लगे रहते हैं। हालांकि मैं खुद इससे इत्तेफाक नहीं रखता, क्योंकि आज की लड़कियां इतनी कमज़ोर नहीं हैं, कि उन्हे किसी सिक्योरिटी गार्ड की ज़रूरत पड़े... इसके लिए आदिम युग का वो समाज ज़िम्मेदार है, जिसने हमेशा उनकी आज़ादी पर लगाम लगाने की कोशिश की है। और मर्द ज़ात का खौफ दिखाकर उनके अरमानों का गला घोंटा है। हालांकि इसमें बेचारी लड़कियों का कोई दोष नहीं है, ये तो समाज ही इतना गब्दू है.. कि आज भी सब चलता है से आगे ही नहीं बढ़ना चाहता....।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-2726565550236510947?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/2726565550236510947/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=2726565550236510947' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2726565550236510947'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2726565550236510947'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='बेचारे पिता और पति'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-5463735108212801769</id><published>2009-08-18T15:43:00.010+09:00</published><updated>2009-08-18T15:52:50.863+09:00</updated><title type='text'>चीन से आये भगवान...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SopOs7fpPyI/AAAAAAAAAYM/QQBp2PbZr1o/s1600-h/2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SopOs7fpPyI/AAAAAAAAAYM/QQBp2PbZr1o/s320/2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5371192039384366882" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रोज़ की तरह दफ्तर में ख़बर को लेकर अफ़रा-तफ़री मची थी... सुबह, सुबह वैसे भी ख़बरों का टोटा होता है, लिहाज़ा हर ख़बर को स्क्रीन पर उतारने की जल्दबाज़ी रहती है। अचानक एक ख़बर पर नज़र पड़ी, पहले तो कुछ खास नहीं लगा। लेकिन फिर ध्यान आया कि कम से कम इसके विज़ुअल्स तो देख ही लिए जाएं...  ख़बर थी, कि राजस्थान के प्रतापगढ़ में भेरूलाल नाम के एक शख्स को सपना आया, जिसमें उसने एक घोड़ा और उसके पैरों के निशान देखे। सपने में उसके देवता रामदेव ने उसे गांव में मंदिर बनाने का आदेश भी दिया। भेरूलाल ने सुबह उठते ही गांववालों को इस सपने के बारे में ख़बर दी, सपने के मुताबिक उसे गांव में ही एक छोटा सा घोड़ा और उसके पैरों के निशान भी मिल गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SopO4AFD99I/AAAAAAAAAYU/v1U5yZxOMI0/s1600-h/4.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SopO4AFD99I/AAAAAAAAAYU/v1U5yZxOMI0/s320/4.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5371192229593610194" /&gt;&lt;/a&gt;बस फिर क्या था, भेरूलाल और गांव वाले फटाफट मंदिर बनाने में जुट गये। लेकिन जैसे ही ये ख़बर जंगल में आग की तरह फैली, सरकारी अमला भी गांव में पहुंच गया। लेकिन गांव वाले जिद पर अड़े थे, कि मंदिर तो ज़रूर बनाएंगे, आखिर भगवान खुद उनके द्वार पर जो आये हैं। लेकिन उस भेरुलाल को ये कौन समझाए, कि जिस सपने की बात वो कर रहा है, वो है तो ठेठ देसी, लेकिन उसके तार चाईना से जुड़े हैं। अब इन नासमझो को कौन समझाए, कि भईया ये एक छोटा सा प्लास्टिक का घो़ड़ा है, जो बच्चों के खेलने के काम आता है। और तो और उस घोड़े के पेट पर लिखा भी है &lt;strong&gt;मेड इन चाईना&lt;/strong&gt;.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SopPHCGkNEI/AAAAAAAAAYc/vvG6dofZ0QQ/s1600-h/3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SopPHCGkNEI/AAAAAAAAAYc/vvG6dofZ0QQ/s320/3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5371192487834825794" /&gt;&lt;/a&gt;लेकिन आस्था के अंधविश्वास में डूबे इन गांव वालों को कौन बताए, कि भईया, ये किसी ड्रामेबाज़ का ड्रामा है... भ्रमजाल से बाहर निकलो.. हो सकता है किसी ने शरारतन गांव में प्लास्टिक का ये खिलौना डाल दिया हो। भगवान के बंदों कुछ तो दिमाग लगाओ... लेकिन शायद उन लोगों की अक्ल तो कहीं चरने चली गई थी। पुलिस-प्रशासन ने लोगों से लाख मिन्नतें की भगवान के नाम पर भगवान का मज़ाक मत बनाओ... कम से कम भगवान से तो डरो... लेकिन कोई सुनने के तैयार कहां... घोड़ा भी सोच रहा होगा, कि मेरे चक्कर में तो ये गांव वाले गधे बन चुके हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SopPXRyPZrI/AAAAAAAAAYk/RMoBTfefyPw/s1600-h/1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SopPXRyPZrI/AAAAAAAAAYk/RMoBTfefyPw/s320/1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5371192766922450610" /&gt;&lt;/a&gt;गांव में चीन से आये घोड़ेनुमा भगवान की यात्रा निकाली गई, उसके पदचिन्हों की पूजा कर आरती की गई... लेकिन भगवान के ये बंदे कैसे समझें... कोई इसे बाबा रामदेव का चमत्कार बता रहा था.. तो कोई इसे भगवान का करिश्मा... आस्था में बहके लोगों के कदम ऐसे बहके, कि वो सरकारी अमले से भी दो-दो हाथ करने को तैयार हो गये। बाबा के कथित आदेश के बाद भेरूलाल तो जुट गया, सपने को पूरा करने में... गांव में ढोल-मंजीरों पर लोग नाचने लगे, भेरूलाल का सपना सच हो रहा था, ऐसा लगा जैसे धीरूभाई अंबानी किसी से कह रहे हों, दुनिया कर लो मुट्ठी में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव में भेरूलाल.. अंबानी के नक्शेकदम पर चल रहा था... उसका सपना सच हो रहा था... गांव वाले अड़ गये कि अगर सरकारी ज़मीन पर मंदिर नहीं बना, तो हम अलग से ज़मीन लेकर मंदिर बनाएंगे। 33 करोड़ देवी-देवताओं के इस संसार में अब इन देवता को क्या नाम दिया जाए, समझना ज़रा मुश्किल है... करीब पांच साल पहले मध्य प्रदेश के बैतूल से भी एक ख़बर आई थी। जिसमें कुंजीलाल नाम के शख्स ने खुद की मौत का वक्त मुकर्र किया था, लेकिन तय वक्त पर जब उसकी मौत नहीं आई, तो उसनेये ख़बर फैला दी थी, कि मेरी बीवी ने मेरे लिए व्रत रखा था, जिससे खुश होकर भगवान ने मुझे जीनवनदान दे दिया। और इस चक्कर में मीडिया की काफ़ी फ़ज़ीहत हुई थी। खुदा से दुआ है, कि लोगों से चाहें धन-दौलत छीन ले, शक्ल-सूरत ले ले, लेकिन उन्हें अक्ल ज़रूर दे दे। कम से कम इसी से देश का कुछ तो भला होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-5463735108212801769?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/5463735108212801769/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=5463735108212801769' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5463735108212801769'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5463735108212801769'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html' title='चीन से आये भगवान...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SopOs7fpPyI/AAAAAAAAAYM/QQBp2PbZr1o/s72-c/2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-259723512887561036</id><published>2009-08-14T17:00:00.005+09:00</published><updated>2009-08-14T17:10:09.804+09:00</updated><title type='text'>एक दर्दे मोहब्बत है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SoUa3c2f3aI/AAAAAAAAAXk/d52tm_uQlqQ/s1600-h/Love+1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SoUa3c2f3aI/AAAAAAAAAXk/d52tm_uQlqQ/s200/Love+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5369727670649085346" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हर अहद में हर चीज़ बदलती रही लेकिन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दर्द-ए-मोहब्बत है जो पहले की तरह है। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यार का कोई इतिहास तो नहीं है, लेकिन इसका दर्द हमेशा एक जैसा ही है। अगर माना जाए, तो प्यार की शुरुआत दुनिया में आदम और हव्वा के ज़माने से हुई थी। लेकिन प्यार की मिसाल में किसी का नाम आता है, तो विदेश में रोमियो और जूलियट, तो हिंदुस्तान में लैला-मजनू और शीरी-फ़रहाद को प्यार की बेमिसाल मूरत माना जाता है। अपने प्यार के लिए इन्होंने दुनिया की तमाम बंदिशों को हंसते-हंसते पार कर लिया। अपने महबूब के लिए ज़माने के तानों से लेकर गोलियां तक खाईं, लेकिन प्यार का एहसास और दर्द कभी कम नहीं हुआ। तमाम मौसम बदले, रुत बदलीं, वक्त बदला, लोग बदले, लेकिन वो मीठा सा प्यार कभी नहीं बदला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कोई आपसे प्यार का एहसास करता है, तो दिल में एक अजीब से हलचल होती है। कभी-कभी सपनों में किसी की छुअन महसूस सी होती है। कभी-कभी लगता है कि दुनिया में इसके सिवा कुछ भी नहीं है, दुनिया में सबसे हसीन अगर कुछ है, तो सिर्फ़ आपका महबूब और आपका प्यार है। फिर ज़माने की परवाह किसे होती है। आपका प्यार आपसे जितना दूर जाता है, उससे अपनेपन का एहसास और भी बढ़ जाता है। बदलते मौसम के साथ पल-पल प्यार के रंग भी बदलते हैं.. दुनिया और सपनीली हो जाती है... मन में कुछ-कुछ होता है, कई बार लगता है कि ये ज़मीन और आसमान एक क्यों नहीं हो जाते, कई बार दिल चाहता है कि सारा जहान झुककर आपके कदमों में आ गिरे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SoUbrZJGd8I/AAAAAAAAAX8/6_Jx1L7VTRw/s1600-h/Love+2.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SoUbrZJGd8I/AAAAAAAAAX8/6_Jx1L7VTRw/s320/Love+2.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5369728563006568386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बसंत के हसीन मौसम में प्यार को पंख लग जाते हैं। अपने महबूब के साथ सपनों की दुनिया बसाई जाती है... लेकिन वक्त बदला तो प्यार का अंदाज भी बदल गया। बाग-बगीचों और प्रेम पत्रों से निकलकर प्यार रेसत्रां और पार्क में पहुंच गया। लव-लेटर की जगह ई-मेल और एसएमएस ने ले ली... मोबाइल पर बतियाने का जो दौर शुरु होता है, वो घंटो तक चलता है....लंबी बातचीत के बाद भी लगता है, कि अभी तो बात ही क्या हुई है। ऐसे में मोबाइल कंपनियां भी धड़ल्ले से फायदा उठा रही हैं। प्यार के इस एहसास को हर कोई कैश कराने में लगा है। जेब हल्की हो रही है... गर्लफ्रेंड को रिझाने के लिए बाज़ार भी नये-नये नुस्खे ला रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यार का एहसास कराने के लिए वेलेंटाइन डे नाम का एक त्योहार ही चल निकला है। प्यार मॉर्डन हो गया है, लेकिन प्यार करने वाले अब भी ज़माने से नहीं डरते, प्यार पर पहरा लगाने वाले हर दौर में थे और आज भी हैं। आदिम युग में प्यार करने वालों को पत्थर मार-मार कर कुचल दिया जाता था, सलीम और अनारकली को भला कौन भूल सकता है। एक कनीज को अपना प्यार अमर करने के लिए दीवार में चुन जाना कबूल था।... वक्त बदला, सदियां बदली, लेकिन न तो प्यार के दुश्मन बदले, न प्यार का अंदाज़ बदला और न ही प्यार के एहसास में कोई कमी आई। लेकिन अब प्यार पर पहरा लगाने वाले ज़ालिम ही नहीं जल्लाद भी हो गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहें पश्चिमी उत्तर प्रदेश हो, या हरियाणा, प्यार की ख़ता सिर्फ़ मौत होती है। वहशियाना मौत, ऐसी मौत जिसमें मां-बाप और भाई-बहन ही अपने जिगर के टुकड़ों का क़त्ले-आम कर देते हैं। बात-बात में पश्चिम की नकल कर मॉडर्न होने का दम भरने वाले हम लोग इस मामले में मॉर्डन बनने की कोशिश कतई नहीं करते। मां-बाप अपने बच्चों को तमाम तरह की छूट खुलेआम देते हैं, समाज के ठेकेदार फ्लेक्सीबिलिटी की बात करते हैं, लेकिन जब कोई ज़माने के सामने अपने प्यार का इज़हार करता है, तो यही ज़माना दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर मज़हब और जात-बिरादरी का रोना रोया जाता है। हिंदू और मुसलमान पर बहस होती है, मांगलिक और गैर मांगलिक पर बहस होती है। हरियाणा की खाप पंचायत के फैसलों को कौन भूला होगा, प्यार कर अपनी नई दुनिया बसाने वाले एक युवक को सिर्फ़ इसलिये मार डाला गया, कि उसने एक ही गोत्र में शादी की थी, लेकिन हुआ क्या? खूब हो-हल्ला मचा, लेकिन वोट के ठेकेदारों के मुंह से उफ़्फ़ तक नहीं निकली... लेकिन सलाम है...प्यार के परिंदों को जिन्होंने हर अहद में अपने प्यार को अमर रखा, और ज़माने की हर दीवार को गिरा दिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-259723512887561036?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/259723512887561036/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=259723512887561036' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/259723512887561036'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/259723512887561036'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/08/blog-post_14.html' title='एक दर्दे मोहब्बत है...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SoUa3c2f3aI/AAAAAAAAAXk/d52tm_uQlqQ/s72-c/Love+1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-6848990186708967843</id><published>2009-08-10T13:53:00.003+09:00</published><updated>2009-10-24T20:48:11.929+09:00</updated><title type='text'>मैं मेरे बाप का कौन...?</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;strong&gt;पागलखाने &lt;/strong&gt;के डॉक्टर ने नये आने वाले मरीज़ का चेकअप किया, मरीज़ डॉक्टर को काफ़ी सेहतमंद लगा तो डॉक्टर ने पूछा तुम तो काफ़ी तंदरुस्त लग रहे हो। पागलखाने कैसे आ गये? मरीज़ ने ठंडी सांस लेते हुए कहा, डॉक्टर साहब मैं पागल नहीं हूं...मैं बिल्कुल ठीक हूं। दरअसल कुछ अरसा पहले मैंने एक बेवा से शादी की थी। उस औरत की एक जवान बेटी थी, वो अपनी मां यानि मेरी बीवी के साथ मेरे ही घर में रहती थी। इत्तेफ़ाक से मेरे बाप को वो लड़की पसंद आ गई। उस लड़की से मेरे बाप ने शादी कर ली। इस तरह मेरी बीवी मेरे बाप की सास बन गई। कुछ महीने बाद मेरे बाप के घर एक लड़की पैदा हुई, वो रिश्ते में मेरी बहन हुई क्योंकि मैं उसके बाप का बेटा था। दूसरी तरफ़ वो मेरी नवासी भी थी, क्योंकि मैं उसकी नानी का शौहर था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह मैं अपनी बहन का नाना बन गया। कुछ महीनों बाद मेरे घर मेरी बीवी को लड़का पैदा हुआ। एक तरफ़ मेरी सौतेली मां मेरे बेटे की बहन लगती थी, दूसरी तरफ़ मेरी सौतेली मां मेरे बेटे की दादी भी लगती थी। इसलिए मेरा बेटा अपनी दादी का भाई बन गया। डॉक्टर साहब ज़रा सोचो मेरा बाप मेरा दामाद है और मैं अपने बाप का ससुर। मेरी सौतेली मां मेरे बेटे की बहन है। इस तरह मेरा बेटा मेरा मामू बन गया और मैं अपने बेटे का भांजा। डॉक्टर ने दोनों हाथों से अपना सर पकड़ा और चिल्लाकर कहा मेहरबानी करके मुझे बख्श दे, वरना मैं पागल हो जाऊंगा... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;You can also read on&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;http://www.moorkhistan.com&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-6848990186708967843?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/6848990186708967843/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=6848990186708967843' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6848990186708967843'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6848990186708967843'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/08/blog-post_10.html' title='मैं मेरे बाप का कौन...?'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-5723257052445047726</id><published>2009-08-05T13:32:00.006+09:00</published><updated>2009-08-05T13:44:56.865+09:00</updated><title type='text'>एक चिट्ठी का इंतज़ार...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SnkM622-3ZI/AAAAAAAAAXE/6B6R4NCkksQ/s1600-h/Latter+2"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 180px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SnkM622-3ZI/AAAAAAAAAXE/6B6R4NCkksQ/s200/Latter+2" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5366334636286729618" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दरवाज़े पर टकटकी लगाए आंखे एक अदद चिट्ठी का इंतज़ार करती हैं... मन करता है कि साइकिल की घंटी सुनाई पड़े और दौड़कर दरवाज़े पर चले आयें, शायद कोई चिट्ठी आई हो, शायद कोई संदेशा आया हो, शायद कोई अपना हो, जिसने हाले-दिल लिखकर भेजा हो... लेकिन न तो साईकिल की घंटी सुनाई पड़ती है, और न ही डाकिया बाबू नज़र आते हैं... अब कोई आता है, तो मोबाइल पर फोन की घंटी, एसएमएस और ई-मेल... टेक्नोलॉजी की दुनिया ने उन सुनहरे दिनों को कहीं पीछे छोड़ दिया है, जब हफ्तों इंतज़ार के बाद एक ख़त आता था... दूर देश से आई इस चिट्टी में इतना कुछ होता था, कि पढ़ते-पढ़ते कभी आंख नम हो जाती थी, तो कभी सारे जहान की खुशियां एक चिट्ठी में सिमट आती थीं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिट्ठी अपने साथ खुशियां लाती थी, किसी को मुन्ने का हाल सुनाती थी, तो किसी को नौकरी का संदेशा देती थी, बूढ़े मां-बाप को बेटे के मनीऑर्डर का इंतेज़ार होता था, जिसमें पापा के आशीष के साथ चंद रुपये भी होते थे... चिट्ठी में दादा-दादी का हाल मिलता था, बॉर्डर पर बैठे लाडले की चिट्टी मिलने के बाद मां की आंखो से ज़ार-ज़ार आंसू बहते थे... किसी की शादी का दावतनामा होता था, तो कोई अपने प्यार को हाले-दिल लिखता था... नये साल पर ढेर सारे ग्रीटिंग कार्ड पहले से ही भेज दिये जाते थे... गर्मियों की छुट्टियों से पहले ही फटाफट नानी को संदेशा भेजते थे, इस बार गर्मियों की छुट्टियों में आ रहे हैं... उस छोटी सी चिट्ठी में नानी के लिए ढेर सारी फरमाइशें होती थीं... &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SnkN8fVS_vI/AAAAAAAAAXc/PCp2jOn3z5s/s1600-h/Latter+inlan.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 128px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SnkN8fVS_vI/AAAAAAAAAXc/PCp2jOn3z5s/s200/Latter+inlan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5366335763842793202" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गली में गुज़रते डाकिया बाबू के हाथ में अंतर्देशीय और पोस्टकार्ड का बंडल देखकर मन हिलोरें मारने लगता था... पंद्रह पैसे का एक पोस्टकार्ड पंद्रह दिन का हाल सुना जाता था... कई बार तो बैरंग ही लेटर आते थे, जब डाकिया बाबू को उसके लिए दो से पांच रुपये तक भी देना पड़ते थे, लेकिन चिट्ठी के उतावलेपन में पैसे खर्च करने का भी कोई गम नहीं। कई बार तो लोग शरारत में भी बैरंग चिट्ठी भेज दिया करते थे... लेकिन एक अदद कागज़ के पुरज़े के लिए ये शरारत भी बड़ी मस्त लगती थी... चिट्ठी का इंतज़ार इतना होता था, कि कई बार तो लिफ़ाफे को देखकर ही उसका मज़मून समझ में आ जाता था... उस वक्त दूरियां बहुत थीं, लेकिन पंद्रह-बीस दिन में आने वाली उस चिट्ठी को पढ़कर ऐसा लगता था, जैसे सबकुछ इस छोटे से कागज के पुरजे में सिमट आया हो... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर में या आस-पास कहीं कोई लेटर आता था, तो सबसे पहले हम उस पर से डाक टिकट छुटाने में जुट जाते थे, अजब शौक था डाक टिकट इकट्ठे करने का... कई बार तो शरारतन हम उन्हीं टिकट को लिफ़ाफे पर लगाकर फिर से पोस्ट कर देते थे.... मौहल्ले में हमारे कई लोग ऐसे भी थे, जिन्हें ख़त लिखना या पढ़ना नहीं आता था, ऐसे लोगों के लिए समाजसेवा करने में हम हमेशा आगे रहते थे, किसी की चिट्ठी लिखने और पढ़ने में जो लुत्फ़ आता था, उसका अपना अलग ही मज़ा होता था... रात को घंटो बैठकर चिट्ठियां लिखने की कोशिश करते थे, कई बार पसंद नहीं आती थी, तो फाड़कर फिर से लिखते थे... रोज़ सुबह उठते ही एक अदद ख़त का इंतज़ार होता था... &lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SnkNplqCgxI/AAAAAAAAAXU/AbiZ43lHIMI/s1600-h/Latter+box.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 131px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SnkNplqCgxI/AAAAAAAAAXU/AbiZ43lHIMI/s200/Latter+box.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5366335439122891538" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;उसी दौर में पंकज उदास की एक ग़ज़ल चिट्ठी आई है...आई है... वतन से चिट्ठी आई है.. ने खूब धूम मचा रखी थी, जितनी बार उसे सुनते थे, आंख नम हो जाती थीं, लगता था हमारी भी कोई चिट्ठी आयेगी, जिसमें ऐसा ही दर्द भरा हाल होगा.. मुनिया की शरारत होगी, पापा का ढेर सारा प्यार होगा... दादा-दादी और नाना-नानी की दुआएं होंगी... लेकिन जब चिट्ठी नहीं आती थी, तो बैचेनी बढ़ जाती थी, साईकिल की घंटी की आवाज़ सुनाई दी, तो सब काम छोड़कर गली में दौड़ लगाते थे, शायद कोई चिट्ठी आई है... डाकिया बाबू की पैंट पकड़कर बार-बार पूछते थे, अंकल हमारी चिट्टी कब आयेगी? लेकिन तब बड़ी मायूसी हाथ लगती थी, जब न कोई चिट्ठी और न कोई संदेश आता था... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अब हर तरफ़ सूनापन है... सरकारी कामकाज न हो, तो शायद डाकखाने तो अब तक बंद हो गये होते... मोबाइल क्रांति और नेट ने रिश्तों के तार बेशक जोड़े हों, लेकिन अब संवेदनाएं कहीं मर सी गई हैं... रिश्तों के खालीपन को बातों से भरने की कोशिश ज़रूर करते हैं... लेकिन हाले-दिल बयां करने का जो काम एक चिट्ठी कर सकती है, वो नेट और फोन के बस की बात नहीं... जाने कहां गये वो पिन कोड, अंतर्देशीय पत्र और पोस्टकार्ड... जाने कब लौटेगा डाकिया बाबू का वो सुनहरा दौर.. जब घर पर कोई चिट्ठी आयेगी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-5723257052445047726?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/5723257052445047726/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=5723257052445047726' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5723257052445047726'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5723257052445047726'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/08/blog-post_05.html' title='एक चिट्ठी का इंतज़ार...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SnkM622-3ZI/AAAAAAAAAXE/6B6R4NCkksQ/s72-c/Latter+2' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-7830510667537713454</id><published>2009-08-04T15:51:00.001+09:00</published><updated>2009-08-04T15:54:16.078+09:00</updated><title type='text'>जिंदगी क़तरा-क़तरा गुज़रती है...</title><content type='html'>&lt;strong&gt;महीने की पहली तारीख़ गुज़र गई&lt;/strong&gt;, लेकिन एकाउंट में पैसा अभी तक नहीं पहुंचा था। एक-एक दिन पहाड़ जैसा लग रहा था। जेब पूरी तरह खाली थी, पेट भरने से ज्यादा किस्तें अदा करने की फिक्र थी। खाना खाये बगैर भूखे रह लेंगे, लेकिन चैक बाउंस होने के बाद जो हालत होगी, उसके बारे में सोचकर ही रूह कांप जाती है। अब पहले जैसा तो ज़माना रहा नहीं, जो सारे प्लान रिटायरमेंट के बाद करना पड़े, जिंदगी बहुत फास्ट हो चुकी है। ज़माना बदल चुका है। आज के नौजवान रिटायर होने का इंतेज़ार नहीं करते। ज़िदगी में सब कुछ जी लेने की चाहत में दिन-रात हाड़ तोड़ मेहनत हो रही है। सुबह से शाम तक धूप में पसीना बहाने के बाद भी लगता है बहुत कुछ बाकी रह गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब छोटे थे, तो हमारे अंकल ने रिटायरमेंट के बाद मिले फंड से पहले बेटी की शादी की, उसके बाद बचे पैसे से अपने लिए एक छोटा सा मकान खरीदा। बाकी की सारी ज़िंदगी पेंशन पर गुज़ार दी। पहले के लोग मकान का सपना रिटायरमेंट के बाद ही देखते थे। लेकिन आज ज़माना रफ्तार का है। रिटायरमेंट का इंतेज़ार नहीं होता। आजकल के लड़के नौकरी के साथ ही छोकरी की तलाश भी शुरु कर देते हैं। इंतेज़ार तो बिल्कुल भी नहीं, अब शादी की ज़िम्मेदारी मां-बाप के कंधों से लेकर खुद ही निभाने लगे हैं। इधर नौकरी मिली, उधर सात फेरे लेने की तैयारी, शादी के बाद मकान का सपना, और इस सपने को देखने में बिल्कुल भी लेट-लतीफ़ी नहीं। क्योंकि अब सपने देखे नहीं जाते, बल्कि बनाये जाते हैं। अब मकान के लिए पैसा जमा करने की दिक्कत नहीं, &lt;strong&gt;पैसा बांटने वाले तो शहर के हर कोने पर खड़े हैं। रात-दिन कभी भी, किसी भी वक्त आपको फोन करके पैसा बांटने की फिराक में रहते हैं&lt;/strong&gt;। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कर्ज़ के पैसे से सपनों का मकान खड़ा होता है, तो अगला क़दम होता है गाड़ी खरीदने का। इधर बात मुंह से निकली उधर घर के गैराज में चमकती हुई गाड़ी, आपके बुज़ुर्गों को मुंह चिढ़ाती है, ये देखो, तुम जो काम ज़िंदगी भर नहीं कर पाये, वो तुम्हारे लड़के ने कितनी तेज़ी से कर डाला। गाड़ी के बाद घर की दूसरी चीज़ों को खरीदना तो और भी आसान है। ज़ीरो परसेंट के चक्कर में लोग ऐसे फंसते हैं, कि फिर तो ज़िंदगी किस्तों में गुज़रती है। बचपन में हमारे अब्बू महीने की पहली तारीख को दूध वाले, मकान मालिक और पड़ोस के लाला का हिसाब-किताब करते थे। लेकिन अब तो महीने की पहली तारीख को आधी से ज्यादा कमाई मकान की किस्त, गाड़ी की किस्त, लैपटॉप, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और दूसरी चीज़ों में ही चली जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर से अगर वक्त पर किस्त जमा नहीं हुई तो सूद के पैसे अलग। और अगर लोन की एक भी किस्त टूटी तो बाउंसरों के मुक्कों से निपटने को तैयार रहो। सोने पर सुहागा ये कि अगर आपके घर में छोटे से साहबज़ादे हैं तो उनके स्कूल की नर्सरी की फीस इतनी होती है, जितने में आप स्कूल से कॉलेज तक ऐशो-आराम करके निपट गये थे। ऊपर से अख़बार, केबल, टेलीफ़ोन, गैस, बिजली-पानी के बिल सो अलग। किस्तें जमा करते-करते ज़िंदगी कमान बन जाती है। जिस ऐश के लिए ये सब कुछ किया था, वो तो कोसों तक नज़र नहीं आता। किस्तों में जमा हुए इस ऐशो-आराम पर कई बार आपको रश्क तो बहुत होता होगा, लेकिन आपके बाद बच्चे आपको सिर्फ़ इसलिए याद करेंगे, कि हमारे पापा ने विरासत में किस्तों का महल छोड़ा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-7830510667537713454?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/7830510667537713454/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=7830510667537713454' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/7830510667537713454'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/7830510667537713454'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/08/blog-post_04.html' title='जिंदगी क़तरा-क़तरा गुज़रती है...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-4670346675559918833</id><published>2009-08-01T11:08:00.003+09:00</published><updated>2009-08-01T13:16:25.276+09:00</updated><title type='text'>तौबा बिन बुलाए मेहमान से...</title><content type='html'>&lt;strong&gt;मंदी, महंगाई और मेहमान... &lt;/strong&gt;तंगी के इस दौर में जेब खाली है, आम तो आम गुठलियों के दाम भी नहीं मिल रहे हैं। बाज़ार में फलों का राजा पूरी धौंस के साथ बिक रहा है। 10 से 15 रुपये किलो वाला आम 50 से 60 रुपये किलो बिक रहा है। सब्जियों का राजा आलू तो और भी कमाल कर रहा है। दाम आसमान पर हैं, आलू दम ने लोगों का दम निकाल रखा है। तो प्याज ने आंसू निकाल रखे हैं। दाल ने कमर तोड़ दी, सो अलग। बैंगन के भाव ज़रा मार्केट में कम होते हैं, वर्ना शायद बैंगन भी आसमान पर होता। अब सब्जी महंगी, दाल महंगी और खाने के बाद मुंह मीठा करने वाले आम का जायका भी कड़वा हो गया है। घर में थाली का साइज सिकुड़ रहा था, तो किचन में भी सन्नाटा पसरा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्रिज भी खाली हो चुका था। अब तो उसमें पानी भी नहीं भर सकते, क्योंकि अनमोल पानी का भी मोल हो चुका था। क्या खाएं और क्या न खाएं, यही सोचकर दिमाग भन्ना गया था। हम तो मियां भाई हैं, सो मुर्गे की लात भी खा सकते हैं, लेकिन सावन में अपने दूसरे भाई लोग क्या करें। मर्गे की खाल उधेड़ना है, तो सावन निकलने का इंतज़ार तो करना ही होगा। बाज़ार में मंदी ने जान निकाल ली है। नौकरियों पर तलवार लटक रही है, सैलरी का पता नहीं है। ऊपर से कंगाली में उस वक्त आंटा गीला हो गया, जब घर पर बिन बुलाए मेहमान धमक पड़े। पहले दिन तो मेहमान का बड़ी गर्मजोशी से इस्तकबाल किया, एक-दो दिन उनकी खूब खातिरदारी भी की, लेकिन मेहमान ने तो घर में डेरा डाल लिया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उंगली पकड़कर जनाब पहुंचे तक पहुंच गये। मेहमान भगवान की जगह आफ़त बन गये। दस दिन तक भी जब उन्होंने जाने का नाम नहीं लिया, तो हम ही उनको भगाने की तरकीबें ढूंढने लगे। घर से बाहर दिल्ली शहर में हम दोनों भाई परेशान कि आखिर इस मेहमान से कैसे पिंड छुड़ाया जाए। बातों-बातों में मेहमान को कई बार समझाया, कि भईया तुम कब दफ़ा होगे, कब छोड़ेगे हमारी जान? लेकिन मेहमान भी पूरे ढीढ थे। जाने का नाम ही नहीं ले रहे थे। एक दिन हम दोनों भाईयों ने प्लान बनाकर उनसे झूठ बोला कि भईया हमें घर जाना है, तो अब आप भी अपना रास्ता नापो। लेकिन जनाब आसानी से पीछा छोड़ने के मूड में नहीं थे। बोले कोई बात नहीं, आप चले जाइये, मैं यहां अकेला ही रुक जाऊंगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप आराम से अपने घर जाइये, अब हमारा दांव हम ही पर उल्टा पड़ गया। हम लोगों को समझ ही नहीं आया कि अब क्या करें। ये जनाब तो चिकने घड़े बन चुके हैं। पूरे दिन घर में उन्हें सोने और खाने के अलावा कोई काम भी नहीं था। फिर हमने एक और प्लान बनाया, हम दोनों भाईयों ने उन्हें अपने दफ्तर से फोन कर झूठ बोला कि भईया हम लोग शूट पर जा रहे हैं, तो जब आप जाएं, तो घर में ताला लगाकर चाभी पड़ोसी को दे जाएं। उन्होंने कहा ठीक है। इसके बाद हमने राहत की सांस ली, कि चलो पिंड छूटा। दोपहर को जब दफ्तर से काम निपटाकर लौटने लगे, तो सोचा कि चलो एक बार फोन कर पता करें, कि भाई साहब दफ़ा हुए या नहीं, लेकिन ये क्या, जनाब ने फोन उठाया, तो बोले अभी तो नहीं गया हूं, शायद शाम तक जाऊंगा। हमारी तो समझ नहीं आ रहा था, कि अब करें, तो क्या करें। अब घर भी कैसे जाएं, उनसे झूठ तो पहले ही बोल चुके थे, कि हम शूट पर निकल गये हैं। घर जाते हैं तो फंस जाएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजबूरन घर जाने के बजाए हमने दिल्ली की सड़कें नापने का फैसला किया, ताकि वो छह बजे तक हमारा घर छोड़ें, और हम अपने घर पहुंचे। छह बजे तक बड़ी मुश्किल से इंतज़ार किया, लेकिन वो तो अब भी पत्थर की तरह जमे थे। हमने उनसे लाख गुजारिश की, कि भईया रात हो जाएगी, आपको तो फिर जाने में दिक्कत होगी, इसलिए दिन छिपे से पहले ही निकल जाओ, लेकिन जनाब टस से मस होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। इधर दिल्ली नाप-नापकर हमारी टांगे टूट रहीं थीं, उधर वो हमारे घर में रखे हुए खाने के सामान पर हाथ साफ़ कर रहे थे। खैर जैसे-तैसे करके रात के ग्यारह बजे उनका फोन आया कि शायद मैं अगले आधे घंटे में निकल जाऊं। हमने थोड़ी राहत की सांस ली, आधा घंटा पहाड़ की तरह लग रहा था। खैर क़तरा-क़तरा करके घड़ी ने साढ़े ग्यारह बजाए। एक और फोन आया, जनाब मैं निकल चुका हूं, मेहमाननवाज़ी के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। हम-दोनों भाईयों को समझ नहीं आ रहा था कि हंसे या रोयें, क्योंकि दिल्ली नापते-नापते पैर दर्द कर चुके थे। भूख से बुरा हाल हो चुका था, ऑटो कर घर पहुंचे, तो फिर दरवाजा खोलकर सीधे बिस्तर पर गिर गये। और फिर बेफिक्री की जो नींद आई, वो अगले दिन सुबह ही टूटी। लेकिन तौबा कर ली बिन-बुलाए मेहमानों से।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-4670346675559918833?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/4670346675559918833/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=4670346675559918833' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/4670346675559918833'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/4670346675559918833'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='तौबा बिन बुलाए मेहमान से...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-1541720009537728351</id><published>2009-07-23T15:16:00.002+09:00</published><updated>2009-07-23T15:22:21.575+09:00</updated><title type='text'>नुक़्ते पर नुक़्ताचीनी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;नुक़्ता नहीं लगाना है...&lt;/strong&gt;किसी भी लफ़्ज़ के नीचे नुक़्ता नहीं लगाना है...इसके लिए सभी को मेल भेज दिया गया है। &lt;br /&gt;आप सभी लोगों को बता भी दीजिए। स्क्रीन पर नुक़्ता नहीं दिखना चाहिए। &lt;br /&gt;क्यों... मैंने एतराज़ किया। नुक़्ता क्यों नहीं लगाना है। अरे अगर ज़मीन को जमीन और जहाज़ को जहाज लिखेंगे तो कैसा लगेगा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेकिन &lt;/strong&gt;बॉस के सामने सारे तर्क बेकार थे। नुक़्ता सिर्फ़ इसीलिये नहीं लगाना था, क्योंकि कुछ लोगों को नुक़्ते का तमीज़ नहीं था। नुक़्ते में उनके गड़बड़ी थी, और नुक़्तानज़र सभी लोगों पर थी। मतलब जिन्हें नुक़्ते की तमीज़ है, वो भी नुक़्ता न लगाएं। मेरे साथ-साथ नुक़्ता भी अपने हाल पर बेहाल था। पहले तो मुझे भी नुक़्ता न लगाने का तर्क खराब लगा, लेकिन जब नुक़्ते की बदहाली देखी, तो फिर सब्र कर लिया। खुद भी और नुक़्ते को भी समझा दिया। फिक्र न कर गालिब, ज़माने में हमारे तलबगार और भी हैं। नुक़्ते के साथ जो नुक़्ताचीनी की जा रही थी, ज़रा उस पर आप भी नुक़्तानज़र कीजिए। ख़ुदा.. खुदा हो गया, ज़मीन...जमीन हो गई, ज़रा...जरा हो गया। &lt;br /&gt;कुछ लोग इतने समझदार होते हैं, कि ज़रूरत से ज़्यादा नुक़्ता लगा देते हैं। अब जाल को नुक़्ता लगाकर ज़ाल, खाल को नुक़्ता लगाकर ख़ाल और जुदा को नुक़्ता लगाकर ज़ुदा कर देते हैं। और तो और नुक़्ते की गड़बड़ी के चक्कर में जंग को ज़ग लग जाती है। दिलचस्प तो ये है जलील बेचारा नुक़्ते के चक्कर में ज़लील हो जाता है। नुक़्ते के चक्कर में ज़ीना, जीना हो जाता है। हालांकि नुक़्तों वाले अल्फ़ाज़ की फेहरिस्त तो बहुत लंबी है। उर्दू में भी नु्क़्ते की गड़बड़ियां कम मशहूर नहीं हैं। वहां तो ख़ुदा का नुक़्ता ऊपर लगाकर उसे जुदा बना दिया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तो वो चंद नज़ीर हैं.. जो नुक़्ते के चक्कर में आंसू बहा रही हैं। कसूर न मेरा है और न नुक़्ते का, लेकिन सज़ा भुगतना पड़ रही है अल्फ़ाज़ों को। जो बिना नुक़्ते के ऐसे नज़र आते हैं, जैसे कोई उजाड़ वन, जैसे पतझड़ के बाद सूखा हुआ पेड़, जैसे कोई बंजर खेत। लेकिन न्यूज़ चैनल में काम करते वक्त मुझे नुक़्ता न लगाने पर बड़ी कोफ़्त होती है। पाबंदियों के बावजूद मेरी उंगलियां नुक़्ते पर पहुंच ही जाती हैं। दिल मानता ही नहीं, जिसने बचपन से उर्दू पड़ी हो, जिसके घर में उर्दू का माहौल रहा हो, जिसके घर में खाने-पीने और पहनने तक में उर्दू का इस्तेमाल होता हो, वो खुद को बेबस महसूस न करे, तो क्या करे। लेकिन मजबूर ये हालात इधर भी हैं और उधर भी हैं। अफ़सोस ये है कि उर्दू पहले भी बेबस थी, लेकिन नुक़्ते के चक्कर में दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत ज़ुबान ख़ुद को अपाहिज महसूस करने लगी है। शायद कोई तो ऐसा आयेगा जो उर्दू का दर्द समझेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-1541720009537728351?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/1541720009537728351/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=1541720009537728351' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/1541720009537728351'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/1541720009537728351'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/07/blog-post_23.html' title='नुक़्ते पर नुक़्ताचीनी'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-5525382043707942047</id><published>2009-07-20T16:00:00.004+09:00</published><updated>2009-07-20T16:20:16.216+09:00</updated><title type='text'>बर्बाद करेगा ये सच!</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SmQWUGWi8RI/AAAAAAAAAWk/4a6h8moQklc/s1600-h/lohan11.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 92px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SmQWUGWi8RI/AAAAAAAAAWk/4a6h8moQklc/s400/lohan11.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5360433991036104978" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या आपने कभी अपनी बेटी की उम्र की किसी लड़की के साथ सेक्स किया है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जवाब मिलता हैं.. हां। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या आप कभी अपने पति के अलावा किसी और के साथ गैर मर्द के साथ नाजायज़ रिश्ता बनाने की कोशिश करेंगीं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जवाब मिलता है.. नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये जवाब गलत था। ये एक बानगी भर है उस प्रोग्राम की, जो आजकल स्टार प्लस पर आता है। अमेरिकी शो &lt;strong&gt;'मोमेंट ऑफ़ ट्रुथ' &lt;/strong&gt;की नकल पर शुरु हुए इस प्रोग्राम के ज़रिए हिंदुस्तान में सच की गंगा बहाने की कोशिश की जा रही है। भारतेंदु हरिश्चन्द्र के इस मुल्क में जहां हज़ारों गुरु पंडितों और मुल्ला मौललवियों ने इस मुल्क की बुनियाद रखी, वहां आज लोगों को सच सिखाने की ज़रूरत पड़ रही है। जहां लाखों पीर-फकीर गंगा-जमुनी तहजीब की सीख देकर चले गये। वहां टीवी पर सच सिखाया जा रहा है। &lt;strong&gt;सच भी कैसा। बेडरूम का सच। नाजायज़ रिश्तों का सच। साजिशों का सच। मर्डर और दोस्ती में दरारों का सच। सेक्स और बेवफ़ाई के अजीबो-गरीब रिश्तों का सच। प्यार-मौहब्बत में नाकाम रहने का सच। फलर्ट करने का सच। सच भी ऐसा जिसमें सिर्फ़ मसाला हो, तड़का हो। वो भी किसलिए सिर्फ़ एक करोड़ रुपयों के लिए। &lt;/strong&gt;और एक करोड़ भी तब मिलेंगे जब आप सभी 21 सवालों का सही जवाब देंगे। मुझे आचार्य धर्मेद्र की एक बात बहुत अच्छी लगी, कि आप पैसा देना बंद कर दो, लोग टीवी पर सच बोलना बंद कर देंगे। लोग टीवी पर पैसे के लिए सच बोल रहे हैं। प्रोग्राम के पीछे तर्क दिया जा रहा है, कि इसके आने के बाद लोग सच बोलने लगे हैं। मेरा उनसे यही सवाल है कि क्या इससे पहले समाज में लोग सच नहीं बोलते थे? क्या अब तक मुल्क और समाज की बुनियाद झूठ के ढर्रे पर चल रही थी? एक सच ये है कि मैं कभी झूठ नहीं बोलता। आप भले ही यकीन न करें, लेकिन मुझे झूठ बोलना बिल्कुल पसंद नहीं है। आप सोच रहे होंगे कि मैं शायद स्टार प्लस पर आने वाले प्रोग्राम सच का सामना के बाद कुछ बदल गया हूं। आप सोच रहे होंगे कि इस प्रोग्राम के आने के बाद हिंदुस्तान में राजा हरिशचन्द्र कहां से पैदा हो गये। लेकिन जनाब ऐसा नहीं हैं। यहां सदियों से लोग सच का सामना करते हैं। अब अगर कोई राखी सावंत से सच बोलता है कि वो पहले से शादी-शुदा है, तो क्या ये सच का सामना का असर है। दरअसल ये भी एक ड्रामा था। जिसके पीछे भी था पैसे का बड़ा खेल। मतलब फुल ड्रामा। और फिर यहां जो भी शख्स सच बोलता है, उसकी पूरी फैमिली उसके सामने बैठती है। झूठ और सच के साथ ही उनके एक्सप्रेशन भी बदलते जाते हैं। ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि कोई पति या पत्नी अपनी बीस साल की शादी-शुदा ज़िंदगी में डर की वजह से अपने राज़ एक-दूसरे से शेयर ही न करे। और जब बात एक करोड़ मिलने की आती है, तो उसके राज़ परत दर परत सारी दुनिया के सामने खुल जाते हैं। मुझे याद है कि कई साल पहले राजेन्द्र यादव जी ने अपनी पत्रिका हंस में ऐसी ही एक सीरीज़ चलाई थी। जिसमें अपनी ज़िंदगी का कच्चा चिट्ठा लिखना था। मैगज़ीन बाज़ार में आई, लेकिन लेख छपते ही हल्ला मच गया। कुछ लोगों ने बड़े उतावले पन के साथ अपनी ज़िंदगी को तार-तार करने की कोशिश की थी। लेकिन नतीजा क्या निकला। हंगामा मचा, तो हंस को सीरीज़ ही बंद करना पड़ी। अफ़सोस ये है कि इस प्रोग्राम का भी वहीं हश्र न हो। सच का सामना करने के चक्कर में कहीं रिश्ते दरक न जाएं, और भरोसे पर टिका जिंदगी का घंरौंदा एक हल्के से झोके में ही ज़र्रा-ज़र्रा करके बिखर न जाए। सच के ठेकेदारों समाज पर कुछ तो रहम करो। क्योंकि कुछ झूठ ख़ूबसूरती के लिबास में ही अच्छे लगते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-5525382043707942047?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/5525382043707942047/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=5525382043707942047' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5525382043707942047'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/5525382043707942047'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/07/blog-post_20.html' title='बर्बाद करेगा ये सच!'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SmQWUGWi8RI/AAAAAAAAAWk/4a6h8moQklc/s72-c/lohan11.gif' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-2491875542964879727</id><published>2009-07-19T17:21:00.005+09:00</published><updated>2009-07-19T17:52:38.844+09:00</updated><title type='text'>घर की मिट्टी बुला रही है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SmLev2GUUjI/AAAAAAAAAWc/bL5vPtq6oD0/s1600-h/Par.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SmLev2GUUjI/AAAAAAAAAWc/bL5vPtq6oD0/s320/Par.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5360091420081541682" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परदेस में रहके न अपने देश को भूलो तुम.&lt;br /&gt;दूरियां बेशक रहें, पर दिल के तारों को जोड़ो तुम..&lt;br /&gt;एक चिट्ठी तो कम से कम अपनी हम को लिख दो तुम&lt;br /&gt;घर की मिट्टी बुला रही है, अब तो वापस आ जाओ&lt;br /&gt;----------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारा मनपसंद खाना, खलिहानों में गाना, गाना.&lt;br /&gt;मुनिया के संग शरारत, फिर उसको बहलाना..&lt;br /&gt;सूना-सूना है सारा आंगन, टूटा सबका मन.&lt;br /&gt;रो-रो के कटती हैं रातें, रो-रोके कटते हैं दिन,&lt;br /&gt;गांव के बच्चे बुला रहे हैं, अब तो वापस आ जाओ&lt;br /&gt;----------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दादी की शकरकंद की खीर, दादा की आंखों में नीर.&lt;br /&gt;पापा की थकी-थकी सी चाल, मम्मी की आंखों में आंसू&lt;br /&gt;आमों का मौसम हो, या गन्ने के रस की मिठास.&lt;br /&gt;सबकुछ फीका-फीका है, कोयल भी है अबकी उदास,&lt;br /&gt;आम की बगिया बुला रही है, अब तो वापस आ जाओ..&lt;br /&gt;----------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या शहर में तुमको याद नहीं आता गांव.&lt;br /&gt;खेतों की पगडंडियां और मौहल्ले की सब लड़कियां..&lt;br /&gt;छत की कच्ची मुंढेरों पर कबूतर उड़ाना&lt;br /&gt;कंचों में बेमानी, लूडो में शैतानी&lt;br /&gt;गणित में सिफ़र और स्कूल का डर&lt;br /&gt;गांव के पोखर में डुबकियां लगाना&lt;br /&gt;सब तुमको बुला रहे हैं अब तो वापस आ जाओ..&lt;br /&gt;----------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों भूल गये तुम इतनी जल्दी सब कुछ&lt;br /&gt;गांव की टोली संग होली, ईद की सिंवइयां..&lt;br /&gt;दीवाली के पटाखे और रंगोली..&lt;br /&gt;रेशम की डोरी में लिपटा छोटी का प्यार&lt;br /&gt;अपने बुला रहे हैं तुमको, अब तो वापस आ जाओ....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-2491875542964879727?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/2491875542964879727/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=2491875542964879727' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2491875542964879727'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2491875542964879727'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/07/blog-post_19.html' title='घर की मिट्टी बुला रही है...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SmLev2GUUjI/AAAAAAAAAWc/bL5vPtq6oD0/s72-c/Par.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-3269035220394516554</id><published>2009-07-16T13:42:00.009+09:00</published><updated>2009-07-16T18:15:59.297+09:00</updated><title type='text'>राखी के स्वयंवर में नामर्द!</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sl6wpJJJwNI/AAAAAAAAAVM/thSbOmeFcBc/s1600-h/Rakhi+2.gif"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 310px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sl6wpJJJwNI/AAAAAAAAAVM/thSbOmeFcBc/s320/Rakhi+2.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5358914827492901074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;टीवी पर बीएसएनएल का एक एड आता था, जिसमें प्रीति जिंटा कहती थीं, कि अगर इनके पास बीएसएनएल का कनेक्शन नहीं है, तो वो इनके बेटे से शादी नहीं करेंगी। आजकल टीवी पर एक एड और आता है अमूल माचो का.. जिसमें एक लड़के को देखने लड़की और उसके घरवाले आते है और बेचारा लजाता, शर्माता हुआ उनके लिए चाय लाता है। उसके बाद दूसरी तस्वीर में दिखाया जाता है कि कैसे लड़की उसे बाइक पर बैठाकर घुमाने ले जाती है, लड़की स्पीड ब्रेक लगाती है। झटका खाकर बेचारा लड़की से टकराता है। तो एक और तस्वीर में बस में खड़े होकर सफ़र कर रहे एक लड़के को एक लड़की छेड़कर निकल जाती है और बेचारा शर्म से लाल हो जाता है। आखिर क्या ज़माना आ गया है। इतने तक तो ठीक था। लेकिन अब तो सबकुछ उल्टा हो रहा है। राखी सांवत के स्वंयवर के बारे में तो आप सभी जानते होंगे। इस स्वंयवर में नाटक है, रोमांस है, और एक्शन भी। लेकिन राखी के चाहने वालों को न तो इसमें धनुष तोड़ना है और न ही मछली की आंख पर निशाना लगाना है। पूरे फिल्मी ड्रामे से भरी इस कहानी में राखी को किसी हूर से कम नहीं पेश किया है। और लड़के, वो तो बेचारे ऐसे लगते हैं, जैसे किसी रानी के गुलाम। राखी की हर अदा पर झुककर सलाम करने वाले, राखी के झूठ को सच साबित करने वाले, राखी जी बल खाकर चलती हैं, तो बेचारे मुंडे उनके कदमों में बिछे चले जाते हैं। और अगर राखी साहिबा उनसे खुश हो गईं, तो खाने को मिलेंगे लड्डू। शादी के लड्डू के बारे में तो सभी जानते हैं, जो खाए वो पछताए और जो न खाए वो पछताए। लेकिन राखी के साथ सपने बुनकर सभी 16 राजकुमार लड्डू खाना चाहते हैं। और राखी उनके सामने ऐसे पेश आती हैं, जैसे मल्लिका-ए-हिंदुस्तान। हद तो तब हो गई, जब राखी को पाने के लिए वो आग के शोलों पर भी नंगे पांव गुज़र गये। और तो और स्वंयवंर में आई ईवेंट मैनेजर ने दूल्हों को चुनौती दी, कि एक-दूसरे की गर्दन में सरिया फंसाकर जो इसे मोड़ देगा, राखी जी उससे बेहद खुश होंगी। और बेचारे दूल्हों ने ऐसा भी किया। मरता क्या न करता आखिर राखी को जो पाना है। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sl6w6C8qkHI/AAAAAAAAAVU/2q9l1DQDd9s/s1600-h/Rakhi.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 269px; height: 261px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sl6w6C8qkHI/AAAAAAAAAVU/2q9l1DQDd9s/s320/Rakhi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5358915117887688818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राखी इतनी बोल्ड हैं कि शो में खुलेआम कह रही हैं कि मुझे इनके छूने से कोई फीलिंग नहीं हो रही है, इनके छूने से मुझे कुछ एहसास ही नहीं हुआ। ये सब जानते हुए भी कि इस शो को सारी दुनिया देख रही है। लेकिन ये तो राखी हैं, राखी को क्या, कुछ भी बोल सकती हैं। बेचारे कुंआरे अब खुद को भरी पब्लिक के सामने नामर्द समझें, या राखी को संतुष्ट करने के लिए किसी नीम-हकीम से मर्दानगी की दवा खरींदे।&lt;/strong&gt; आखिर राखी को जो पटाना है। लेकिन राखी हैं, कि आराम से पटना ही नहीं चाहतीं। लड़के लाख मिन्नतें कर रहे हैं, इतना ही नहीं, राखी को पटाने के लिए बेचारे एक-दूसरे को भगाने के लिए उसी तरह की ख़तरनाक साज़िशें रच रहे हैं, जैसे किसी रियलिटी शो में लड़कियां एक-दूसरे के खिलाफ़ जाल बुनती हैं। लड़के राखी के सामने हाथ बांधे खड़े हैं, कब मैडम की मेहरबानी हो जाए और उनको मिठाई का डिब्बा मिल जाए। लेकिन मिठाई मिलना सबकी इच्छा नहीं है, हर कोई चाहता है कि राखी उसे वरमाला पहना दें। वाकई ज़माना बदल गया है, अब मां का लाडला अपने लिए बहू नहीं ढूंढ रहा है, बल्कि एक बहू अपने लिए पति ढूंढ रही है। अब पति परमेश्वर होगा, या पत्नी पतिव्रता, ये तो भगवान ही जाने। लेकिन ज़माना सचमुच बदल गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-3269035220394516554?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/3269035220394516554/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=3269035220394516554' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/3269035220394516554'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/3269035220394516554'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/07/blog-post_16.html' title='राखी के स्वयंवर में नामर्द!'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sl6wpJJJwNI/AAAAAAAAAVM/thSbOmeFcBc/s72-c/Rakhi+2.gif' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-2831576734684083897</id><published>2009-07-07T17:31:00.011+09:00</published><updated>2009-07-07T17:39:34.169+09:00</updated><title type='text'>मुर्गी ने दिया आदमी का बच्चा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SlMJIZeQFiI/AAAAAAAAAUY/Ek2HK7oKJ1E/s1600-h/murgi+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SlMJIZeQFiI/AAAAAAAAAUY/Ek2HK7oKJ1E/s320/murgi+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355634421755024930" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मुर्गी ने आदमी के बच्चे को&lt;/strong&gt; जन्म दिया है। सुनने में आपको थोड़ा अटपटा ज़रूर लगेगा, लेकिन ये ख़बर आई है मध्य-प्रदेश के रायसेन शहर से। एक टीवी चैनल पर ये ख़बर चलने के बाद दूसरे चैनलों के पत्रकार भी इसे कवर करने दौड़ पड़े। बिना ये जांच-पड़ताल किये, कि क्या एक मुर्गी भी इंसान के बच्चे को जन्म दे सकती है। मज़े की बात ये है कि इस पर किसी ने अपना दिमाग लगाने की ज़रूरत भी नहीं समझी। मामला मध्य प्रदेश में रायसेन के एक गांव बाड़ीकला का है। जहां से ख़बर आई कि यहां रहने वाले पतिराम नाम के शख्स के घर मुर्गी ने एक इंसान के बच्चे को जन्म दिया है। इस ख़बर के आने के बाद मीडिया वाले दौड़ पड़े। लेकिन डॉक्टरों के साथ ही आम लोगों का दिमाग भी चकरा गया। हर कोई ये सोच रहा था कि ऐसा भला कैसे हो सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे चैनल में भी ये ख़बर आई, तो मैं भी इसे सुनकर चौंक गया। पहले तो ख़बर की आपा-धापी में यकीन ही नहीं हुआ। लेकिन जब इसकी तस्वीरें देखीं, तो माजरा समझते देर नहीं लगी। मुर्गी के साथ एक इंसान का चार इंच का भ्रूण दिख रहा था। जिसको लेकर ये दावा किया जा रहा था कि इंसान के इस बच्चे को मुर्गी ने ही जन्म दिया है। लेकिन मुर्गी को देखकर तरस आ रहा था, बेचारी अपने हाल पर बेबस थी, कैमरे की निगाहों के साथ ही उसे ज़माने की नज़रों का सामना भी करना पड़ रहा था। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SlMJUEmTSJI/AAAAAAAAAUg/meTjqqxhmpM/s1600-h/murgi+5.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SlMJUEmTSJI/AAAAAAAAAUg/meTjqqxhmpM/s320/murgi+5.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355634622310074514" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बेज़ुबान परेशान थी, अपनी सफ़ाई में क्या कहे,&lt;/strong&gt; किससे कहे और कैसे कहे। कैसे लोगों को बताए कि इसमें उसका कोई कसूर नहीं है, बल्कि इसका पापी तो कोई और है, जो अपने गुनाहों पर पर्दा ढकने के लिए मेरे दड़बे में इस भ्रूण को रखकर चला गया है। लेकिन जैसे लोग नासमझ थे, वैसे ही मुर्गी भी लाचार थी। उसका मासूम चेहरा देखकर उस बेचारी पर तरस आ रहा था। जो ख़ता उसने की ही नहीं उसका इल्ज़ाम उसके मत्थे मढ़ दिया गया था। और तो और उसका मालिक भी इस ख़बर को कैश कराने में लगा था। मुर्गी बेचारी के हर एंगल से शॉट्स बनाए जा रहे थे। वो तो बस नहीं चला, अगर मुर्गी बोल पाती, तो शायद उससे तमाम तरह के बेतुके सवाल भी पूछ लिए होते। हो सकता है कोई ये भी पूछ लेता, कि इस बच्चे का बाप कौन है? डॉक्टर भी बेचारे बोल-बोलकर परेशान थे, कि कुदरत के नियम में इस तरह का कोई खिलवाड़ नहीं हो सकता। भला मुर्गी भी कहीं इंसान के बच्चे को जन्म दे सकती है। लेकिन सुनने को कोई तैयार ही नहीं था। ये किस्सा बिल्कुल ऐसा ही था, जैसे हमने जर्नलिज्म में पढ़ा था कि अगर कुत्ता आदमी को काटे तो ख़बर नहीं है, लेकिन अगर आदमी कुत्ते को काटे तो ख़बर बन जाती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-2831576734684083897?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/2831576734684083897/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=2831576734684083897' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2831576734684083897'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/2831576734684083897'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/07/blog-post_07.html' title='मुर्गी ने दिया आदमी का बच्चा'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SlMJIZeQFiI/AAAAAAAAAUY/Ek2HK7oKJ1E/s72-c/murgi+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-739710824843445877</id><published>2009-07-04T15:45:00.002+09:00</published><updated>2009-07-07T12:22:03.334+09:00</updated><title type='text'>जब आंखो में नमी आती है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SlK_SypNqTI/AAAAAAAAATw/Kp-25mKDXxA/s1600-h/Udasi+2.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SlK_SypNqTI/AAAAAAAAATw/Kp-25mKDXxA/s320/Udasi+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355553236450126130" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-जैसे सावन की घटा ज़रा सा बरसे और फिर धूप निकल आये।&lt;br /&gt;-जैसे कोई मेहमान चंद रोज़ घर में क़हकहे बिखेर कर वापस चला जाए।&lt;br /&gt;-जैसे छुट्टी का दिन आकर गुज़र जाए।&lt;br /&gt;-जैसे त्योहार के रोज़ की शाम।&lt;br /&gt;-जैसे दुल्हन की रुख़सती के बाद घर।&lt;br /&gt;-जैसे किसी परदेसी की अलविदाई मुस्कुराहट।&lt;br /&gt;-जैसे स्टेशन का प्लेटफ़ार्म छोड़ती ट्रेन।&lt;br /&gt;-जैसे घर के सामने से गुज़रता हुआ डाकिया।&lt;br /&gt;-जैसे वतन से बिछुड़ने की याद।&lt;br /&gt;-जैसे भूले-बिखरे चंद ख़त।&lt;br /&gt;-जैसे किताबों की रैक में अचानक कोई पुरानी तस्वीर मिल जाए।&lt;br /&gt;-जैसे एलबम में मम्मी-पापा के साथ बचपन की फोटो।&lt;br /&gt;-जैसे तावीज़ में दी हुई मां की दुआएं।&lt;br /&gt;-जैसे परदेस में मिली पापा की प्यार भरी चिट्ठी।&lt;br /&gt;-जैसे किसी मरने वाले के तह-दर-तह कपड़े।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-739710824843445877?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/739710824843445877/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=739710824843445877' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/739710824843445877'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/739710824843445877'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/07/blog-post_04.html' title='जब आंखो में नमी आती है...'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SlK_SypNqTI/AAAAAAAAATw/Kp-25mKDXxA/s72-c/Udasi+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-6159303103027059559</id><published>2009-07-03T14:23:00.007+09:00</published><updated>2009-07-03T14:49:47.546+09:00</updated><title type='text'>कब मिलेगी सैलरी?</title><content type='html'>तारीख पहली जुलाई, सुबह छह बजे अख़बार वाले की आहट से आंख खुली, उनींदी आंखों से दरवाज़ा खोला, तो चौखट पर हिंदुस्तान अख़बार पड़ा था। ख़बर के चस्के में अख़बार उठाया, तो उसके मास्ट हेड पर बड़ा सा लिखा था आज पहली तारीख है। साथ में कैडबरी चॉकलेट का एड भी था। बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था ''खुश है ज़माना आज पहली तारीख है''। मतलब अगर पहली तारीख आती है, तो तनख्वाह मिलती है और आप चॉकलेट की पार्टी देते हैं। लेकिन  अख़बार के इस एड को देखकर मेरा मन ख़राब हो गया। आखिर मेरी ज़िदगी में पहली तारीख़ कब आयेगी। तीन महीने हो गये पहली तारीख़ का इंतज़ार करते हुए। लेकिन ये पहली तारीख आना ही नहीं चाहती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sk2XRu50I3I/AAAAAAAAARg/hJRO-qKzYys/s1600-h/Salary.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 168px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sk2XRu50I3I/AAAAAAAAARg/hJRO-qKzYys/s200/Salary.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354101862917481330" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;एक-एक दिन का इंतज़ार पहाड़ जैसा हो गया था। अख़बार और टीवी चैनल पर कैडबरी का एड मुंह चिढ़ा रहा था। नाच-गाकर पहली तारीख का जश्न मनाया जा रहा था, लेकिन अपने सीने पर तो सांप लौट रहा था। पहली तारीख तो अपने कैलेंडर में भी आई, लेकिन मोबाइल में मैसेज ही नहीं आया। कई बार उलट-पलट कर देखा शायद अब घंटी बजे, लेकिन किस्मत की घंटी बजना शायद अपने नसीब में था ही नहीं। उल्टे कर्ज़दारों ने घर की कॉलबेल बजाना ज़रुर शुरु कर दिया। मकान मालिक का दो महीने का किराया चढ़ चुका था, तो क्रेडिट कार्ड, मोबाइल, इंटरनेट, राशन और दूधवाले तक का बिल बकाया था। लेकिन पहली तारीख का सपना टूट ही नहीं रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैलरी को लेकर कोई सीधा जवाब नहीं मिल रहा था, तो कभी तीन महीने की सैलरी मिलने के सब्ज़बाग दिखाए जा रहे थे। लेकिन मुझे खुद से ज्यादा इंडियन एयरलाइंस और सत्यम के लोगों की चिंता हो रही थी। उन लोगों को सैलरी मिलना तो दूर, नौकरियां जाने की भी नौबत आ चुकी थी। पत्रकार हैं, इसलिए उनका दर्द समझ में आता है, लेकिन अपना दर्द पूछने वाला शायद कोई नहीं है। सरकारें भी शायद कान बंद किये बैठी थीं। कंपनियां झूठी तसल्ली दे रही थीं, और बेबस कर्मचारी मन मसोस कर पहली तारीख का इंतज़ार कर रहे थे। दफ्तर में अजीब तरह का माहौल था। काम में किसी का मन नहीं लग रहा था। लेकिन काम तो करना ही था। तो घर पर बच्चे पापा की सैलरी का इंतज़ार कर रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sk2bv4ctCUI/AAAAAAAAASA/stWjrKzNMbM/s1600-h/Rupee+3.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sk2bv4ctCUI/AAAAAAAAASA/stWjrKzNMbM/s200/Rupee+3.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354106778922322242" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जुलाई का महीना शुरु हो चुका था, लुकाछिपी के बाद मानसून भी दस्तक दे चुका था। लेकिन पैसों की बरसात होने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे। जब दुनियाभर के मां-बाप अपने बच्चों को गर्मियां की छुट्टियों में तफ़रीह करा रहे थे, तो हमारे दफ्तर में लोग घर चलाने के लिए कर्ज़ का जुगाड़ करने में लगे थे। मां-बाप बच्चों को झूठी तसल्ली दे रहे थे, उनको अगली छुट्टियों में घुमाने के वादे किये जा रहे थे। लेकिन स्कूल खुलते ही बच्चों की फीस और एडमिशन का खर्च मुंह बाएं खड़ा था। तो मकान से लेकर गाड़ी तक की किस्त दिमाग की घंटी बजा रही थी। घरवालों की फ़रमाइशें पूरी करना तो दूर, दफ्तर तक आने के लिए किराए के भी लाले पड़ने लगे। कुछ लोग तो मजबूरन ऑफिस से छुट्टियां लेने को मजबूर हो गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालात बद से बदतर होते जा रहे थे। लेकिन किसी को भी हमारी फिक्र नहीं। ऊपर से सरकार ने पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ाकर एक और झटका दे दिया। अब पैदल चलने के सिवा कोई चारा नहीं था। लोग पहली तारीख को सैलरी मिलने पर भले ही जश्न मनाते हों, लेकिन यहां तो जश्न के बारे में सोचने की हिम्मत भी नहीं होती। कभी किसी से पांच रुपये उधार मांगने की नौबत नहीं आई, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ, जब दोस्तों के सामने उधारी के लिए हाथ फैलाना पड़ा हो। मजबूर ये हालात इधर भी थे और उधर भी। मंदी ने ऐसा मारा कि कमर कमान हो चुकी थी। दोस्त भी मंदी के मारे थे। पहली तारीख के सपने सब हवा हो चुके थे। पार्टियों में जाने के बजाए अब उनसे बचने की तरकीबें सोची जा रही थीं, इसी इंतज़ार में कि जल्द ही आयेगी पहली तारीख, लेकिन कब आयेगी ये किसी को पता नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-6159303103027059559?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/6159303103027059559/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=6159303103027059559' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6159303103027059559'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6159303103027059559'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='कब मिलेगी सैलरी?'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/Sk2XRu50I3I/AAAAAAAAARg/hJRO-qKzYys/s72-c/Salary.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-8977655507042224727</id><published>2009-06-27T17:25:00.004+09:00</published><updated>2009-06-27T17:33:25.307+09:00</updated><title type='text'>अब पप्पू फ़ेल नहीं होगा</title><content type='html'>पप्पू अब फेल नहीं होगा, जब से ये ख़बर आई है, पप्पू के साथ-साथ उसके मां-बाप के चेहरे भी खिल उठे हैं। पंजे को वोट देने वाले मां-बाप को लग रहा है कि उनका वोट कामयाब हो गया है। पिछली दस साल से एक ही क्लास में पप्पू रिकॉर्ड बना रहा था, लेकिन न तो गिनीज़ बुक वाले उसका नाम दर्ज़ कर रहे थे और न ही लिम्का बुक में उनके बेटे का नाम छप रहा था। और तो और बोर्ड वाले भी उससे पीछा छुड़ाने के मूड में नहीं थे। लेकिन सरकार को पप्पू का ख्याल आया। उसके मां-बाप के आंसुओं का ख्याल आया, जो पिछले दस साल से इस बात का इंतज़ार कर रही थीं, कि इस बार तो उनका लाडला दसवीं की सीड़ी पार कर ही लेगा। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SkXYvPit8xI/AAAAAAAAARI/VpcfcDKqjGg/s1600-h/Pappu+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 191px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SkXYvPit8xI/AAAAAAAAARI/VpcfcDKqjGg/s200/Pappu+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5351922038337303314" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब से वो गाना आया कि मां का लाडला बिगड़ गया, पप्पू और आवारा हो गया था। मां-बाप से लेकर पप्पू के यार-दोस्त तक इस इंतज़ार में थे, कि कब पप्पू पास होगा और उन्हें मिठाई खाने को मिलेगी। लेकिन पप्पू ने तो जैसे कसम खा ली थी। वो तो भला हो, बहन मायावती और कपिल सिब्बल जी का। सिब्बल जी ने दसवीं से बोर्ड ख़त्म कराने का सुझाव दिया, तो बहन जी ने फटाफट अपने स्टेट में ये फ़रमान लागू भी कर दिया कि अब दसवीं में कोई फेल नहीं होगा। अगर छह में से पांच सब्जेक्ट में भी पास होते हैं, तो अगली क्लास के लिए बेड़ा पार। मतलब ये कि पप्पू की दस साल की तपस्या रंग लाई। लेकिन कुछ बच्चे तो ऐसे भी हैं, जो पप्पू नहीं बनना चाहते। उनको तो एक्ज़ाम का ऐसा कीड़ा सवार है कि पूछिए मत। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर मंत्री जी ने ऐलान किया, उधर टीवी कैमरे बच्चों के पीछे दौड़ पड़े। हर किसी को उनकी बाइट की फिक्र थी, बहुत से पप्पू कैमरों के सामने चहक रहे थे, कि बढ़िया हुआ, अब झंझट से मुक्ति मिली। फेल-पास का चक्कर ही ख़त्म हो गया। कोई माया जी को कोटि-कोटि नमन कर रहा था, तो कोई सिब्बल साहब को साधुवाद दे रहा था। चलो किसी ने तो हमारी सुनी। किसी ने तो हमारा दर्द समझा। आखिर जो पप्पू घिसट-घिसट कर दसवीं के बाद की गिनती भूल गया था, अब कम से कम ग्यारह पर तो आयेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बहुत से पड़ाकू शायद इससे खुश नहीं थे,वो सिर्फ़ अपने ही बारे में सोच रहे थे, उनके लिए बिल्कुल नहीं, जिनके बाप-दादा भी बेटे के दसवीं पास होने का सपना देखते-देखते गुज़र गये। &lt;br /&gt;पप्पू स्कूल से बाहर निकल गया, शादी के बाद पप्पू के बच्चे भी दसवीं में आ गये, और अब पप्पू अपने बच्चों के साथ उसी क्लास में है। हद तो तब हो गई, जब बच्चे पार कर गये और पप्पू किनारे पर ही रह गये। लेकिन अगर सिब्बल साहब की चली, तो उनकी ज़िंदगी में भी आयेगा एक सुनहरा दिन जब उनके मौहल्ले में भी बटेगी मिठाई और फिर हर कोई कहेगा कि पप्पू पास हो गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-8977655507042224727?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/8977655507042224727/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=8977655507042224727' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8977655507042224727'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8977655507042224727'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/06/blog-post_481.html' title='अब पप्पू फ़ेल नहीं होगा'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SkXYvPit8xI/AAAAAAAAARI/VpcfcDKqjGg/s72-c/Pappu+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-4779203406182121596</id><published>2009-06-27T16:17:00.002+09:00</published><updated>2009-06-27T16:29:16.677+09:00</updated><title type='text'>ये बच्चे नहीं पटाखा हैं</title><content type='html'>ये बच्चे नहीं पटाखा हैं। ज़ीटीवी पर आजकल एक शो आ रहा है लिटिल चैंप्स। इसमें शामिल सभी 12 बच्चे एक से बढ़कर एक हैं। इतनी कम उम्र में इन बच्चों को सुरों की इतनी समझ है, कि अच्छा-अच्छा आदमी दांतो तले उंगली दबा ले। लेकिन यहां पर नई बात ये नहीं है। बल्कि दिलचस्प तो ये है कि इस प्रोग्राम में एक छोटी से एंकर है, जो अच्छे-अच्छों की छुट्टी कर सकती है। दरअसल अफशां नाम की ये बच्ची आई तो थी सिंगर बनने, लेकिन उसकी हाज़िर जवाबी देखकर अभिजीत और अलका ने उसे एंकर बनाने का फैसला कर लिया। अफ़शा मुसानी नाम की ये बच्ची जब स्टेज पर एंकरिंग करती है, तो बड़ों-बड़ों के कान काट लेती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार या पांच साल की इस बच्ची को देखकर यकीन ही नहीं होता कि ये अपनी उम्र से इतनी ज्यादा समझदार है। यूं तो स्टेज पर खड़े होना भी हर किसी के बस की बात नहीं होती, लेकिन अफ़शां मुसानी की अदाकारी में वो कॉंफिडेंस है कि पूछिए मत। उसकी हाज़िर जवाबी का आलम ये कि अभिजीत और अलका याज्ञिक तो क्या बड़े-बड़े धुरंधर उसके सामने खुद को चित्त समझते हैं। दिलचस्प नज़ारा तो तब देखने को मिला था, जब मुंबई की ये बच्ची सिंगर बनने के लिए ऑडिशन देने आई थी। लेकिन ऑडिशन के दौरान उसने वो मस्ती की, कि आयोजकों का इरादा ही बदल गया। जब ऑडिशन के दौरान अलका याज्ञिक ने उससे सवाल पूछे, तो उसने ऐसे चटपटे जवाब दिये कि हर कोई उसके जवाबों पर लोटपोट हो गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्ची के जवाबों पर हंसते हुए अलका ने उसकी मम्मी से पूछा कि इसके जन्म के वक्त आपने क्या खाया था, तो उससे पहले ही अफ़शां बोल पड़ी, मेरी मम्मी ने बड़ा-पाव खाया था। मैं इस प्रोग्राम को लगातार देखता हूं, सिर्फ़ इसी को नहीं बल्कि बच्चों से जुड़े शायद सभी प्रोग्राम। इसकी एक वजह भी है। जो काम हम अपने बचपन में नहीं कर पाए, उन्हें ये बच्चे इतने कॉन्फिडेंस से पूरा कर रहे हैं कि सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। दरअसल हमारे ज़माने में न तो इतनी सुविधाएं थीं और न ही हमारे घरवालों ने प्रतिभा को तराशने की ज़रूरत महसूस की। अगर कभी छिपकर टीवी देख लिया, या कॉमिक्स पड़ ली, तो समझिए धुनाई होना पक्की बात थी। और अगर कहीं क्रिकेट खेलने चले गये, तो समझिये उस दिन शामत तय थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मां-बाप को बस एक ही चीज़ से मतलब था, कि बच्चे पढ़कर नवाब बनें। लेकिन आज ज़माना बदल गया है, आज के बच्चे कहते हैं कि पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे ख़राब और खेलेगो कूदोगे, तो बनोगे नवाब।। और ऐसा हो भी रहा है, आज़ के ज़माने के बच्चे तो रफ्तार से भी तेज़ दौड़ रहे हैं। साथ में उनके मां-बाप भी कदम से कदमताल मिलाकर अपने बच्चों के लिए खून-पसीना एक कर रहे हैं। कलर्स पर बालिका वधु और सलोनी धूम मचाए हुए हैं, तो कई चैनल्स बच्चों को लेकर प्रोग्राम बना रहे हैं। अब ये बच्चों के टैलेंट का कमाल है, या बाज़ार की बढ़ती मांग। अब एनिमेटिड प्रोग्राम और कार्टून नेटवर्क बच्चों की फेवरिट लिस्ट में नहीं हैं। अब वो खुद स्टेज पर खड़े होकर अपने सुरों का संग्राम छेड़ रहे हैं, तो ठहाकों से लोगों के मन में गुदगुदी पैदा कर रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमिर खान की फिल्म तारे ज़मीं पर को शायद ही कोई भूला होगा, जिसमें नन्हें दर्शील सफ़ारी ने अपनी एक्टिंग से दर्शकों को रोने पर मजबूर कर दिया था। तो स्लमडॉग मिलेनियर के अज़हर और रुबीना को कौन नहीं जानता, जो अपनी एक्टिग की वजह से आज देशभर में नाम कमा रहे हैं। इन बच्चों को इतनी कम उम्र में नेम-फ़ेम-गेम मिल गया जब इनमें से कई को अपना नाड़ा बांधना भी नहीं आता होगा। पहले मां-बाप अपने बच्चों से अपना नाम रोशन करने के लिए कहते थे, लेकिन आज उनकी पहचान अपने बच्चों से ही है। आज सलोनी, अविका, अज़हर, रुबीना, दर्शील ओर अफ़शां के मां-बाप को उन्हीं की वजह से पहचान मिली है। ये बच्चे अब ख़बर बनते हैं, इनकी हर हलचल पर मीडिया की नज़र रहती है। इनकी हर हलचल, टीवी चैनल्स की हेडलाइन बनती है। ये बच्चे वाकई लाजवाब हैं, इनकी कामयाबी देखकर रश्क होता है। इनको देखकर लगता है कि हिंदुस्तान सचमुच तरक्की के रास्ते पर बढ़ चला है। ये बच्चे उधम नहीं मचा रहे हैं, बल्कि ये तो धूम मचा रहे हैं। इन बच्चों को देखकर कई बार मन होता है कि इन्हें किसी म्यूज़ियम में रख लूं, तो कई बार खुद से भी जलन होती है। कि हम बचपन में इतने बुद्धु कैसे रह गये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-4779203406182121596?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/4779203406182121596/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=4779203406182121596' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/4779203406182121596'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/4779203406182121596'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/06/blog-post_27.html' title='ये बच्चे नहीं पटाखा हैं'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-8207816265144399465</id><published>2009-06-24T17:20:00.010+09:00</published><updated>2009-06-24T18:05:58.247+09:00</updated><title type='text'>वो सफ़र यादगार था</title><content type='html'>22 मई 2009 की तपती दोपहरी थी... सूरज क़हर बरसा रहा था। हर तरफ़ आग ही आग बरस रही थी। दफ्तर से मन उचट चुका था, तो ज़िंदगी में भी घमासान मचा हुआ था। दिल और दिमाग दोनों ही काम नहीं कर रहे थे। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। किसी से बात करके भी मन का बोझ हल्का नहीं हुआ, तो दफ्तर से छुट्टी ले ली। पहले समझ नहीं आया कि क्या करूं, फिर अचानक मन में आया कि चलो कहीं घूम लिया जाए। तभी अचानक पापा का फोन आया कि वो जयपुर जाना चाहते हैं, पापा ने फोन पर पूछा, क्या तुम भी चलोगे? मैंने हां कर दी। पापा के साथ मैं भी राजस्थान टूर पर निकल पड़ा। गर्मी झुलसा रही थी, लेकिन मन बहलाने के लिए घूमने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देर शाम जयपुर पहुंचा, तो हम लोग छोटे भाई के कमरे पर रुके। फ्रेश होने के बाद कुछ देर इधर-उधर की बातें की, उसके बाद हम तीनों घूमने निकल गये। जयपुर का किला और हवामहल देखने के बाद भी मन उदास ही था। सीने पर एक बड़ा बोझ था, जो उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था। देर शाम जयपुर के मशहूर इस्माइल रोड पर भी निकले, बाज़ार भी घूमा, सोचा कुछ ख़रीदारी कर लूं, लेकिन जयपुर में मन रमा नहीं। इसके बाद अगला पड़ाव था अजमेर। मशहूर ख्वाजा संत मोईनुद्दीन चिश्ती का शहर। पहाड़ी पर बसे इस शहर में चढ़ाई ने काफ़ी थका दिया। वैसे भी जयपुर से अजमेर का रास्ता करीब तीन घंटे से ज्यादा का था। थकान तो पहले से ही थी। अजमेर पहुंचा तो दरगाह जाना भी ज़रूरी था। लेकिन दरगाह पर पहुंचते ही ऐसा लगा कि हम कहां आ गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मज़ार पर मन्नतों के लिए हज़ारों ज़ायरीन पहुंचे थे, लेकिन मज़ार पर पैसों का खेल देखकर एक बारगी खुद को झटका लगा, कि क्या यही ख्वाजा का दरबार है, जहां कदम-क़दम पर लोग पैसे उगाहने के लिए खड़े थे। शुरुआत चप्पलों से हुई, जिसके पांच रुपये देना पड़े। उसके बाद गेट पर खड़े लोग किसी भी तरह पैसे लेने के लिए उतावले थे। कोई फूलों के बहाने पैसे ले रहा था, तो कोई ख्वाजा के दर पे लंगर कराने के नाम पर पैसे मांग रहा था। इन सब से निकलकर जब ख्वाजा की मज़ार पर पहुंचे, तो वहां एक औरत के चीखने की आवाज़ सुनी। मालूम किया तो पता चला कि उससे भी लोग ज़बरन पैसे उगाहने में लगे थे। अफ़सोस हुआ कि ये लोग मुसलमानों की कैसी इमेज बना रहे हैं। मुझे याद आये दिल्ली के लोटस और अक्षरधाम टैंपिल जहां न तो कोई टिकट लगता है, उल्टे आपके जूते-चप्पल भी हिफ़ाज़त से रखे जाते हैं। लेकिन ख्वाजा के दर पर कुछ लोग मुसलमानों की इमेज को ख़राब करने में लगे थे। आज अगर ख्वाजा देखते होंगे तो उन्हें भी इस हालत पर अफ़सोस तो होता ही होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ैर यहां से आगे बढ़े तो प्यार-मोहब्बत के शहर आगरा का रुख किया। ट्रेन ने जैसे ही आगरा शहर में एंट्री की, बदबू के मारे जीना मुश्किल हो गया। समझ नहीं आया कि हम उसी शहर में दाख़िल हो रहे हैं, जहां दुनिया का सातवां अजूबा हैं। रेलवे लाइन के किनारे बिखरी गंदगी ने नाक पर रुमाल रखने को मजबूर कर दिया। बदबू से बचते हुए बड़ी मुश्किल से स्टेशन पहुंचे, तो उसके बाहर का हाल भी पूछिए मत। हर तरफ़ गंदगी ही गंदगी का नज़ारा। लालू जी ने रेल को तो प्रोफिट में ला दिया, लेकिन गंदगी देखकर प्रोफ़िट का राज़ समझ में आ गया। ताज के रास्ते में तो गंदगी का वो आलम था, कि पूछिए मत। बड़ा अफ़सोस हुआ वहां की हालत पर, गंदगी देखकर मन में ख्याल आया कि आखिर क्या सोचते होंगे परदेसी महमान इस शहर के बारे में। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकिन ताज पर पहुंचकर सारी थकान काफ़ूर हो गई। आलमपनाह की बेपनाह ख़ूबसूरत इमारत देखकर दिल बाग़-बाग हो गया। प्यार की इतनी खूबसूरत निशानी तो क्या, मैंने अपनी ज़िंदगी में ऐसा शानदार अजूबा भी नहीं देखा था। &lt;br /&gt;शाहजहां ने अपनी महबूबा को प्यार का वो तोहफ़ा दिया था, जिसे शाहजहां और मुमताज तो क्या इस दुनिया में आने वाला हर शख्स ताउम्र याद रखेगा। आज के दौर में न तो कोई ऐसा प्यार करने वाला शाहजहां मिलेगा और न ही कोई इतनी किस्मत वाली मुमताज़ महल होगी। और न ही कोई ऐसा दिलखर्च शहंशाह होगा। जो अपनी महबूबा के लिए मरने से पहले ही सफ़ेद पत्थर का हसीन मकबरा बनवा सकता हो। दुनिया का ये अजूबा वाकई लाजवाब है। अनमोल है, बेशकीमती है। दुनिया में इस जैसी इमारत न तो कोई बनवा सकता है और न ही शायद बनवा पाएगा। सफ़ेद संगमरमर से बनी ये इमारत उस प्यार की कहानी को अमर कर रही है, जो आज से लगभग चार सौ साल पहले लिखी गई थी। और उस ज़माने में लिखी गई थी, जब प्यार को किसी गुनाह के दर्जे में रका गया था। इस कहानी में सिर्फ़ प्यार का टिव्स्ट नहीं था, बल्कि ये तो चार सौ साल का इतिहास भी समेटे हुए थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली बार में तो ताज को देखने पर आंखें चकाचौंध से भर जाती हैं। यकीन ही नहीं होता कि अपने मुल्क में भी इतना नायाब नमूना है, जिसे देखने दुनियाभर से हर साल लाखों लोग हिंदुस्तान के इस शहर में आते हैं। वाकई ये अपने आप में लाजवाब है। ताज नगरी के बाद मैंने घर लौटने का फैसला कर लिया, क्योंकि इस हसीन इमारत को देखने के बाद फिर कहीं और जाने का मन ही नहीं हुआ। ताज की मीठी-मीठी यादों के साथ आगरा का मशहूर पेठा ख़रीदकर मैंने इस शहर से से विदाई ली, और फिर चल पड़ा अपने घर के लिए। जहां मां बेसब्री से मेरा इंतज़ार कर रही थीं। हर बार की तरह इस बार भी उनके पास मुझसे करने के लिए ढेर सारी बातें थीं, मेरे लिए उनकी रसोई में ढेर सारे पकवान भी इंतज़ार कर रहे थे... बस फिर क्या था, मैंने आगरा से पकड़ी बस और फिर इस शहर को अलविदा कहकर अपने घर के लिए रवाना हो गया। और आगरा की यादें कहीं पीछे छूट गईं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-8207816265144399465?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/8207816265144399465/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=8207816265144399465' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8207816265144399465'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/8207816265144399465'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='वो सफ़र यादगार था'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-7743141514987026459</id><published>2009-05-31T15:38:00.004+09:00</published><updated>2009-05-31T17:47:08.376+09:00</updated><title type='text'>रामपुर का हब्शी हल्वा</title><content type='html'>नवाबों के इस शहर की हर अदा निराली है। तहज़ीब और उर्दू के इस शहर में चाकू की धार भले ही कुंद पड़ चुकी हो, लेकिन इस शहर में रफ्तार बाकी है। दिल्ली से करीब सवा दौ सौ किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे 24 पर बसा ये शहर मेहमानों के इस्तकबाल में हाथ फैलाए खड़ा रहता है। नवाबी आन-बान और लज़ीज़ खानो के अलावा इस शहर ने शायरी में भी अपना एक मुकाम बनाया है। लेकिन आज बात सिर्फ़ खाने की। और खाने में भी रामपुर के मशहूर हब्शी हल्वे की। नाम भले ही अटपटा सा लगे, लेकिन आप बिल्कुल सही समझ रहे हैं, दरअसल इस हल्वे का नाम अफ्रीका में रहने वाले हब्शियों के नाम पर ही पड़ा है। रामपुर के नवाब कल्बे अली खां जब साउथ अफ्रीका गये थे, तो वहां का हब्शी हल्वा उन्हें बेहद पसंद आया। इतना पसंद आया, कि वो हल्वा बनाने वाले करीगर को ही वहां से अपने साथ ले आये। और फिर रामपुर में बनाया जाने लगा ख़ास हब्शी हल्वा।&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SiJD4F30TpI/AAAAAAAAAQI/aZQu0incV1E/s1600-h/1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 313px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SiJD4F30TpI/AAAAAAAAAQI/aZQu0incV1E/s400/1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5341906738942856850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; इस हल्वे की खास बात ये है कि इसे कमज़ोरी और ताकत की अहम दवा माना जाता है। लेकिन रामपुर में इस हल्वे को बनाने की ज़िम्मेदारी उठाई शहर के मशहूर हकीम अब्दुल हकीम खान ने। डेढ़ सौ साल पहले रामपुर के बाज़ार नसरुल्ला खां में उन्होंने हल्वे की दुकान खोली। नसरुल्ला खां बाज़ार जाने के लिए स्टेशन पर उतरने के बाद आप रिक्शा कर सकते हैं, जो महज दस रुपये में आपको बाज़ार में छोड़ देगा। तंग रास्ते वाले इस बाज़ार में हफ्ते के सातों दिन भीड़ का आलम रहता है। इसी भीड़ भरे बाज़ार में है हकीम साहब की दुकान। लेकिन अब हकीम साहब तो रहे नहीं, लिहाज़ा उनकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी इस पुश्तैनी धंधे को संभाल रही है। दुकान और दुकानदार की बात से हटकर अब बात की जाए हल्वे की। देसी घी, और ख़ालिस दूध से बना ये हल्वा पूरी रात आग पर बनाया जाता है। साथ ही हल्वे में सूखे मेवों और समनख के साथ ही देसी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल भी किया जाता है। ख़ास बात ये है कि हल्वे के बनाने वाले इसका फार्मूला बताना नहीं चाहते। शायद यही वजह है कि रामपुर शहर में इसकी दो ही दुकाने हैं और दोनों ही इसी खानदान की हैं। खाने में चॉकलेट जैसा स्वाद देने वाला ये हल्वा इतना लज़ीज़ होता है कि जो कोई एक बार इसे खाले, तो खाते-खाते भी उसका मन न भरे। हालांकि इसे सर्दियों के लिए बेहद उम्दा माना जाता है, लेकिन हल्वे की मांग इतनी है, कि इसे बारह महीनों तक बेचा जाता है। कई फिल्मी सितारे भी जैसे मैक मोहन, पोपटलाल भी हकीम साहब के हल्वे के ख़ास मुरीद हैं। इसके अलावा कई देशी-विदेशी सैलानी भी रामपुर से गुज़रते वक्त इस हल्वे को साथ ले जाना नहीं भूलते। हल्वे की भीनी-भीनी खुशबू का ज़ायका अगर आपकी ज़ुबान को लग जाए, तो आप भी इसके दीवाने हुए बिना नहीं रह पाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-7743141514987026459?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/7743141514987026459/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=7743141514987026459' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/7743141514987026459'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/7743141514987026459'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/05/blog-post_31.html' title='रामपुर का हब्शी हल्वा'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SiJD4F30TpI/AAAAAAAAAQI/aZQu0incV1E/s72-c/1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-3095518203871871707</id><published>2009-05-10T21:50:00.003+09:00</published><updated>2009-05-10T21:57:46.148+09:00</updated><title type='text'>एक चिट्ठी मां के नाम</title><content type='html'>मां मेरी सूरत तेरी सूरत से अच्छी तो नहीं, लेकिन मुझे तेरे आंचल की तलाश है। तेरी गोद में सो जाने को जी चाहता है। लेकिन मां, मैं तो इतनी बदनसीब निकली, कि जन्म के बाद ही मुझे दर-दर की ठोंकरे खाने के लिए छोड़ दिया गया। आखिर मेरा क्या कसूर था। क्यों मैं अनाथों की तरह दूसरों के रहमो-करम पर जीती हूं... मां सुन लो मेरी भी फरियाद &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने ज़मीन पर कदम रखा था, तो मां के नर्म आंचल का इंतज़ार किया था। मां की गोद में खेलने के सपने देखे थे। पापा की उंगली पकड़कर घर से निकलने का ख्वाब संजोया था। भाई के साथ घर के पिछवाड़े मिट्टी की गुड़िया बनाने का सपना देखा था। लेकिन इस दुनिया में तो आने के बाद सारे सपने ही चूर-चूर हो गये। मेरी किलकारी पर मुझे थपकी देना तो दूर, मां ने तो मेरे आने के बाद मुझे आंखे खोलने का मौका भी न दिया। घर के नर्म बिस्तर के बजाए मेरी आंख खुली, तो उस जगह जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ अंधियारा था। मेरे जन्म पर खुश होने वाली मेरी मां मेरे जन्म पर समाज से नज़रें चुरा रही थी। मैं तमाशा बन चुकी थी, और सारे तमाशाई थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SgbO8Mu4odI/AAAAAAAAAOo/9dq3CalmyP4/s1600-h/mom5.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 267px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SgbO8Mu4odI/AAAAAAAAAOo/9dq3CalmyP4/s400/mom5.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334178342272278994" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर क्यों मां... तुम ऐसा क्यों करती हो। लोग अपनी बिटिया को लेकर कितने सपने संजोते हैं, तमाम अरमान मन में पाले रहते हैं। लेकिन मेरे साथ ऐसा ज़ुल्म क्यों। आखिर मुझे अधिकार क्यों नहीं है, तुम्हारे साथ जीने का। आखिर मुझे अपने नर्म हाथों की थपकी देकर सुलाने से तुम्हें परहेज़ क्यों है? आखिर कौन है वो मेरा बदनसीब बाप... जो मेरे आने से इतना शर्मिंदा है कि तुम्हें भी दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर गया है। आखिर क्यों नहीं है मुझे भी जीने का हक? मेरा तो कोई कसूर भी नहीं था, मैं तो आपके प्यार की निशानी थी। लेकिन मुझे तो लावारिसों की तरह छोड़ दिया गया। जहां मेरे लिए सांस लोना भी मुश्किल था। और जो लोग मेरे लिए हमदर्दी रखते थे, वो भी मेरे बारे में तमाम तरह की बातें कर रहे थे। आखिर क्यों ये समाज इतना बेदर्द है, जो मेरे जन्म पर नेग देने के बजाए आंसू बहाता है। आखिर मां, मैं भी तुम्हारा ही एक रूप हूं.. आज तुम जिस मुकाम पर खड़ी हो, कल वहीं मेरी भी मंजिल होगी। लेकिन मैं इतना तो मानती हूं... कि एक मां अपनी बेटी का गला नहीं घोट सकती। क्योंकि मां तो भगवान का दूसरा रूप होती है। &lt;br /&gt;सच में मां का कद इतना बड़ा है कि दुनिया में हर कोई उसके सामने बौना नज़र आता है। मां के पैरों तले जन्नत है, ये तो सभी जानते हैं, लेकिन मां का दर्जा तो जन्नत से भी ऊपर है। हज़ार ख़ताओं को माफ़ करने का जज़्बा अगर किसी में है, तो वो मां ही है। शायद इसीलिये कहते हैं कि सबसे प्यारी मां... और मुझे भी तलाश है एक ऐसी ही मां की.. मां क्या तुम सुनोगी मेरी पुकार..&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;एक अभागी बेटी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-3095518203871871707?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/3095518203871871707/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=3095518203871871707' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/3095518203871871707'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/3095518203871871707'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='एक चिट्ठी मां के नाम'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SgbO8Mu4odI/AAAAAAAAAOo/9dq3CalmyP4/s72-c/mom5.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-4962733031611310124</id><published>2009-04-30T02:51:00.005+09:00</published><updated>2009-04-30T02:58:04.938+09:00</updated><title type='text'>उन चुनावों का मज़ा अब कहां</title><content type='html'>चुनावी महाभारत अपने आखिरी पड़ाव में है, लेकिन इस बार जिस चीज़ की कमी सबसे ज्यादा महसूस की गई, वो था चुनाव प्रचार का ज़ोर-शोर। लोकसभा के लिए महासंग्राम का बिगुल तो बजा, लेकिन न तो बिगुल दिखा, न शोरशराबा करते चुनाव प्रचारक। आम-आदमी का चुनाव आम आदमी से कोसों दूर रहा। एक तरफ़ एक्ज़िट पोल गायब था, तो दूसरी तरफ़ चुनाव प्राचर के पुराने तरीके कहीं भी नज़र नहीं आये। बचपन में जब चुनाव की रणभेरी बजती थी, माहौल में एक अलग तरह का ही जोश होता था। काफ़ी पहले से चुनाव की तैयारियां शुरु हो जाती थीं। घर-घर में चुनाव के लिए पर्चियां बनाने का काम काफ़ी पहले ही शुरु हो जाता था। किस के घर में कितने वोट हैं, ये कार्यकर्ताओं को उंगलियों पर ही याद होता था। सुबह प्रचार का जो सिलसिला शुरु होता था, वो देर रात तक चलता था। &lt;br /&gt;रिक्शेवाले लाऊडस्पीकर पर अपने खास उम्मीदवार का प्रचार करते थे, और जैसे ही रिक्शा गली के नुक्कड़ से गुज़रता, उसके पीछे बच्चों की भीड़ लग जाती थी। बिल्ले लेने के लिए बच्चों में होड़ मच जाती थी, रिक्शे वाला भी बच्चों को बिल्ले और झंडे बांटकर बदले में उनसे नारे लगवाता था। तो बच्चे भी कम नहीं थे, जिस नेता का रिक्शा देखा उसी की ज़िंदाबाद शुरु कर दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfiUEhkdzgI/AAAAAAAAAOI/unxSd19H7kk/s1600-h/Campain+rick.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 267px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfiUEhkdzgI/AAAAAAAAAOI/unxSd19H7kk/s400/Campain+rick.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5330172964444687874" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और तो और बच्चों का समूह हर नेता के दफ्तर पर जाता वहां नारे लगाता और खूब सारे बिल्ले और झंडे बटोरकर अगले नेता के घर रवाना हो जाता। बच्चे बी इतने समझदार थे कि जिस नेता के घर जाते थे उसी की जय-जयकार करते थे। पहले न तो इतनी गाड़ियां थीं, न नेता ही गाड़ियों पर प्रचार करने में दिलचस्पी दिखाते थे। नेताजी जब अपने लाव-लश्कर के साथ गुज़रते थे, तो उनके पीछे पैदल ही लंबा काफिला होता और गली-मुहल्ले के विकास के नाम पर वोट मांगे जाते थे। &lt;br /&gt;इसके अलावा पेन्टर भी दिल लगाकर दीवारों को पैंट करते थे, उन पर खूबसूरत कलाकारी कर अपना हुनर दिखाते थे। नेताजी के साथ में उनकी पार्टी का चुनाव निशान होता, तो साथ में उनकी पार्टी के बड़े नेता जी का फोटो भी दीवार की शोभा बढ़ाता था। गली-मुहल्ले में नुक्कड़ सभाएं कर नेता वोट मांगते थे। इस दौरान न तो कोई गिला-शिकवा होता था न किसी की किसी से अदावत होती थी। दिनभर वोट और प्रचार के झंझट से निपटकर कार्यकर्ता जुट जाते थे अपने नेता जी के घर और फिर लगती थी खाने की पंगत। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfiUs8qYNdI/AAAAAAAAAOY/fcpbh3Newro/s1600-h/CAMPAIN+2+wall.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 229px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfiUs8qYNdI/AAAAAAAAAOY/fcpbh3Newro/s400/CAMPAIN+2+wall.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5330173658912011730" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देर रात तक चाय का सिलसिला तो आम बात होती थी। लोग भी चुनाव में खूब दिलचस्पी दिखाते थे। चाय की दुकान तो समझो सियासत का अड्डा बन जाती थी, वहां लंबी-चौड़ी बहसों में तय हो जाता था कि फलां सीट पर कौन जीत रहा है, और देश में किसकी सरकार बन रही है। या फलां नेता ने कौन सा बयान दिया है, या उसमें ऐसी कौन सी कमियां हैं, जिसकी वजह से इस बार उसकी हार तय है। एक से डेढ़ रूपये की चाय में हिंदुस्तान की तस्वीर तय हो जाती थी। पहले के लोग पप्पू भी नहीं होते थे, वोट डालने के दिन सुबह से ही घर में किसी मेले जैसा आलम होता था। सज-धजकर सुबह से लोग वोट डालने की तैयारियों में जुट जाते थे। लेकिन अब ये सब चीजें कहीं नदारद सी हो गईं है। शायद लोगों की दिलचस्पी भी कुछ कम हो गई है। खाना-पीना और मौज-मस्ती तो अभी भी बाकी है, लेकिन पहले वाली रौनक कहीं गायब सी हो गई हैं। रही-सही कसर चुनाव आयोग की पाबंदियों ने पूरी कर दी है। शायद ये ज़रूरी भी था, क्योकिं नेता भी खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाने में अपनी शान समझते थे। लेकिन कुछ भी हो, पुराने चुनावों का अपना एक मज़ा था, जो कहीं खो सा गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-4962733031611310124?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/4962733031611310124/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=4962733031611310124' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/4962733031611310124'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/4962733031611310124'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/04/blog-post_30.html' title='उन चुनावों का मज़ा अब कहां'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfiUEhkdzgI/AAAAAAAAAOI/unxSd19H7kk/s72-c/Campain+rick.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-6000809189341381669</id><published>2009-04-26T14:48:00.007+09:00</published><updated>2009-04-26T15:04:50.475+09:00</updated><title type='text'>ये चुनाव 'अमर' रहेगा</title><content type='html'>2009 का आम चुनाव कई मायनों में ख़ास रहेगा। मुद्दों से दूर इस बार का लोकसभा चुनाव बेमतलब की फूहड़ बयानबाज़ी के लिये याद रखा जाएगा। वरुण गांधी के ज़हर बुझे तीरों से शुरु हुआ चुनावी सफ़र अब तक के सबसे घटिया दौर से गुज़र रहा है। जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिए नेता मुद्दों के बजाए एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं। वरुण ने हाथ काटने की बात की, तो बिहार में राबड़ी देवी नीतीश कुमार के बारे में ऐसे-ऐसे बोल बोल गईं जो न सिर्फ़ तहज़ीब के खिलाफ़ थे, बल्कि देश की इमेज पर भी बट्टा लगा रहे थे। राबड़ी ने शुरुआत की तो लालू कहां पीछे रहने वाले थे। वरुण ने ज़हर उगला तो लालू वरुण पर रोड-रोलर चलवाने की धमकी दे गये। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfP3zSd1ImI/AAAAAAAAANI/qWBVSGhmPac/s1600-h/NETA+VARUN.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 249px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfP3zSd1ImI/AAAAAAAAANI/qWBVSGhmPac/s400/NETA+VARUN.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5328875244611773026" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मतलब हर नेता तू सेर तो मैं सवा सेर साबित होने की कोशिश कर रहा था। लेकिन मज़े की बात ये है कि इस बार के चुनाव को नेताओं ने गंभीरता की बजाए प्रैक्टिकल ग्राउंड बना दिया। समाजवादी पार्टी ने ये जानते हुए भी कि संजय दत्त मुंबई मामले में दोषी हैं, उन्हें लखनऊ से लड़ाने का ऐलान कर दिया, लेकिन जब बाद में परमिशन नहीं मिली, तो संजय की जगह नफ़ीसा अली को मैदान में उतार दिया। इसका मतलब ये है कि यूपी की इस बड़ी पार्टी को लगता है कि लखनऊ के सिर्फ़ वही ठेकेदार हैं, और लखनऊ की आवाम को इसका फैसला करने का कोई अधिकार नहीं है। संजय दत्त को नेता बनाने पर तुली पार्टी ने उन्हें महासचिव बना दिया, तो मुन्ना बहनजी के खिलाफ़ ऐसी घटिया ज़ुबान का इस्तेमाल कर गये कि उन्हें लेने के देने पड़ गये। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfP2EaMkdBI/AAAAAAAAANA/o9ohMqv28B4/s1600-h/NETA+AMAR.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 274px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfP2EaMkdBI/AAAAAAAAANA/o9ohMqv28B4/s400/NETA+AMAR.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5328873339721380882" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी ले-देकर उन्हें एक ही डायलॉग आता है, 'मैं मुन्ना और आप मेरे सर्किट'  वैसे उनके सर्वहारा भाई (जो अमूमन सभी फिल्मी सितारों के भाई बन जाते हैं) अमर सिंह ने तो रामपुर से जया प्रदा के चुनाव को अहम की लड़ाई बना लिया और अपनी ही पार्टी के आज़म खान को खरी खोटी सुना डाली। बयान बहादुर बनते-बनते अमर इतने भारी हो गये कि मंच भी उनका वज़न नहीं संभाल पाए। चलिए अब यूपी से आगे बढ़ते हैं। नेशनल लेवल पर नज़र डालें तो मौजूदा पीएम और पीएम इन वेटिंग ने एक दूसरे के खिलाफ़ तलवारें निकाल रखी हैं। अभी तक दोनों एक-दूसरे को कमज़ोर साबित करने पर तुले हैं, लेकिन शायद दोनों को ही सियासत का कॉम्पलेन पीने की ज़रूरत है। तो उधर बिहार में लालू और पासवान अपनी ही सरकार के खिलाफ़ मोर्चा खोले खड़े हैं। तलवारें तन गईं हैं और सभी की नज़र देश को एक मज़बूत सरकार देने के बजाए पीएम की कुर्सी पर लगी हैं। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfP5MLzsAdI/AAAAAAAAANg/6adoHtUs8uQ/s1600-h/NETA.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 257px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfP5MLzsAdI/AAAAAAAAANg/6adoHtUs8uQ/s400/NETA.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5328876771832758738" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तो बिहार में प्रणव मुखर्जी, लालू को उन्हीं के अंदाज़ में जवाब दे गये। ये अलग बात है कि बाद में वो कमज़ोर हिंदी का हवाला देकर बयान से किनारा कर गये। तो यूपी में दिग्विजय सिंह मायावती को सीबीआई की धमकी दे गये। और तो और बीजेपी में जेटली और राजनाथ सिंह में ही तलवारें खिंच गई, वो भी सिर्फ़ इसलिये कि जेटली को लगने लगा कि राजनाथ, सुधांशु मित्तल को आगे कर उनके पर कतर रहे हैं। हालात ये हो गई कि बयान बहादुर नेताओं के आगे चुनाव आयोग भी बेबस नज़र आ रहा है। चुनाव कराने से ज्यादा बड़ा काम तो उसके सामने नेताओं को नोटिस जारी करने का है। हालात ये हो गई है कि चुनाव आयोग को भी शायद याद नहीं होगा कि इस बार उसने कितने नोटिस बांटे हैं। लेकिन इस बार के चुनाव को बिना जूते के कैसे भूल सकते हैं। चिदंबरम पर जूता पड़ा तो टाइटलर और सज्जन कुमार चुनावी आंधी में उड़ गये। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfP465DCd_I/AAAAAAAAANY/1i5gchR2A7w/s1600-h/NETA+JUTA.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 298px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfP465DCd_I/AAAAAAAAANY/1i5gchR2A7w/s400/NETA+JUTA.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5328876474739095538" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जिंदल पर जूता पड़ा को कांग्रेस की और भी फ़ज़ीहत हो गई। जूते पर कांग्रेस को घेरने वाली बीजेपी भी इस वार से नहीं बची, भले ही पीएम इन वेटिंग चप्पल का निशाना बने हों, लेकिन ये तो साफ़ हो गया कि भगवा पार्टी में भी सब कुछ ठीक नहीं है। यानि अब तक जनता से जुड़े मुद्दे कहीं भी नहीं। मंदिर पर फेल हुई बीजेपी इस बार काले धन का रोना रो रही है, जिसका न तो आम आदमी से कोई मतलब और न ही पैसा आने से रहा। लेकिन सबसे दिलचस्प रहा समाजवादी पार्टी का मेनीफेस्टो। मुद्दों की बात तो दूर, जनाब तो अंग्रेजी और कंप्यूटर के सफ़ाये की बात ही कर गये। इस बार के चुनाव में क्या-क्या नहीं हुआ जो बताया जाए, जब नेताजी को कुछ नहीं सूझा तो उन्होने नोट बांटना ही शुरु कर दिये। मतलब लिखने को इतना कुछ कि किताब छप जाए, और शायद अगर इस पर किताब आ जाए तो बेस्ट सेलर भी बन जाए। ये उस देश के महासंग्राम का हाल है जहां दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कायम है। जहां सत्ता की कुंजी आम आदमी के हाथ में मानी जाती है, लेकिन चुनाव के बाद नेताजी की झोली भरती है और आम आदमी रह जाता है खाली हाथ। वैसे भी इस बार का ड्रामा देखकर तो यही लग रहा है कि ये नेता मंडली के कलाकार हैं और हम सब तमाशाई हैं, जिसका नाटक ज्यादा पसंद आयेगा उस पर वोट लुटा देंगे, और फिर उनके हाथ में सौंप देंगे अपनी किस्मत पांच साल के लिए। शायद इसीलिए ये चुनाव 'अमर' रहेगा। धन्य हो...मेरा भारत महान&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4208086182725287078-6000809189341381669?l=abyazk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://abyazk.blogspot.com/feeds/6000809189341381669/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4208086182725287078&amp;postID=6000809189341381669' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6000809189341381669'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4208086182725287078/posts/default/6000809189341381669'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://abyazk.blogspot.com/2009/04/blog-post_26.html' title='ये चुनाव &apos;अमर&apos; रहेगा'/><author><name>अबयज़ ख़ान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06351699314075950295</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='25' src='http://1.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/S55c9B-I_5I/AAAAAAAAAgM/e4l5KHOpxJ0/S220/My+Pics.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kcUDTs00Zpc/SfP3zSd1ImI/AAAAAAAAANI/qWBVSGhmPac/s72-c/NETA+VARUN.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4208086182725287078.post-5745621698897276872</id><published>2009-04-24T18:52:00.005+09:00</published><updated>2009-04-24T18:57:30.704+09:00</updated><title type='text'>ये स्कूल हैं या नरक</title><content type='html'>दिल्ली के एक स्कूल में एक लड़की की इसलिए मौत हो गई कि क्योंकि टीचर ने उसे मुर्गा बना दिया था.. बच्ची के घरवालों का आरोप है कि टीचर ने बेरहमी से उसकी पिटाई भी की थी। ये थी एक छोटे से सरकारी स्कूल की कहानी। जहां मामूली सी फीस पर बच्चों का भविष्य बनाया जाता है। महज़ पचास रुपये की फीस देकर शन्नो के घरवाले अपनी बेटी के लिए सपने बुन रहे थे। अब चलते हैं राजधानी के एक हाईप्रोफ़ाइल स्कूल.. यहां भी एक लड़की की मौत हो जाती है, 12 वीं क्लास की इस लड़की के घरवालों का इल्ज़ाम है कि उनकी बच्ची स्कूल में बीमार हुई तो स्कूल वालों ने उसे वक्त पर इलाज मुहैया नहीं करवाया। जिस वजह से उनकी बच्ची को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। ये है एक बड़े स्कूल की कहानी। जहां पढ़ने वाली आकृति दस हज़ार रुपये से ज्यादा महीने की फीस अदा करती थी। दोनों ही स्कूलों में इल्ज़ाम के घेरे में आये स्कूल और टीचर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल ये है कि टीचर बेरहम हो गये हैं, या स्कूल लापरवाही की हद पर उतर आये हैं। आखिर क्या फर्क बचा एक सरकारी स्कूल और हाई प्रोफाइल स्कूल में। सरकारी स्कूल में शन्नो को वक्त पर इलाज नहीं मिला, तो पब्लिक स्कूल में आकृति को भी वक्त पर इलाज नहीं मिला। हालत दोनों स्कूलों की एक जैसी है। दोनों ही स्कूलों का कहना है कि इलाज वक्त पर मिला है, दोनों ही स्कूलों का कहना है कि लड़कियां बीमार थीं। फर्क सिर्फ़ इतना ही कि शन्नो की टीचर पर उसकी पिटाई करने का इल्ज़ाम है और आकृति के स्कूल पर उसको वक्त पर इलाज न देने का इल्ज़ाम है। दोनों ही मामले बहुत गंभीर हैं। सवाल ये है कि क्या बच्चों की कीमत कम हो गई है, या भारी दबाव में स्कूल टीचर उन पर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। हालांकि इसके लिए मीडिया का शुक्रगुज़ार होना पड़ेगा, जो अब क्लासरूम में भी पहुंच गया है। मेरे स्कूल में एक टीचर थे, नाम लिखना शायद ठीक नहीं होगा, लेकिन उनकी मार बहुत मशहूर थी, हर कोई उनकी पिटाई से थर्राता था। स्कूल में पिटाई का उनका अंदाज़ ही अलग था, अगर उनके सब्जेक्ट गणित में कोई गलती हो गई, तो समझिये उस लड़के की कयामत आ गई। बच्चों को सज़ा देने के लिए वो एक के पीछे एक चार पांच लड़कों को एक साथ मुर्गा बनाते थे, उसके बाद सबसे पीछे वाले लड़के के अपना घुटना मारते थे, जिसकी वजह से एक के पीछे एक बच्चों के सिर दीवार में लगते थे। और वो अपनी इस सज़ा पर बड़ा फक्र महसूस करते थे। लेकिन एक बार जब वो अपने घर में स्टूल पर चढ़कर पंखा लगा रहे थे, तभी अचानक स्टूल लुढ़क गया और मास्टर साहब ज़मीन पर गिर गये, जिससे उनका एक हाथ टूट गया। उस दिन के बाद से मास्टर 
